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जानिये इन 8 प्रशिद्ध भारतीय व्यंजन का इतिहास

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नई दिल्ली: हमारे देश में इतने प्रकार के व्यंजन मिलते हैं कि अगर उनकी फ़ेहरिस्त बनाने बैठे तो शायद सैंकड़ें पन्ने भर जाएगा और तब भी शायद सिससिला ख़तम ना हो। यही वजह है कि हमें हमारे भारतीय व्यंजनों पर भी गर्व है।

खानेपीने के शौक़ीन इस देश में व्यंजन दुनियां के किसी भी कोने का क्यों ना हो उसे अपनाने में ज़रा भी हिचक नहीं होती हां ये बात अलग है कि उसमें हम देसी तड़का लगाना नहीं भूलते।
विदेशी में देसी तड़का हमारी ख़ासियत है। हैमबरगर में आलू टिक्की और भारतीय मसालों में चीनी भोजन कुछ उदाहरण हैं।
हम भले ही दुनियां के किसी भी कोने में हों हमारी नज़र हमेशा भारतीय रेस्तरां को खोज ही निकालती है।
लेकिन क्या आपको मालूम है जिन भारतीय व्यंजनों पर हमें बहुत नाज़ होता है वो दरअसल भारतीय है ही नहीं…? समोसा, गुलाब जामुन, जो हमारे खामपान का अभिन्न हिस्सा हैं, दूसरे देशों की उपज हैं।
हालंकि ज़ायक़े के मामले में ये हैं तो विशुद्ध रुप से भारतीय लेकिन इनकी जड़ें कहीं किसी और देश में रही हैं।

चलिए हम नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ भारतीय व्यंजनों पर जो बाहर से हमारे देश में आए हैं…..

समोसा: समोसा सारी दुनियां में जाना जाता है और सारी दुनियां आज समोसे को जानती है। इसके बग़ैर जीवन की कल्पना करना किसी भी भारतीय के लिए नामुमकिन है। अक़्सर चाय का साथी ये समोसा पश्चिम एशिया से आया था।

13वीं-14वीं शताब्दी में पश्चिम एशिया के व्यापारी ‘समबोसा’ लेकर भारत आए थे। हमने इसमें देसी तड़का लगाकर इसे समोसा बना दिया।
बहरहाल समोसा कहीं से भी आया हो आज ये हमारा सबसे पसंदीदा नाश्ता है।

गुलाब जामुन:  गुलाब जामुन का नाम लो और मुंह में पानी ना आए ऐसे हो ही नही सकता। ये मिठाई भू-मध्यसागरीय देशों ओर ईरान से आई थी जहां इसे लुक़मत अल क़ादी कहते हैं।

लुक़मत अल क़ादी आटे से बनाया जाता है। आटे की गोलियों को पहले तेल में तला जाता है फिर शहद की चाशनी मे डुबाकर रखा जाता है। फिर इसके ऊपर चीनी छिड़की जाती है लेकिन इसके भारतीय संस्करण में कुछ बदलाव किए गए।
गुलाब जामुन भारत की पसंदीदा मिटाईयों में से एक है।

जलेबी:  जलेबी पूरे भारत में खाई जाती है ये बात अलग है कि श्थान के साथ इसका रुप बदल जाता है। उत्तर भारत में जहां ये पतली और कुरकुरी रुप में नज़र आती है वहीं दक्षिण भारत में ये ज़रा मोटी हो जाती है और इसका आकार भी बदल जाता है। जानगिरी और इमरती जलेबी की दो क़िस्म हैं।
ईरान और अरब देशों से आई  में खूब खाई जाती है वहीं स्वतंत्रता दिवस पर भी ये समारोह की शोभा बढ़ाती है।
जलेबी को अरबी में ज़लाबिया और फ़ारसी में ज़लिबिया कहते हैं।

दाल-भात:  दाल भात पूरे देश में खाया जाता है भले ही इसका रुप अलग क्यूं ना हो।
दाल भात का संबंध नेपाल से है जो उत्तर भारत से पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया।
आगे से आप जब भी दाल भात खाएं तो याद रखें कि ये भारती. नहीं नेपाली व्यंजन है।

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राजमा: राजमा चावल किसे पसंद नहीं है। राजमा आज पंजाब, जम्मू और हिमाचल से निकलकर सारे देश में लोकप्रिय हो चुका है और ख़ास मौक़ो का व्यंजन बन चुका है। लेकिन आपको बता दें कि ये भी भारतीय व्यंजन नही है। ये दरअसल मध्य मैक्सिको और गौटमाला से आया था। मैक्सिको में ये वहां के भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चाय: चाय से एक भारतीय की सुबह होती है दोपहर होती है शाम होती है और यहां तक की रात भी होती है।
लेकिन क्या आपको मालूम है कि जिस चाय के आपको अपना जीवन अधूरा लगेगा उसका दरअसल ताल्लुक़ चीन से है।
चीन में चाय का इस्तेमाल दवा के रुप में किया जाता था। अंग्रेज़ चाय बाज़ार में चीन के एकाधिकार को ख़त्म करना चाहते थे इसलिए वे चाय भारत ले आए।
चाय को भारतीय ज़बान का ज़ायक़ा बनने में कु वक़्त लगा लेकिन फिर भी पचास के दशक तक ये हम भारतीयों का पसंदीदा पेय पदार्थ हो गया।

फ़िल्टर कॉफ़ी: शुरु में कॉफ़ी को भारत में ज़्यादा पसंद नहीं किया गया लेकिन धीरे-धीरे इसने अपनी जगह बना ली।
16वीं सदी में सूफी संत बाबा बूदन कॉफ़ी के बीज यमन से तस्करी करके लाए थे। वह उस समय मक्का हज करने गए थे और यमन के रास्ते लौट रहे थे।
लौटने पर सूफी बूदन ने कॉफ़ी की खेती शुरु की और फिर जल्द ही ये लोगों में लोकप्रिय हो गई। तब भारतीय इसे बग़ैर दूध और चीनी के पीते थे।
फ़िल्टर कॉफ़ी को लोकप्रय बनाने में कॉफ़ी सेस कमेटी का बहुत योगदान है जिसने 1936 में बॉम्बे में पहला कॉफ़ी ङाउस खोला था।

नान: नान के बग़ैर बटर चिकन और कढ़ाई पनीर बेमज़ा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि ना

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