Not necessarily popular governments take decisions

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देश की सरकारें देश की जरूरतों के हिसाब से नहीं बल्कि अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनाती हैं .वो समस्याएं ख़त्म करने की बजाय उसे बनाए रखना चाहती हैं ताकि उनके से लड़ने के बहाने सरकार चलानेवाली पार्टी की राजनीति चलती रहे .ऐसा नहीं है कि सत्ता पर काबिज राजनीतिक दलों को इसबात का इल्म नहीं है कि किसी की भूख मिटाने के लिए एक दिन मछली देने से ज्यादा जरुरी उसे मछली मारना सिखा देना ज्यादा जरुरी है .सरकारें टफ रिफ़ॉर्म के नाम पर
कमानेवाले कुशल कामगारों की जेब काटती रहती हैं . आर्थिक मामलों के विशेषग्य रघुराम राजन भी टफ रिफ़ॉर्म को आम लोगों की कमाई पर किया जानेवाला स्मार्ट पॉलिटिक्स मानते हैं .पिछले कुछ महीनों से देश की बदहाल डावांडोल अर्थ व्यवस्था की दुहाई देकर लगातार पेट्रोल डीजल का दाम बढ़ाया जा रहा है .टैक्स के दर में वृद्धि की जा रही है .जो टैक्स देनेवाले लोग हैं ,इनकम टैक्स विभाग उनसे ज्यादा से ज्यादा टैक्स वसूलने के लिए उनके पैंट उतारने में जुटा है .एक तरफ कमानेवाले माध्यम वर्ग पर टैक्स का भार बढ़ाया जा रहा है वहीँ दूसरी तरफ पांच सौ करोड़ का मुनाफा कमानेवाले बड़े कार्पोरेट घरानों को छूट के नाम लाखों करोड़ के टैक्स की छूट दी जा रही है .एक करोड़ रुपये से ज्यादा कमानेवाले ४८,२०० लोगों पर वित् मंत्री दस फिसद सरचार्ज लगाने का नियम बना रहे हैं दूसरी तरफ पांच सौ करोड़ का मुनाफा कमानेवाले सवा लाख लोगों को ३२ परसेंट की जगह १६ परसेंट टैक्स चुकाने की छूट देने की परिपाटी में संशोधन की जरुरत मह्सुश नहीं कर रहे हैं .
एक तरफ आर्थिक सुधार के नाम पर केंद्र सरकार कठोर फैसले ले रही है दूसरी तरफ इससे होनेवाली बचत को अपने राजनीतिक फायदे के लिए पॉपुलिस्ट स्कीमों पर उड़ा रही है .सरकार यह भूल गई है कि देश और आमजन की भलाई सही फैसले में निहित हैं न कि लोकप्रिय फैसलों से उसकी गरीबी दूर होनेवाली है .खाद्य सुरक्षा अधिनियम हो या फिर कैश सब्सिडी या वर्षों से चल रही मनरेगा योजना ,सबके पीछे गरीब को गरीब और याचक बनाए रखने की राजनीतिक शाजिश
छिपी हुई है ..चुनाव के ठीक पहले सरकार ऐसे लोकप्रिय फैसले दनादन ले रही है .एक तरफ वह २०१३ -१४ में ४.८ फिसद फिजिकल डिफीसिट बरकरार रखने में आनेवाली चुनौतियों को गिना रही है दूसरी तरफ सब्सिडी में कटौती और टैक्स में बढ़ोतरी से होनेवाली बचत को वह अपने राजनीतिक फायदे के लिए लुटा रही है . अब वह लोक सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए देश के १५ मिलियन भूमिहीन लोगों के लिए घर की योजना शुरू करने जा रही है .ये घर उन लोगों के लिए है ,जिनके पास घर और गावं में रहकर अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए रोजगार का जुगाड़ ही नहीं हैं .उन्हें अपने शहर, गावं
और घर से सैकड़ों हजारों किलो मीटर दूर काम की तलाश में जाना पड़ता है .सबके लिए घर की इस योजना पर हर साल ३० हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा जो डीजल पेट्रोल पर से कम की गई सब्सिडी से होनेवाली बचत के बराबर है .जब पहले से ही ग्रामीण विकास मंत्रालय की इस तरह की एक योजना “इंदिरा आवास ‘ जारी है ,ऐसे में एक और आवासीय योजना की शुरुवात करने का
मकसद तो रियल स्टेट के कारोबार को एक तरफा बूम देना ही हो सकता है .देश में ८० फीसदी लोग भूमिहीन हैं ,उन्हें जमीन देने के लिए तो आजतक किसी सरकार ने कुछ नहीं किया .कृषि को इंटरप्राइजिग बिजनेस बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया .बिहार सरकार अकेले अपने राज्य में कृषि पर खर्च करने के लिए डेढ़ लाख करोड़ रुपये का कृषि रोड मैप बना रही है लेकिन देश की
सरकार तो हजार करोड़ रुपये के बजट से ही देश में हरित क्रांति की योजना से संतुष्ट है .
अगर लोगों को घर देना है तो ,इसके पहले उन्हें उस घर में रखने की व्यवस्था करनी होगी .यह तभी संभव है जब उनके लिए लिए उनके शहर और गावं में ही रोजगार की व्यवस्था हो .यह तभी संभव है जब शिक्षा खासतौर पर तकनिकी शिक्षा देकर उन्हें किसी क्षेत्र में कुशल बनाया जाएगा .एक कुशल कामगार एक अकुशल कामगार की अपेक्षा ज्यादा काम सकता है .उसे अपनी शर्तों पर काम करने की आजादी मिलती है . लेकिन शिक्षा और तकनिकी शिक्षा जैसे क्षेत्र में सुधार की योजनायें तो कागजों पर धुल चाट रही है .मनरेगा के तहत साल में १०० दिन गढ़ा खोदने और फिर उसे भरने का काम देकर सरकार ने गरीबों का भला नहीं बल्कि उन्हें निकम्मा बनाने और इस योजना के क्रियान्वयन में लगे अफसरशाही और लोकशाही की जेब भरने का ही काम ज्यादा किया है .अगर गरीबों को साल में तीन महीने काम ही देना है तो सरकार खेत खलिहान में काम करनेवाले मजदूरों को अपनी तरफ से कुछ मेहनताना देने की व्यवस्था कर सकती है .इससे मजदूरों को दोतरफा फायदा होता .एक तरफ किसान से उन्हें मजदूरी मिलती है दूसरी तरफ सरकार से उन्हें खेत खलिहान में काम करने और कृषि के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें सरकार की तरफ से इंसेंटिव मिल जाता .लेकिन कोई सरकार किसी समस्या के स्थाई समाधान को लेकर चिंतित नहीं है .उसे आम जन को याचक और गरीब बनाए रखने में ही अपना फायदा दिखता है .
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