सिजोफ्रेनिया : जब खुद की ही ख़बर न हो

0
641
views

सिजोफे्रनिया एक ऐसी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति अपने होशोहवास खो बैठता है. ऐसे में वह कल्पना और यथार्थ का फ़र्क ही नहीं समझ पाता. दरअसल, वह अपनी कल्पनाओं में इतना आगे निकल जाता है कि उसे कल्पना ही सच लगने लगती है. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इस बीमारी की चपेट में रचनात्मक लोग ज़्यादा आते हैं. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि अपने जमाने की जानी-मानी अभिनेत्री नलिनी जयवंत, परवीन बॉबी, अभिनेता राजकिरण, उर्दू के जाने-माने शायर मजाज लखनवी एवं मीर तकी मीर भी इस बीमारी से ग्रसित थे . कैसे होते हैं सिजोफे्रनिया के मरीज और कैसे करनी चाहिए उनकी देखभाल, जानिए मनोचिकित्सक से…

चर्चित  निर्देशक अपर्णा सेन ने 15 पार्क एवेन्यू नामक एक फिल्म बनाई थी, जिसमें मीठ्ठी (कोंकणा सेन) इस पते की तलाश करती है. मीठ्ठी को यह विश्‍वास है कि इस पते पर वह अपने पति एवं पांच बच्चों के साथ रहती है. वह अपनी कल्पना में इतनी गहराई तक उतर चुकी है कि उसे अपने काल्पनिक पति एवं बच्चों के अलावा, और कुछ भी दिखाई नहीं देता. वह अपनी कल्पना में न जाने क्या-क्या कहानियां गढ़ लेती है. वह अपने आस-पास जो भी देखती और सुनती है, उसे ख़ुद और अपने काल्पनिक पति से रिलेट कर लेती है. दरअसल, इस फिल्म में मीठ्ठी एक बीमारी से जूझ रही है, जिसे सिजोफ्रेनिया या खंडित मानसिकता कहते हैं. इस बीमारी में मरीज़ का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ जाता है. कई बार लंबे समय तक इस गंभीर मानसिक त्रासदी से गुजरने के बाद इस रोग की चरम परिणति मरीज़ द्वारा हत्या या आत्महत्या के रूप में भी देखी गई है. हालांकि इस बीमारी का सफलतापूर्वक इलाज हो सकता है, लेकिन हमारे देश में इस रोग के प्रति जागरूकता न होने के कारण मरीज़ को समय पर उचित इलाज नहीं मिल पाता. हमारे देश में इस बीमारी को लेकर कई तरह के अंधविश्‍वास भी देखे गए हैं. ख़ास तौर पर गांवों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का प्रकोप समझते हैं और इलाज के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेकर तांत्रिकों या ढोंगी बाबाओं के पास पहुंच जाते हैं. इससे मरीज़ की स्थिति बज़ाय सुधरने के और भी बिगड़ जाती है.

बढ़ते शहरीकरण, टूटते संयुक्त परिवार, करियर का दबाव, पैसा कमाने की होड़ और घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण कई तरह की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं. इससे अकेलापन, उदासी एवं तनाव जैसे मानसिक रोग भी बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं. मानसिक रोगों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पहली श्रेणी में वह परिस्थिति आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना का अंतर समझता है और दूसरी श्रेणी में सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना के बीच का फ़र्क भूल जाता है. इस बीमारी के बारे में विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में मानसिक रोग बहुत तेज़ी से बढ़ेंगे. एक सर्वे के मुताबिक, पूरी दुनिया में लगभग 2.4 करोड़ लोग इस बीमारी से पीडित हैं. सामान्य तौर पर 15 से 35 वर्ष के लोग इससे ग्रसित होते हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में इस रोग से संबंधित रोगियों की संख्या बहुत ज़्यादा ब़ढ जाएगी. यह बीमारी पुरुष और महिला, दोनों में समान रूप से होती है. एक सर्वे के मुताबिक, 70 प्रतिशत लोग इस बीमारी से इलाज के बाद सामान्य जीवन जीते हुए देखे गए हैं, 20 प्रतिशत लोगों में यह बीमारी काफी लंबी देखी गई है, जिन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत थी, वहीं दूसरी ओर 10 प्रतिशत लोगों ने इस बीमारी में मौत को गले लगा लिया. इनमें अधिकतर युवा एवं प्रौ़ढ पुरुष थे.

क्या है सिजोफ्रेनिया
इसमें रोगी सच और कल्पना के बीच का अंतर नहीं समझ पाता. यह अत्यंत गंभीर किस्म की मानसिक बीमारी है. रोगी भारी मानसिक पीड़ा से गुजरता है. वह अपने ही विचारों में खोया रहता है. उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता है और न ही उसे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. हर व्यक्ति को वह शक़ की निगाह से देखता है. जैसे उसके आस-पास के लोग उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहे हों. उसे अजीबोग़रीब डरावनी आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं, डरावनी परछाइयां दिखाई पड़ती हैं. इन सबसे घबरा कर वह हिंसा और आत्महत्या जैसे क़दम तक उठाने की कोशिश करता है. रोगी धीरे-धीरे स्वयं के प्रति उदासीन होता जाता है. यहां तक कि वह दिनचर्या के काम भी ठीक से नहीं कर पाता है. सामान्य किस्म के सिजोफ्रेनिया के मरीज़ गुमसुम और चुपचाप रहते हैं, कई बार तो उनकी हालत बच्चों जैसी भी हो जाती है, लेकिन गंभीर किस्म के सिजोफ्रेनिया के रोगी हिंसक और विद्रोही हो जाते हैं. कभी-कभी वे न केवल ख़ुद के लिए, बल्कि दूसरों के लिए भी ख़तरनाक हो जाते हैं. ऐसे में वे ख़ुद को ऩुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे प्रयास भी कर सकते हैं.

क्या हैं कारण
कुछ सालों पहले तक इस बीमारी का वास्तविक कारण पता नहीं था, लेकिन मानव मस्तिष्क और व्यवहार पर किए गए आधुनिक शोध से पता चलता है कि यह बीमारी मस्तिष्क की रासायनिक संरचना एवं कार्य-व्यवहार में आए ख़ास प्रकार के बदलाव के कारण होती है. यही नहीं, शोध यह भी कहते हैं कि मस्तिष्क में पाए जाने वाले स्नायु रसायन (न्यूरोकेमिकल्स)-डोपेमाइन और सेरोटोना के स्तर में परिवर्तन की वजह से भी यह बीमारी होती है. यह बीमारी तनाव के कारण नहीं होती है, लेकिन जिस व्यक्ति के अंदर आनुवांशिक तौर पर यह बीमारी होने की आशंका होती है, उसमें तनाव के कारण ही यह उभर कर बाहर आ जाती है. कई बार ऐसी कोई घटना, जिससे व्यक्ति को शॉक लगे, उस परिस्थिति में भी वह सिजोफे्रनिया की चपेट में आ सकता है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अविवाहित पुरुष नौकरी से संबंधित परेशानियों, दोस्तों एवं परिवार द्वारा नीचा दिखाने पर हीनभावना का शिकार होने के कारण भी कई बार सिजोफ्रेनिया की चपेट में आ जाते हैं.

किन्हें होती है यह बीमारी
माता-पिता में किसी एक को यह बीमारी होने पर उनके बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 15 से 20 प्रतिशत तक होती है, जबकि माता-पिता दोनों को यह बीमारी होने पर बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 60 प्रतिशत तक हो सकती है. जुड़वा बच्चों में से एक को यह बीमारी होने पर दूसरे बच्चे को भी यह बीमारी होने की आशंका शत-प्रतिशत होती है. सिजोफ्रेनिया की बीमारी आम तौर पर युवावस्था में ख़ास तौर पर 15-16 साल की उम्र में ही शुरू हो जाती है. कुछ लोगों में यह बीमारी ज़्यादा तेजी से बढ़ती है और धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण कर लेती है.

क्या है इलाज
जब इस बीमारी को लेकर किसी तरह की कोई जागरूकता नहीं थी, तब इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पागल क़रार दिया जाता था. उसे सालों तक पागलखाने या मानसिक अस्पताल में रखा जाता था. जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान में तरक्की हो रही है, वैसे-वैसे इसके इलाज के तरीक़ों में निरंतर सुधार हो रहा है. इस बीमारी के इलाज से पहले किसी मनोचिकित्सक से इसकी अच्छी तरह से पहचान आवश्यक है. इसके लिए मनोवैज्ञानिक जांच के अलावा, परिवार के इतिहास की जानकारी भी ली जाती है. इसके बाद बीमारी के कारण का पता लगाया जाता है. दिल्ली साइकिएट्रिक सेंटर के डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि आज इस बीमारी के सफल इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन जैसी दवाइयां और इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी (ईसीटी) उपलब्ध हैं. ग़ौरतलब है कि इन दिनों इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन का ही सबसे अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं सिजोफ्रेनिया के मरीजों को उपचार के बाद समाज की मुख्य धारा से जोड़ने एवं सामान्य गतिविधियों के योग्य बनाने के लिए चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार और समाज का सामूहिक प्रयास भी आवश्यक है. इसके अलावा, इस बीमारी के इलाज के तौर पर दवाइयों से उपचार के साथ ही फैमिली थेरेपी, पर्सनल साइकोथेरेपी और काउंसलिंग का सहारा भी लिया जाता है. हालांकि कुछ रोगियों में इलाज के लिए ईसीटी (इलेक्ट्रो थेरेपी, बिजली के ज़रिए उपचार) का भी सहारा लिया जाता है. गंभीर किस्म के वैसे रोगी, जिन पर दवा असर नहीं करती है, उनके लिए ईसीटी अत्यंत सुरक्षित और प्रभावकारी होती है. ख़ासकर, हिंसक व्यवहार वाले रोगियों पर इसका तुरंत असर होता है और उनकी हिंसक प्रवृत्ति तुरंत बंद हो जाती है. डॉक्टर सुनील कहते हैं कि हालांकि ईसीटी को लेकर कई तरह की ग़लत धारणाएं हैं जैसे कि ईसीटी के बाद रोगी पर दवा असर नहीं करती है, ईसीटी से रोगी को झटका लगता है, एक बार ईसीटी लगने पर बार-बार ईसीटी देनी पड़ती है आदि. लेकिन यह महज भ्रम है, इससे रोगी को बिल्कुल नुक़सान नहीं होता है.

डॉ. सुनील कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब ख़ुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफ़ी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज़ से उन मरीज़ों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका है. इसके लिए परिवार के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जाता है. उन्हें यह बताया जाता है कि वे रोगी के साथ कैसा बर्ताव करेंगे, कैसी भावना प्रकट करेंगे और उसके काम-काज में किस तरह से मदद करेंगे. आम तौर पर सिजोफ्रेनिया के रोगी को अस्पताल में रखने की ज़रूरत नहीं होती है, लेकिन गंभीर किस्म के रोगियों को कुछ दिनों या हफ्तों के लिए किसी मानसिक अस्पताल में रखना पड़ सकता है. यहां उन्हें प्रशिक्षित चिकित्सक और नर्स की देखरेख में रखा जाता है. उनका बिहेवियर थेरेपी चार्ट बनाया जाता है और इसमें उनके सुधार को नोट किया जाता है. रोगी को अपना काम ख़ुद करने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है.

सिजोफ्रेनिया मानसिक बीमारी है
विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने सिजोफ्रेनिया को युवाओं का सबसे बड़ी क्षमतानाशक यानी डिसएब्लर बताया है. विश्‍व की 10 सबसे बड़ी अक्षम बनाने वाली बीमारियों में सिजोफ्रेनिया को भी शामिल किया गया है. यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जो न स़िर्फ रोगी की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि उसके परिजनों के लिए भी एक सिरदर्द बन जाती है. यह ज़्यादातर युवाओं को उस वक्त प्रभावित करती है, जब उनकी तरक्की और कार्य करने की क्षमता शिखर पर होती है. अक्सर सिजोफ्रेनिया को लोग युवावस्था की स्वाभाविक समस्या या युवाओं की सनक मानने की भूल कर बैठते हैं.

रचनात्मक लोग मानसिक बीमारी की चपेट में ज़्यादा होते हैं
नए अध्ययन बताते हैं कि रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग आम लोगों की तुलना में मानसिक बीमारियों की चपेट में ज़्यादा आते हैं. रचनात्मकता और सिजोफ्रेनिया के बीच गहरा संबंध है. कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने 10 लाख, 20 हज़ार मरीजों और उनके रिश्तेदारों पर शोध किया. इस शोध में पता चला कि कई मानसिक बीमारियां, जैसे बायपोलर डिसऑर्डर उन लोगों के पूरे समूह में अधिक फैली हुई है, जो कलात्मक या वैज्ञानिक पेशे से ताल्लुक रखते हैं. इनमें नृत्यांगनाएं, शोधकर्ता, शायर, फोटोग्राफर एवं लेखक शामिल हैं. शोध के मुताबिक, लेखकों को सिजोफ्रेनिया, अवसाद, बेचैनी और मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या अधिक होती है. सामान्य लोगों के मुक़ाबले ऐसे लेखकों में आत्महत्या करने की आशंका भी 50 फ़ीसद ज़्यादा रहती है. इसके  साथ ही शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सिजोफ्रेनिया, बायपोलर डिसऑर्डर और एनोरेक्सिया नर्वोसा से पीड़ित मरीजों के क़रीबी रिश्तेदारों में रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग अधिक होते हैं.

डॉ. सुनील मित्तल  कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब खुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज से उन मरीजों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है.

चर्चित  निर्देशक अपर्णा सेन ने 15 पार्क एवेन्यू नामक एक फिल्म बनाई थी, जिसमें मीठ्ठी (कोंकणा सेन) इस पते की तलाश करती है. मीठ्ठी को यह विश्‍वास है कि इस पते पर वह अपने पति एवं पांच बच्चों के साथ रहती है. वह अपनी कल्पना में इतनी गहराई तक उतर चुकी है कि उसे अपने काल्पनिक पति एवं बच्चों के अलावा, और कुछ भी दिखाई नहीं देता. वह अपनी कल्पना में न जाने क्या-क्या कहानियां गढ़ लेती है. वह अपने आस-पास जो भी देखती और सुनती है, उसे ख़ुद और अपने काल्पनिक पति से रिलेट कर लेती है. दरअसल, इस फिल्म में मीठ्ठी एक बीमारी से जूझ रही है, जिसे सिजोफ्रेनिया या खंडित मानसिकता कहते हैं. इस बीमारी में मरीज़ का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ जाता है. कई बार लंबे समय तक इस गंभीर मानसिक त्रासदी से गुजरने के बाद इस रोग की चरम परिणति मरीज़ द्वारा हत्या या आत्महत्या के रूप में भी देखी गई है. हालांकि इस बीमारी का सफलतापूर्वक इलाज हो सकता है, लेकिन हमारे देश में इस रोग के प्रति जागरूकता न होने के कारण मरीज़ को समय पर उचित इलाज नहीं मिल पाता. हमारे देश में इस बीमारी को लेकर कई तरह के अंधविश्‍वास भी देखे गए हैं. ख़ास तौर पर गांवों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का प्रकोप समझते हैं और इलाज के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेकर तांत्रिकों या ढोंगी बाबाओं के पास पहुंच जाते हैं. इससे मरीज़ की स्थिति बज़ाय सुधरने के और भी बिगड़ जाती है.
बढ़ते शहरीकरण, टूटते संयुक्त परिवार, करियर का दबाव, पैसा कमाने की होड़ और घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण कई तरह की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं. इससे अकेलापन, उदासी एवं तनाव जैसे मानसिक रोग भी बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं. मानसिक रोगों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पहली श्रेणी में वह परिस्थिति आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना का अंतर समझता है और दूसरी श्रेणी में सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना के बीच का फ़र्क भूल जाता है. इस बीमारी के बारे में विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में मानसिक रोग बहुत तेज़ी से बढ़ेंगे. एक सर्वे के मुताबिक, पूरी दुनिया में लगभग 2.4 करोड़ लोग इस बीमारी से पीडित हैं. सामान्य तौर पर 15 से 35 वर्ष के लोग इससे ग्रसित होते हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में इस रोग से संबंधित रोगियों की संख्या बहुत ज़्यादा ब़ढ जाएगी. यह बीमारी पुरुष और महिला, दोनों में समान रूप से होती है. एक सर्वे के मुताबिक, 70 प्रतिशत लोग इस बीमारी से इलाज के बाद सामान्य जीवन जीते हुए देखे गए हैं, 20 प्रतिशत लोगों में यह बीमारी काफी लंबी देखी गई है, जिन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत थी, वहीं दूसरी ओर 10 प्रतिशत लोगों ने इस बीमारी में मौत को गले लगा लिया. इनमें अधिकतर युवा एवं प्रौ़ढ पुरुष थे.
क्या है सिजोफ्रेनिया
इसमें रोगी सच और कल्पना के बीच का अंतर नहीं समझ पाता. यह अत्यंत गंभीर किस्म की मानसिक बीमारी है. रोगी भारी मानसिक पीड़ा से गुजरता है. वह अपने ही विचारों में खोया रहता है. उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता है और न ही उसे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. हर व्यक्ति को वह शक़ की निगाह से देखता है. जैसे उसके आस-पास के लोग उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहे हों. उसे अजीबोग़रीब डरावनी आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं, डरावनी परछाइयां दिखाई पड़ती हैं. इन सबसे घबरा कर वह हिंसा और आत्महत्या जैसे क़दम तक उठाने की कोशिश करता है. रोगी धीरे-धीरे स्वयं के प्रति उदासीन होता जाता है. यहां तक कि वह दिनचर्या के काम भी ठीक से नहीं कर पाता है. सामान्य किस्म के सिजोफ्रेनिया के मरीज़ गुमसुम और चुपचाप रहते हैं, कई बार तो उनकी हालत बच्चों जैसी भी हो जाती है, लेकिन गंभीर किस्म के सिजोफ्रेनिया के रोगी हिंसक और विद्रोही हो जाते हैं.
कभी-कभी वे न केवल ख़ुद के लिए, बल्कि दूसरों के लिए भी ख़तरनाक हो जाते हैं. ऐसे में वे ख़ुद को ऩुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे प्रयास भी कर सकते हैं.
क्या हैं कारण
कुछ सालों पहले तक इस बीमारी का वास्तविक कारण पता नहीं था, लेकिन मानव मस्तिष्क और व्यवहार पर किए गए आधुनिक शोध से पता चलता है कि यह बीमारी मस्तिष्क की रासायनिक संरचना एवं कार्य-व्यवहार में आए ख़ास प्रकार के बदलाव के कारण होती है. यही नहीं, शोध यह भी कहते हैं कि मस्तिष्क में पाए जाने वाले स्नायु रसायन (न्यूरोकेमिकल्स)-डोपेमाइन और सेरोटोना के स्तर में परिवर्तन की वजह से भी यह बीमारी होती है. यह बीमारी तनाव के कारण नहीं होती है, लेकिन जिस व्यक्ति के अंदर आनुवांशिक तौर पर यह बीमारी होने की आशंका होती है, उसमें तनाव के कारण ही यह उभर कर बाहर आ जाती है. कई बार ऐसी कोई घटना, जिससे व्यक्ति को शॉक लगे, उस परिस्थिति में भी वह सिजोफे्रनिया की चपेट में आ सकता है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अविवाहित पुरुष नौकरी से संबंधित परेशानियों, दोस्तों एवं परिवार द्वारा नीचा दिखाने पर हीनभावना का शिकार होने के कारण भी कई बार सिजोफ्रेनिया की चपेट में आ जाते हैं.
किन्हें होती है यह बीमारी
माता-पिता में किसी एक को यह बीमारी होने पर उनके बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 15 से 20 प्रतिशत तक होती है, जबकि माता-पिता दोनों को यह बीमारी होने पर बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 60 प्रतिशत तक हो सकती है. जुड़वा बच्चों में से एक को यह बीमारी होने पर दूसरे बच्चे को भी यह बीमारी होने की आशंका शत-प्रतिशत होती है. सिजोफ्रेनिया की बीमारी आम तौर पर युवावस्था में ख़ास तौर पर 15-16 साल की उम्र में ही शुरू हो जाती है. कुछ लोगों में यह बीमारी ज़्यादा तेजी से बढ़ती है और धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण कर लेती है.
क्या है इलाज
जब इस बीमारी को लेकर किसी तरह की कोई जागरूकता नहीं थी, तब इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पागल क़रार दिया जाता था. उसे सालों तक पागलखाने या मानसिक अस्पताल में रखा जाता था. जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान में तरक्की हो रही है, वैसे-वैसे इसके इलाज के तरीक़ों में निरंतर सुधार हो रहा है. इस बीमारी के इलाज से पहले किसी मनोचिकित्सक से इसकी अच्छी तरह से पहचान आवश्यक है. इसके लिए मनोवैज्ञानिक जांच के अलावा, परिवार के इतिहास की जानकारी भी ली जाती है. इसके बाद बीमारी के कारण का पता लगाया जाता है. दिल्ली साइकिएट्रिक सेंटर के डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि आज इस बीमारी के सफल इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन जैसी दवाइयां और इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी (ईसीटी) उपलब्ध हैं. ग़ौरतलब है कि इन दिनों इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन का ही सबसे अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं सिजोफ्रेनिया के मरीजों को उपचार के बाद समाज की मुख्य धारा से जोड़ने एवं सामान्य गतिविधियों के योग्य बनाने के लिए चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार और समाज का सामूहिक प्रयास भी आवश्यक है. इसके अलावा, इस बीमारी के इलाज के तौर पर दवाइयों से उपचार के साथ ही फैमिली थेरेपी, पर्सनल साइकोथेरेपी और काउंसलिंग का सहारा भी लिया जाता है. हालांकि कुछ रोगियों में इलाज के लिए ईसीटी (इलेक्ट्रो थेरेपी, बिजली के ज़रिए उपचार) का भी सहारा लिया जाता है. गंभीर किस्म के वैसे रोगी, जिन पर दवा असर नहीं करती है, उनके लिए ईसीटी अत्यंत सुरक्षित और प्रभावकारी होती है. ख़ासकर, हिंसक व्यवहार वाले रोगियों पर इसका तुरंत असर होता है और उनकी हिंसक प्रवृत्ति तुरंत बंद हो जाती है. डॉक्टर सुनील कहते हैं कि हालांकि ईसीटी को लेकर कई तरह की ग़लत धारणाएं हैं जैसे कि ईसीटी के बाद रोगी पर दवा असर नहीं करती है, ईसीटी से रोगी को झटका लगता है, एक बार ईसीटी लगने पर बार-बार ईसीटी देनी पड़ती है आदि. लेकिन यह महज भ्रम है, इससे रोगी को बिल्कुल नुक़सान नहीं होता है.
डॉ. सुनील कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब ख़ुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफ़ी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज़ से उन मरीज़ों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका है. इसके लिए परिवार के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जाता है. उन्हें यह बताया जाता है कि वे रोगी के साथ कैसा बर्ताव करेंगे, कैसी भावना प्रकट करेंगे और उसके काम-काज में किस तरह से मदद करेंगे. आम तौर पर सिजोफ्रेनिया के रोगी को अस्पताल में रखने की ज़रूरत नहीं होती है, लेकिन गंभीर किस्म के रोगियों को कुछ दिनों या हफ्तों के लिए किसी मानसिक अस्पताल में रखना पड़ सकता है. यहां उन्हें प्रशिक्षित चिकित्सक और नर्स की देखरेख में रखा जाता है. उनका बिहेवियर थेरेपी चार्ट बनाया जाता है और इसमें उनके सुधार को नोट किया जाता है. रोगी को अपना काम ख़ुद करने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है.
सिजोफ्रेनिया मानसिक बीमारी है
विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने सिजोफ्रेनिया को युवाओं का सबसे बड़ी क्षमतानाशक यानी डिसएब्लर बताया है. विश्‍व की 10 सबसे बड़ी अक्षम बनाने वाली बीमारियों में सिजोफ्रेनिया को भी शामिल किया गया है. यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जो न स़िर्फ रोगी की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि उसके परिजनों के लिए भी एक सिरदर्द बन जाती है. यह ज़्यादातर युवाओं को उस वक्त प्रभावित करती है, जब उनकी तरक्की और कार्य करने की क्षमता शिखर पर होती है. अक्सर सिजोफ्रेनिया को लोग युवावस्था की स्वाभाविक समस्या या युवाओं की सनक मानने की भूल कर बैठते हैं.
रचनात्मक लोग मानसिक
बीमारी की चपेट में ज़्यादा होते हैं
नए अध्ययन बताते हैं कि रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग आम लोगों की तुलना में मानसिक बीमारियों की चपेट में ज़्यादा आते हैं. रचनात्मकता और सिजोफ्रेनिया के बीच गहरा संबंध है. कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने 10 लाख, 20 हज़ार मरीजों और उनके रिश्तेदारों पर शोध किया. इस शोध में पता चला कि कई मानसिक बीमारियां, जैसे बायपोलर डिसऑर्डर उन लोगों के पूरे समूह में अधिक फैली हुई है, जो कलात्मक या वैज्ञानिक पेशे से ताल्लुक रखते हैं. इनमें नृत्यांगनाएं, शोधकर्ता, शायर, फोटोग्राफर एवं लेखक शामिल हैं. शोध के मुताबिक, लेखकों को सिजोफ्रेनिया, अवसाद, बेचैनी और मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या अधिक होती है. सामान्य लोगों के मुक़ाबले ऐसे लेखकों में आत्महत्या करने की आशंका भी 50 फ़ीसद ज़्यादा रहती है. इसके  साथ ही शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सिजोफ्रेनिया, बायपोलर डिसऑर्डर और एनोरेक्सिया नर्वोसा से पीड़ित मरीजों के क़रीबी रिश्तेदारों में रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग अधिक होते हैं.

डॉ. सुनील मित्तल  कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब खुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज से उन मरीजों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है.
– See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf

चर्चित  निर्देशक अपर्णा सेन ने 15 पार्क एवेन्यू नामक एक फिल्म बनाई थी, जिसमें मीठ्ठी (कोंकणा सेन) इस पते की तलाश करती है. मीठ्ठी को यह विश्‍वास है कि इस पते पर वह अपने पति एवं पांच बच्चों के साथ रहती है. वह अपनी कल्पना में इतनी गहराई तक उतर चुकी है कि उसे अपने काल्पनिक पति एवं बच्चों के अलावा, और कुछ भी दिखाई नहीं देता. वह अपनी कल्पना में न जाने क्या-क्या कहानियां गढ़ लेती है. वह अपने आस-पास जो भी देखती और सुनती है, उसे ख़ुद और अपने काल्पनिक पति से रिलेट कर लेती है. दरअसल, इस फिल्म में मीठ्ठी एक बीमारी से जूझ रही है, जिसे सिजोफ्रेनिया या खंडित मानसिकता कहते हैं. इस बीमारी में मरीज़ का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ जाता है. कई बार लंबे समय तक इस गंभीर मानसिक त्रासदी से गुजरने के बाद इस रोग की चरम परिणति मरीज़ द्वारा हत्या या आत्महत्या के रूप में भी देखी गई है. हालांकि इस बीमारी का सफलतापूर्वक इलाज हो सकता है, लेकिन हमारे देश में इस रोग के प्रति जागरूकता न होने के कारण मरीज़ को समय पर उचित इलाज नहीं मिल पाता. हमारे देश में इस बीमारी को लेकर कई तरह के अंधविश्‍वास भी देखे गए हैं. ख़ास तौर पर गांवों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का प्रकोप समझते हैं और इलाज के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेकर तांत्रिकों या ढोंगी बाबाओं के पास पहुंच जाते हैं. इससे मरीज़ की स्थिति बज़ाय सुधरने के और भी बिगड़ जाती है.
बढ़ते शहरीकरण, टूटते संयुक्त परिवार, करियर का दबाव, पैसा कमाने की होड़ और घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण कई तरह की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं. इससे अकेलापन, उदासी एवं तनाव जैसे मानसिक रोग भी बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं. मानसिक रोगों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पहली श्रेणी में वह परिस्थिति आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना का अंतर समझता है और दूसरी श्रेणी में सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना के बीच का फ़र्क भूल जाता है. इस बीमारी के बारे में विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में मानसिक रोग बहुत तेज़ी से बढ़ेंगे. एक सर्वे के मुताबिक, पूरी दुनिया में लगभग 2.4 करोड़ लोग इस बीमारी से पीडित हैं. सामान्य तौर पर 15 से 35 वर्ष के लोग इससे ग्रसित होते हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में इस रोग से संबंधित रोगियों की संख्या बहुत ज़्यादा ब़ढ जाएगी. यह बीमारी पुरुष और महिला, दोनों में समान रूप से होती है. एक सर्वे के मुताबिक, 70 प्रतिशत लोग इस बीमारी से इलाज के बाद सामान्य जीवन जीते हुए देखे गए हैं, 20 प्रतिशत लोगों में यह बीमारी काफी लंबी देखी गई है, जिन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत थी, वहीं दूसरी ओर 10 प्रतिशत लोगों ने इस बीमारी में मौत को गले लगा लिया. इनमें अधिकतर युवा एवं प्रौ़ढ पुरुष थे.
क्या है सिजोफ्रेनिया
इसमें रोगी सच और कल्पना के बीच का अंतर नहीं समझ पाता. यह अत्यंत गंभीर किस्म की मानसिक बीमारी है. रोगी भारी मानसिक पीड़ा से गुजरता है. वह अपने ही विचारों में खोया रहता है. उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता है और न ही उसे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. हर व्यक्ति को वह शक़ की निगाह से देखता है. जैसे उसके आस-पास के लोग उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहे हों. उसे अजीबोग़रीब डरावनी आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं, डरावनी परछाइयां दिखाई पड़ती हैं. इन सबसे घबरा कर वह हिंसा और आत्महत्या जैसे क़दम तक उठाने की कोशिश करता है. रोगी धीरे-धीरे स्वयं के प्रति उदासीन होता जाता है. यहां तक कि वह दिनचर्या के काम भी ठीक से नहीं कर पाता है. सामान्य किस्म के सिजोफ्रेनिया के मरीज़ गुमसुम और चुपचाप रहते हैं, कई बार तो उनकी हालत बच्चों जैसी भी हो जाती है, लेकिन गंभीर किस्म के सिजोफ्रेनिया के रोगी हिंसक और विद्रोही हो जाते हैं.
कभी-कभी वे न केवल ख़ुद के लिए, बल्कि दूसरों के लिए भी ख़तरनाक हो जाते हैं. ऐसे में वे ख़ुद को ऩुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे प्रयास भी कर सकते हैं.
क्या हैं कारण
कुछ सालों पहले तक इस बीमारी का वास्तविक कारण पता नहीं था, लेकिन मानव मस्तिष्क और व्यवहार पर किए गए आधुनिक शोध से पता चलता है कि यह बीमारी मस्तिष्क की रासायनिक संरचना एवं कार्य-व्यवहार में आए ख़ास प्रकार के बदलाव के कारण होती है. यही नहीं, शोध यह भी कहते हैं कि मस्तिष्क में पाए जाने वाले स्नायु रसायन (न्यूरोकेमिकल्स)-डोपेमाइन और सेरोटोना के स्तर में परिवर्तन की वजह से भी यह बीमारी होती है. यह बीमारी तनाव के कारण नहीं होती है, लेकिन जिस व्यक्ति के अंदर आनुवांशिक तौर पर यह बीमारी होने की आशंका होती है, उसमें तनाव के कारण ही यह उभर कर बाहर आ जाती है. कई बार ऐसी कोई घटना, जिससे व्यक्ति को शॉक लगे, उस परिस्थिति में भी वह सिजोफे्रनिया की चपेट में आ सकता है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अविवाहित पुरुष नौकरी से संबंधित परेशानियों, दोस्तों एवं परिवार द्वारा नीचा दिखाने पर हीनभावना का शिकार होने के कारण भी कई बार सिजोफ्रेनिया की चपेट में आ जाते हैं.
किन्हें होती है यह बीमारी
माता-पिता में किसी एक को यह बीमारी होने पर उनके बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 15 से 20 प्रतिशत तक होती है, जबकि माता-पिता दोनों को यह बीमारी होने पर बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 60 प्रतिशत तक हो सकती है. जुड़वा बच्चों में से एक को यह बीमारी होने पर दूसरे बच्चे को भी यह बीमारी होने की आशंका शत-प्रतिशत होती है. सिजोफ्रेनिया की बीमारी आम तौर पर युवावस्था में ख़ास तौर पर 15-16 साल की उम्र में ही शुरू हो जाती है. कुछ लोगों में यह बीमारी ज़्यादा तेजी से बढ़ती है और धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण कर लेती है.
क्या है इलाज
जब इस बीमारी को लेकर किसी तरह की कोई जागरूकता नहीं थी, तब इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पागल क़रार दिया जाता था. उसे सालों तक पागलखाने या मानसिक अस्पताल में रखा जाता था. जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान में तरक्की हो रही है, वैसे-वैसे इसके इलाज के तरीक़ों में निरंतर सुधार हो रहा है. इस बीमारी के इलाज से पहले किसी मनोचिकित्सक से इसकी अच्छी तरह से पहचान आवश्यक है. इसके लिए मनोवैज्ञानिक जांच के अलावा, परिवार के इतिहास की जानकारी भी ली जाती है. इसके बाद बीमारी के कारण का पता लगाया जाता है. दिल्ली साइकिएट्रिक सेंटर के डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि आज इस बीमारी के सफल इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन जैसी दवाइयां और इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी (ईसीटी) उपलब्ध हैं. ग़ौरतलब है कि इन दिनों इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन का ही सबसे अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं सिजोफ्रेनिया के मरीजों को उपचार के बाद समाज की मुख्य धारा से जोड़ने एवं सामान्य गतिविधियों के योग्य बनाने के लिए चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार और समाज का सामूहिक प्रयास भी आवश्यक है. इसके अलावा, इस बीमारी के इलाज के तौर पर दवाइयों से उपचार के साथ ही फैमिली थेरेपी, पर्सनल साइकोथेरेपी और काउंसलिंग का सहारा भी लिया जाता है. हालांकि कुछ रोगियों में इलाज के लिए ईसीटी (इलेक्ट्रो थेरेपी, बिजली के ज़रिए उपचार) का भी सहारा लिया जाता है. गंभीर किस्म के वैसे रोगी, जिन पर दवा असर नहीं करती है, उनके लिए ईसीटी अत्यंत सुरक्षित और प्रभावकारी होती है. ख़ासकर, हिंसक व्यवहार वाले रोगियों पर इसका तुरंत असर होता है और उनकी हिंसक प्रवृत्ति तुरंत बंद हो जाती है. डॉक्टर सुनील कहते हैं कि हालांकि ईसीटी को लेकर कई तरह की ग़लत धारणाएं हैं जैसे कि ईसीटी के बाद रोगी पर दवा असर नहीं करती है, ईसीटी से रोगी को झटका लगता है, एक बार ईसीटी लगने पर बार-बार ईसीटी देनी पड़ती है आदि. लेकिन यह महज भ्रम है, इससे रोगी को बिल्कुल नुक़सान नहीं होता है.
डॉ. सुनील कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब ख़ुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफ़ी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज़ से उन मरीज़ों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका है. इसके लिए परिवार के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जाता है. उन्हें यह बताया जाता है कि वे रोगी के साथ कैसा बर्ताव करेंगे, कैसी भावना प्रकट करेंगे और उसके काम-काज में किस तरह से मदद करेंगे. आम तौर पर सिजोफ्रेनिया के रोगी को अस्पताल में रखने की ज़रूरत नहीं होती है, लेकिन गंभीर किस्म के रोगियों को कुछ दिनों या हफ्तों के लिए किसी मानसिक अस्पताल में रखना पड़ सकता है. यहां उन्हें प्रशिक्षित चिकित्सक और नर्स की देखरेख में रखा जाता है. उनका बिहेवियर थेरेपी चार्ट बनाया जाता है और इसमें उनके सुधार को नोट किया जाता है. रोगी को अपना काम ख़ुद करने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है.
सिजोफ्रेनिया मानसिक बीमारी है
विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने सिजोफ्रेनिया को युवाओं का सबसे बड़ी क्षमतानाशक यानी डिसएब्लर बताया है. विश्‍व की 10 सबसे बड़ी अक्षम बनाने वाली बीमारियों में सिजोफ्रेनिया को भी शामिल किया गया है. यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जो न स़िर्फ रोगी की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि उसके परिजनों के लिए भी एक सिरदर्द बन जाती है. यह ज़्यादातर युवाओं को उस वक्त प्रभावित करती है, जब उनकी तरक्की और कार्य करने की क्षमता शिखर पर होती है. अक्सर सिजोफ्रेनिया को लोग युवावस्था की स्वाभाविक समस्या या युवाओं की सनक मानने की भूल कर बैठते हैं.
रचनात्मक लोग मानसिक
बीमारी की चपेट में ज़्यादा होते हैं
नए अध्ययन बताते हैं कि रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग आम लोगों की तुलना में मानसिक बीमारियों की चपेट में ज़्यादा आते हैं. रचनात्मकता और सिजोफ्रेनिया के बीच गहरा संबंध है. कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने 10 लाख, 20 हज़ार मरीजों और उनके रिश्तेदारों पर शोध किया. इस शोध में पता चला कि कई मानसिक बीमारियां, जैसे बायपोलर डिसऑर्डर उन लोगों के पूरे समूह में अधिक फैली हुई है, जो कलात्मक या वैज्ञानिक पेशे से ताल्लुक रखते हैं. इनमें नृत्यांगनाएं, शोधकर्ता, शायर, फोटोग्राफर एवं लेखक शामिल हैं. शोध के मुताबिक, लेखकों को सिजोफ्रेनिया, अवसाद, बेचैनी और मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या अधिक होती है. सामान्य लोगों के मुक़ाबले ऐसे लेखकों में आत्महत्या करने की आशंका भी 50 फ़ीसद ज़्यादा रहती है. इसके  साथ ही शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सिजोफ्रेनिया, बायपोलर डिसऑर्डर और एनोरेक्सिया नर्वोसा से पीड़ित मरीजों के क़रीबी रिश्तेदारों में रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग अधिक होते हैं.

डॉ. सुनील मित्तल  कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब खुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज से उन मरीजों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है.
– See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf

चर्चित  निर्देशक अपर्णा सेन ने 15 पार्क एवेन्यू नामक एक फिल्म बनाई थी, जिसमें मीठ्ठी (कोंकणा सेन) इस पते की तलाश करती है. मीठ्ठी को यह विश्‍वास है कि इस पते पर वह अपने पति एवं पांच बच्चों के साथ रहती है. वह अपनी कल्पना में इतनी गहराई तक उतर चुकी है कि उसे अपने काल्पनिक पति एवं बच्चों के अलावा, और कुछ भी दिखाई नहीं देता. वह अपनी कल्पना में न जाने क्या-क्या कहानियां गढ़ लेती है. वह अपने आस-पास जो भी देखती और सुनती है, उसे ख़ुद और अपने काल्पनिक पति से रिलेट कर लेती है. दरअसल, इस फिल्म में मीठ्ठी एक बीमारी से जूझ रही है, जिसे सिजोफ्रेनिया या खंडित मानसिकता कहते हैं. इस बीमारी में मरीज़ का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ जाता है. कई बार लंबे समय तक इस गंभीर मानसिक त्रासदी से गुजरने के बाद इस रोग की चरम परिणति मरीज़ द्वारा हत्या या आत्महत्या के रूप में भी देखी गई है. हालांकि इस बीमारी का सफलतापूर्वक इलाज हो सकता है, लेकिन हमारे देश में इस रोग के प्रति जागरूकता न होने के कारण मरीज़ को समय पर उचित इलाज नहीं मिल पाता. हमारे देश में इस बीमारी को लेकर कई तरह के अंधविश्‍वास भी देखे गए हैं. ख़ास तौर पर गांवों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का प्रकोप समझते हैं और इलाज के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेकर तांत्रिकों या ढोंगी बाबाओं के पास पहुंच जाते हैं. इससे मरीज़ की स्थिति बज़ाय सुधरने के और भी बिगड़ जाती है.
बढ़ते शहरीकरण, टूटते संयुक्त परिवार, करियर का दबाव, पैसा कमाने की होड़ और घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण कई तरह की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं. इससे अकेलापन, उदासी एवं तनाव जैसे मानसिक रोग भी बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं. मानसिक रोगों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पहली श्रेणी में वह परिस्थिति आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना का अंतर समझता है और दूसरी श्रेणी में सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी आती है, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना के बीच का फ़र्क भूल जाता है. इस बीमारी के बारे में विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में मानसिक रोग बहुत तेज़ी से बढ़ेंगे. एक सर्वे के मुताबिक, पूरी दुनिया में लगभग 2.4 करोड़ लोग इस बीमारी से पीडित हैं. सामान्य तौर पर 15 से 35 वर्ष के लोग इससे ग्रसित होते हैं. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आने वाले समय में इस रोग से संबंधित रोगियों की संख्या बहुत ज़्यादा ब़ढ जाएगी. यह बीमारी पुरुष और महिला, दोनों में समान रूप से होती है. एक सर्वे के मुताबिक, 70 प्रतिशत लोग इस बीमारी से इलाज के बाद सामान्य जीवन जीते हुए देखे गए हैं, 20 प्रतिशत लोगों में यह बीमारी काफी लंबी देखी गई है, जिन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत थी, वहीं दूसरी ओर 10 प्रतिशत लोगों ने इस बीमारी में मौत को गले लगा लिया. इनमें अधिकतर युवा एवं प्रौ़ढ पुरुष थे.
क्या है सिजोफ्रेनिया
इसमें रोगी सच और कल्पना के बीच का अंतर नहीं समझ पाता. यह अत्यंत गंभीर किस्म की मानसिक बीमारी है. रोगी भारी मानसिक पीड़ा से गुजरता है. वह अपने ही विचारों में खोया रहता है. उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता है और न ही उसे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. हर व्यक्ति को वह शक़ की निगाह से देखता है. जैसे उसके आस-पास के लोग उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहे हों. उसे अजीबोग़रीब डरावनी आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं, डरावनी परछाइयां दिखाई पड़ती हैं. इन सबसे घबरा कर वह हिंसा और आत्महत्या जैसे क़दम तक उठाने की कोशिश करता है. रोगी धीरे-धीरे स्वयं के प्रति उदासीन होता जाता है. यहां तक कि वह दिनचर्या के काम भी ठीक से नहीं कर पाता है. सामान्य किस्म के सिजोफ्रेनिया के मरीज़ गुमसुम और चुपचाप रहते हैं, कई बार तो उनकी हालत बच्चों जैसी भी हो जाती है, लेकिन गंभीर किस्म के सिजोफ्रेनिया के रोगी हिंसक और विद्रोही हो जाते हैं.
कभी-कभी वे न केवल ख़ुद के लिए, बल्कि दूसरों के लिए भी ख़तरनाक हो जाते हैं. ऐसे में वे ख़ुद को ऩुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे प्रयास भी कर सकते हैं.
क्या हैं कारण
कुछ सालों पहले तक इस बीमारी का वास्तविक कारण पता नहीं था, लेकिन मानव मस्तिष्क और व्यवहार पर किए गए आधुनिक शोध से पता चलता है कि यह बीमारी मस्तिष्क की रासायनिक संरचना एवं कार्य-व्यवहार में आए ख़ास प्रकार के बदलाव के कारण होती है. यही नहीं, शोध यह भी कहते हैं कि मस्तिष्क में पाए जाने वाले स्नायु रसायन (न्यूरोकेमिकल्स)-डोपेमाइन और सेरोटोना के स्तर में परिवर्तन की वजह से भी यह बीमारी होती है. यह बीमारी तनाव के कारण नहीं होती है, लेकिन जिस व्यक्ति के अंदर आनुवांशिक तौर पर यह बीमारी होने की आशंका होती है, उसमें तनाव के कारण ही यह उभर कर बाहर आ जाती है. कई बार ऐसी कोई घटना, जिससे व्यक्ति को शॉक लगे, उस परिस्थिति में भी वह सिजोफे्रनिया की चपेट में आ सकता है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अविवाहित पुरुष नौकरी से संबंधित परेशानियों, दोस्तों एवं परिवार द्वारा नीचा दिखाने पर हीनभावना का शिकार होने के कारण भी कई बार सिजोफ्रेनिया की चपेट में आ जाते हैं.
किन्हें होती है यह बीमारी
माता-पिता में किसी एक को यह बीमारी होने पर उनके बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 15 से 20 प्रतिशत तक होती है, जबकि माता-पिता दोनों को यह बीमारी होने पर बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका 60 प्रतिशत तक हो सकती है. जुड़वा बच्चों में से एक को यह बीमारी होने पर दूसरे बच्चे को भी यह बीमारी होने की आशंका शत-प्रतिशत होती है. सिजोफ्रेनिया की बीमारी आम तौर पर युवावस्था में ख़ास तौर पर 15-16 साल की उम्र में ही शुरू हो जाती है. कुछ लोगों में यह बीमारी ज़्यादा तेजी से बढ़ती है और धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण कर लेती है.
क्या है इलाज
जब इस बीमारी को लेकर किसी तरह की कोई जागरूकता नहीं थी, तब इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पागल क़रार दिया जाता था. उसे सालों तक पागलखाने या मानसिक अस्पताल में रखा जाता था. जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान में तरक्की हो रही है, वैसे-वैसे इसके इलाज के तरीक़ों में निरंतर सुधार हो रहा है. इस बीमारी के इलाज से पहले किसी मनोचिकित्सक से इसकी अच्छी तरह से पहचान आवश्यक है. इसके लिए मनोवैज्ञानिक जांच के अलावा, परिवार के इतिहास की जानकारी भी ली जाती है. इसके बाद बीमारी के कारण का पता लगाया जाता है. दिल्ली साइकिएट्रिक सेंटर के डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि आज इस बीमारी के सफल इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन जैसी दवाइयां और इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी (ईसीटी) उपलब्ध हैं. ग़ौरतलब है कि इन दिनों इलाज के लिए क्लोजपीन एवं रेसपेरिडॉन का ही सबसे अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं सिजोफ्रेनिया के मरीजों को उपचार के बाद समाज की मुख्य धारा से जोड़ने एवं सामान्य गतिविधियों के योग्य बनाने के लिए चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार और समाज का सामूहिक प्रयास भी आवश्यक है. इसके अलावा, इस बीमारी के इलाज के तौर पर दवाइयों से उपचार के साथ ही फैमिली थेरेपी, पर्सनल साइकोथेरेपी और काउंसलिंग का सहारा भी लिया जाता है. हालांकि कुछ रोगियों में इलाज के लिए ईसीटी (इलेक्ट्रो थेरेपी, बिजली के ज़रिए उपचार) का भी सहारा लिया जाता है. गंभीर किस्म के वैसे रोगी, जिन पर दवा असर नहीं करती है, उनके लिए ईसीटी अत्यंत सुरक्षित और प्रभावकारी होती है. ख़ासकर, हिंसक व्यवहार वाले रोगियों पर इसका तुरंत असर होता है और उनकी हिंसक प्रवृत्ति तुरंत बंद हो जाती है. डॉक्टर सुनील कहते हैं कि हालांकि ईसीटी को लेकर कई तरह की ग़लत धारणाएं हैं जैसे कि ईसीटी के बाद रोगी पर दवा असर नहीं करती है, ईसीटी से रोगी को झटका लगता है, एक बार ईसीटी लगने पर बार-बार ईसीटी देनी पड़ती है आदि. लेकिन यह महज भ्रम है, इससे रोगी को बिल्कुल नुक़सान नहीं होता है.
डॉ. सुनील कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब ख़ुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफ़ी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज़ से उन मरीज़ों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका है. इसके लिए परिवार के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जाता है. उन्हें यह बताया जाता है कि वे रोगी के साथ कैसा बर्ताव करेंगे, कैसी भावना प्रकट करेंगे और उसके काम-काज में किस तरह से मदद करेंगे. आम तौर पर सिजोफ्रेनिया के रोगी को अस्पताल में रखने की ज़रूरत नहीं होती है, लेकिन गंभीर किस्म के रोगियों को कुछ दिनों या हफ्तों के लिए किसी मानसिक अस्पताल में रखना पड़ सकता है. यहां उन्हें प्रशिक्षित चिकित्सक और नर्स की देखरेख में रखा जाता है. उनका बिहेवियर थेरेपी चार्ट बनाया जाता है और इसमें उनके सुधार को नोट किया जाता है. रोगी को अपना काम ख़ुद करने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है.
सिजोफ्रेनिया मानसिक बीमारी है
विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने सिजोफ्रेनिया को युवाओं का सबसे बड़ी क्षमतानाशक यानी डिसएब्लर बताया है. विश्‍व की 10 सबसे बड़ी अक्षम बनाने वाली बीमारियों में सिजोफ्रेनिया को भी शामिल किया गया है. यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जो न स़िर्फ रोगी की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि उसके परिजनों के लिए भी एक सिरदर्द बन जाती है. यह ज़्यादातर युवाओं को उस वक्त प्रभावित करती है, जब उनकी तरक्की और कार्य करने की क्षमता शिखर पर होती है. अक्सर सिजोफ्रेनिया को लोग युवावस्था की स्वाभाविक समस्या या युवाओं की सनक मानने की भूल कर बैठते हैं.
रचनात्मक लोग मानसिक
बीमारी की चपेट में ज़्यादा होते हैं
नए अध्ययन बताते हैं कि रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग आम लोगों की तुलना में मानसिक बीमारियों की चपेट में ज़्यादा आते हैं. रचनात्मकता और सिजोफ्रेनिया के बीच गहरा संबंध है. कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने 10 लाख, 20 हज़ार मरीजों और उनके रिश्तेदारों पर शोध किया. इस शोध में पता चला कि कई मानसिक बीमारियां, जैसे बायपोलर डिसऑर्डर उन लोगों के पूरे समूह में अधिक फैली हुई है, जो कलात्मक या वैज्ञानिक पेशे से ताल्लुक रखते हैं. इनमें नृत्यांगनाएं, शोधकर्ता, शायर, फोटोग्राफर एवं लेखक शामिल हैं. शोध के मुताबिक, लेखकों को सिजोफ्रेनिया, अवसाद, बेचैनी और मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या अधिक होती है. सामान्य लोगों के मुक़ाबले ऐसे लेखकों में आत्महत्या करने की आशंका भी 50 फ़ीसद ज़्यादा रहती है. इसके  साथ ही शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सिजोफ्रेनिया, बायपोलर डिसऑर्डर और एनोरेक्सिया नर्वोसा से पीड़ित मरीजों के क़रीबी रिश्तेदारों में रचनात्मक पेशे से जुड़े लोग अधिक होते हैं.

डॉ. सुनील मित्तल  कहते हैं कि बीमारी के दौरान रोगी वर्षों तक परिवार एवं समाज से पूरी तरह कट जाते हैं. वे जब इलाज के बाद सामान्य स्थिति में वापस आते हैं, तब खुद को मानसिक तौर पर उसी अवस्था में पाते हैं, जिसमें रोग के शुरू होने से पहले थे. रोग के बीच की अवधि उनके जेहन से निकल जाती है और इस बीच समाज एवं परिवार काफी आगे निकल चुका होता है. इस लिहाज से उन मरीजों का पुनर्वास बहुत ही मेहनत एवं धैर्य के साथ करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सकों के साथ-साथ परिवार एवं समाज का सहयोग आवश्यक है. सिजोफ्रेनिया के इलाज और पुनर्वास में फैमिली थेरेपी की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है.
– See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf

. कैसे होते हैं सिजोफे्रनिया के मरीज और कैसे करनी चाहिए उनकी देखभाल, जानिए मनोचिकित्सक से… – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf

. कैसे होते हैं सिजोफे्रनिया के मरीज और कैसे करनी चाहिए उनकी देखभाल, जानिए मनोचिकित्सक से… – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf

. कैसे होते हैं सिजोफे्रनिया के मरीज और कैसे करनी चाहिए उनकी देखभाल, जानिए मनोचिकित्सक से… – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf
. कैसे होते हैं सिजोफे्रनिया के मरीज और कैसे करनी चाहिए उनकी देखभाल, जानिए मनोचिकित्सक से… – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/06/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80.html#sthash.2dCJ82Kn.dpuf

Leave a Reply