सीवर सफाईकर्मी : पेट की खातिर मौत से पंजा लड़ाने की मजबूरी

0
600
views



सीवर यानी समूचे शहर की गंदगी का निकास द्वार. ग्रीन दिल्ली-क्लीन दिल्ली के ठीक नीचे से गुजरती जानलेवा जहरीली गैसों और बैक्टीरिया से भरे सीवर, जिनकी सफाई का काम काफी जोखिम भरा है. इसमें हर समय जान जाने का खतरा बना रहता है. मेनहोलों में उतरने वाले सफाई कर्मचारियों को खुद के जिंदा वापस लौटने की उम्मीद नहीं होती. जिंदा वापस आ भी जाएं तो सीवर की गंदगी से उन्हें लाइलाज बीमारियां हो जाती हैं, जो आखिरकार उन्हें मौत के मुंह में ले जाती हैं. यह काम वे शौक से नहीं करते, बल्कि बेरोज़गारी उन्हें अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाकर यह काम करने के लिए मजबूर कर देती है.

चिपियाना (ग़ाज़ियाबाद) निवासी फुट सिंह वाल्मीकि ऐसे पिता हैं, जिनके पांच जवान बेटों की मौत सीवर की स़फाई करते समय हो गई. सबकी उम्र 20 से 35 वर्ष के बीच थी. फुट सिंह की पांच विधवा बहुए हैं. इसी तरह 40 वर्षीय तारी़फ सिंह सीवर स़फाई का काम करते थे. वह घर से काम पर निकले थे. शाम को घर पर खबर आई कि तारी़फ सिंह की काम के दौरान हालत बिगड़ गई है, वह अस्पताल में हैं. घरवाले अस्पताल गए, जहां उनकी मौत हो चुकी थी. ऐसे ही रोहिणी सेक्टर तीन में सीवर की स़फाई के दौरान दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई. दोनों पिता-पुत्र थे. पुलिस ने इस मामले में ठेकेदार के खिला़फ लापरवाही के चलते मौत का मामला दर्ज किया. हादसे के बाद से ठेकेदार फरार है. यह मौत किसकी लापरवाही से हुई, मृतक के परिवारीजन आखिर किसके पास न्याय के लिए गुहार लगाएं, इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है. स़फाई कर्मचारियों के ऐसे सैकड़ों परिवार हैं, जिनके दो-दो, तीन-तीन सदस्य सीवरों की भेंट चढ़ गए. हालांकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइड लाइन साफ़ कहती है कि सीवर साफ़ करने का ज़िम्मा सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकार का है, लेकिन होता यह है कि सफ़ाई का काम ठेके पर दे दिया जाता है और कोई हादसा होने पर दिल्ली जल बोर्ड यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि मरने या ज़ख्मी होने वाले लोग उसके कर्मचारी नहीं थे. आंकड़ों की मानें तो हर साल देश भर में लगभग एक हज़ार और प्रतिदिन 2-3 सफाईकर्मी सीवर सा़फ करते समय काल के मुंह में समा जाते हैं. इन सफाईकर्मियों के परिवार को किसी तरह का कोई मुआवज़ा भी नहीं मिलता. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में सीवर सफाईकर्मियों की हालत का़फी दयनीय है. दिल्ली जल बोर्ड के कर्मचारी बताते हैं कि कागजों पर उनका वेतन 7000 रुपये है, लेकिन उन्हें मिलते स़िर्फ 3500 रुपये हैं. बाकी के पैसे बाबू और ठेकेदार खा जाते हैं. सफाईकर्मियों के नेता हरज्ञान सिंह और वेद प्रकाश कहते हैं कि एक तऱफ जहां दिल्ली की जनसंख्या बढ़ गई है, वहीं सफाईकर्मियों की संख्या लगातार घटती जा रही है. जल बोर्ड ने अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए सीवर सफाई का काम ठेके के रूप में निजी कंपनियों को देना शुरू कर दिया है, जो नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा रही हैं. बावजूद इसके कोई कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है. सफ़ाईकर्मियों की सुरक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. दिल्ली जल बोर्ड के नियमों के मुताबिक, सीवर में किसी सफाईकर्मी के उतरने से पहले यह जांच होनी बहुत ज़रूरी है कि उसमें किसी भी तरह की ज़हरीली गैस तो नहीं है, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं होता. जो सफाईकर्मी जहरीली गैस से बच जाते हैं, वे कई तरह की जानलेवा बीमारियों की चपेट में आकर धीमी मौत के पंजे में फंस जाते है. सीवर में कई तरह के अपशिष्ट पदार्थ, जैसे कांच के टुकड़े और फैक्ट्रियों से निकलने वाले हानिकारक केमिकल होते हैं, जो उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं. सीवर से निकलने वाली मिथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड आदि गैसों की चपेट में आकर सफाईकर्मी अक्सर अपनी जान गंवा बैठते हैं. इन गैसों की चपेट में आने के बाद बचे लोगों को टीबी, अस्थमा और लकवा जैसी जानलेवा बीमारियां हो जाना आम बात है. आजमगढ़ के 38 वर्षीय संजय सेंट्रल दिल्ली के एमसीडी में काम करते हैं. वह पांचवीं पास हैं और कहते हैं कि हम सुबह चार बजे ही चले जाते हैं. पैसे की कमी के चलते हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते और न अच्छा खाना. 3500 रुपये में घर चलाना मुश्किल हो जाता है, जिसमें ज़्यादातर पैसा इलाज में खर्च हो जाता है. हमारे पास रहने के लिए घर भी नहीं है, तिरपाल डालकर गुजारा करते हैं. हम दिहाड़ी पर काम करते हैं. इसलिए हमें मकान नहीं मिल सकता. हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे इस धंधे को अपनाएं. समाज मे हमें अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता. हमारे धंधे के बारे में पता चलने के बाद कोई हमसे बात भी करना पसंद नहीं करता. नेशनल कैंपेन फॉर द डिग्नीटी एंड राइट्‌स ऑफ सीवेज वर्कर्स के रिपोर्ट की माने तो करीब 37.2 प्रतिशत सीवर सफाईकर्मी पुनर्वास कॉलोनियों, 27 प्रतिशत किराए के घरों, 11.3 प्रतिशत झुग्गी झोपड़ियों और 13 प्रतिशत अनाधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं. मात्र 13 प्रतिशत ऐसे हैं, जो सरकारी मकानों में रहते हैं. करीब 70 प्रतिशत सफाई कर्मचारी अपने रिटायरमेंट तक जीवित रहते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता हेमलता कहती हैं कि वरिष्ठ अधिकारियों को चाहिए कि वे सीवर सफ़ाई का कार्य विभागीय नियमों के मुताबिक कराने के लिए सख्त कदम उठाएं. हेमलता बताती हैं कि उन्होंने इसके लिए सफ़ाईकर्मियों के साथ धरने भी दिए, मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पास भी गईं, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. नंद नगरी की एक महिला ने पहले पति और बाद में अपने दो जवान बेटे खो दिए. सीवर ने जवानी में सुहाग उजाड़ा और बुढ़ापे में कोख. एक ही घर में तीन-तीन विधवाएं हैं. सीवर की सफाई करते समय जान गंवाने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है. अब तक काफी मौतें हो चुकी हैं और हो रही हैं यानी कभी खत्म न होने वाला एक अंतहीन सिलसिला, लेकिन इससे निपटने के लिए सरकार कोई ठोस उपाय नहीं कर रही है. ऐसे में सफाईकर्मियों के पास अपनी जान देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.

काम करने के पुराने तरीके

देश में 1.2 मिलियन सीवर सफाई कर्मचारी काम करते हैं. सदियों से उनके काम करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया. हालांकि सरकार ने उनके लिए कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन उनका कोई लाभ उन्हें शायद ही मिलता हो. सीवर काफी खतरनाक होते हैं. विकसित देशों में सीवर सफाईकर्मी पूरी तरह ड्रेसअप होते हैं और मेनहोल सा़फ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं. हांगकांग में सीवर सफाईकर्मियों को एक निश्चित समय के प्रशिक्षण के साथ-साथ 15 प्रकार के लाइसेंस-परमिट हासिल करने पड़ते हैं, लेकिन भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है.

स्वास्थ्य सुविधाएं भी मयस्सर नहीं

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 61.6 प्रतिशत सीवर सफाईकर्मी किसी न किसी बीमारी के शिकार हैं. वे सर्दी, जुकाम, बुखार, बदन दर्द, सिरदर्द और श्वांस संबंधी दिक्कतों से अक्सर दो-चार रहते हैं. 15.6 प्रतिशत सफाईकर्मी त्वचा संबंधी बीमारियों के शिकार हैं, वहीं 10.4 प्रतिशत सफाईकर्मी टीबी और कैंसर जैसी महामारी से जूझ रहे हैं. 48.8 प्रतिशत सफाईकर्मियों का कहना था कि काम करने के लगभग 6 महीने के दौरान ही उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. 63.2 प्रतिशत सफाईकर्मी इलाज के लिए सरकारी अस्पताल या डिस्पेंसरी जाते हैं, जबकि 35.2 प्रतिशत निजी अस्पतालों का सहारा लेते हैं. 70.8 प्रतिशत सफाईकर्मियों का कहना था कि उन्हें सरकारी अस्पतालों में किसी तरह की सुविधा नहीं मिलती. उन्हें इलाज के लिए पैसों की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है. पैसे न होने पर उन्हें सूदखोरों की शरण में जाना पड़ता हैं, जिनके चंगुल में एक बार फंस जाने के बाद निकलना मुश्किल है, लेकिन कोई और विकल्प भी नहीं है. सफाईकर्मियों में कुछ तो काम के दौरान विभिन्न बीमारियों के शिकार हो गए, वहीं कुछ पहले से अस्वस्थ हैं. ज़्यादातर सफाईकर्मियों को टीकाकरण के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है. सर्वेक्षण के अनुसार, स़िर्फ 5 प्रतिशत लोग ही टीकाकरण के बारे में जानते हैं. 94.9 प्रतिशत लोगों का कहना था कि उन्हें कभी किसी तरह का टीका नहीं लगा.

प्रशिक्षण और सफाई उपकरणों का अभाव

कुछ गैर सरकारी संगठनों ने सीवर सफाईकर्मियों की लगातार हो रही मौतों के संबंध में एक अध्ययन किया, जिससे पता चला कि अधिकतर सफाईकर्मियों की मौत अप्रशिक्षित होने और सुरक्षा उपकरणों के अभाव के चलते होती है. 1996 में मुंबई हाईकोर्ट ने निर्देश जारी किया था कि सीवर की सफाई करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना कानूनन अनिवार्य है. वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सीवर की सफाई करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण देने के लिए दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिए थे. दिल्ली सरकार सीवर साफ करने वाले उपकरणों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन सफाईकर्मियों का कहना है कि उन्हें इस तरह का कोई उपकरण नहीं दिया जाता. उपकरण होते भी हैं तो वे दिल्ली जल बोर्ड के स्टोर रूम में बंद पड़े रहते हैं. एक सर्वे के अनुसार, सेफ्टी बेल्ट, गैस सिलेंडर, हेलमेट, बॉडी शूट, गम बूट्‌स, ग्लोब्स, ऑक्सीजन मास्क और टॉर्च के बारे में ज़्यादातर सफाईकर्मियों को कोई जानकारी नहीं होती. सीवर सफाई के दौरान मास्क, दस्ताने, जैकेट और जूते पहनना बहुत ज़रूरी है, लेकिन ऐसा नहीं किया जाता. सफाई कर्मचारी स़िर्फ एक मोटी रस्सी के सहारे मेनहोल में उतर जाते हैं और अपनी जान गंवा बैठते हैं.

देश भर में हुई मौतें

2002-03 320
2003-04 316
2004-05 288
6 मई, 2007 03
31 मई, 2012 02
20 जून, 2012 02
27 जून, 2012 01 

Loading...
loading...

Leave a Reply