ब्राम्हण को दर्द नही होता क्या?

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ब्राह्मण को दर्द नही होता।उसके एहसास की कोई अहमियत नही होती।उसकी तकलीफो में वो बात नही होती जो मुद्दा बन पाए।तभी तो लवकेश मिश्रा जैसे मर जाते हैं।ख़ामोशी से मौत की चादर ओढ़ लेते हैं।किसी को उसके मरने का एहसास भी नही होता है।ऐसा लगता है पिछली दीवार पर रखी कोई फालतू ईंट गिर गई हो।लवकेश का फाँसी लटकना वो दर्द नही उठा पाया जो औरो में हुआ।अगर वो दलित होता तो मौत का ज़ायका सब चखते।मुसलमान होता तो दुनिया इस ज़ुल्म को देखती मगर बदकिस्मती से वो ब्राह्मण था।वैसे भी हम लोग लाशों में मज़हब,ज़ात ढूंढते हैं।उसको रंग देते हैं फिर उस रंग में ऐसा नाच होता है जो तांडव में बदल जाता है।सरकारो के लिए भी कितना आसान है ऐसी मौतों से निपटना।

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एक बार सोचिये वो एक किसान भी था।फाँसी पर लटकने से पहले उसने पुरे लेटर में HOD पर मजबूर करने के संगीन इलज़ाम लगाय फिर भी यह मुद्दा लखनऊ का नही बन सका राष्ट्रीय क्या खाक बनेगा।एक बात कहे हो सकता बुरी लगे आपको।जब आप दलित,मुस्लिम,ईसाई,बौद्ध,हिन्दू सबकी राजनीती करते हैं, उनके मुद्दों पर सड़क और संसद घेरते हैं।तब आप लवकेश जैसे बच्चों की परवाह नही करते और उसके मिश्रा होने से आपमें वह दर्द नही फूटता जो दूसरी जातियो में फूट पड़ता है।तो समझ लीजिये आप दोहरे रास्ते पर खड़े हैं, आप पर भरोसा मुश्किल है।बच्चों का मारना व्यवस्था का दोष है उससे निपटा जाना चाहिए बिना फर्क किये।वैसे तो बहुतो को पता भी नही होगा की यह है कौन, हुआ क्या,कहा की खबर है क्योंकी वह एक ब्राह्मण था।ब्राह्मण की मौत और तकलीफो में ज़ायका नही होता है तभी तो उनका दर्द बदमज़ा लगता है।(लखनऊ में hod के लगातार परेशान और सातवे सेमेस्टर में एग्जाम में बैठने न देने के कारन इंजीनियरिंग के छात्र लवकेश मिश्रा ने सुसाइड कर लिया और माफ़ी के साथ मौत का कारन hod को बताया)

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