सामाजिक संस्था किस को संयुक्त राष्ट्र ने दिया परामर्शदाता की विशेष मान्यता

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भुवनेश्वर में कार्य कर रही सामाजिक संस्था किस को संयुक्त राष्ट्र ने विशेष परामर्शदाता का दर्जा प्रदान दिया है। विशेष परामर्शदाता का दर्जा किसी एनजीओ को संयुक्त राष्ट्र द्वारा किसी सदस्य राष्ट्र को प्रदान किये जाते हैं। अब तक भारत से सिर्फ छह एनजीओ को यह दर्जा दिया गया है। इस वर्ष किस का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है। यह दर्जा पाने वाली ओड़िशा की यह पहली संस्था है।

किस को यह विशेष दर्जा दिये जाने की जानकारी यूएन मुख्यालय से 23 जुलाई, 2015 को प्राप्त हुई। इस उत्कृष्ट ग्रुप में शामिल होने वाले एनजीओ को उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जो यूएन के किसी देश को करना पड़ता है। यूएन इकोसेक ने किस को यह मान्यता सभी सदस्यों द्वारा सहमति के बाद प्रदान की है। किस प्राधिकारियों ने विशेष मान्यता के लिए यूएन मुख्यालय, न्यूयार्क में यूएन के सभी प्रतिनिधि देशों के सामने आवेदन फरवरी, 2014 में किया था। सभी सदस्यों के बीच विचार-विमर्ष के बाद, दो देशों को छोड़कर सभी ने इस पर अपनी सहमति प्रदान कर दी। वे दो देश कुछ और स्पष्टीकरण चाहते थे। उन सवालों के उत्तर देकर संतुष्ट करने में किस प्राधिकारियों को साल भर लग गया। बाद में सर्वसम्मति से विशेष परामर्शदाता का दर्जा देने का प्रस्ताव किस के पक्ष में स्वीकार हुआ।

लंबी प्रक्रिया के बाद मिला दर्जा
किस के प्रतिष्ठाता डॉ. अच्युत सामंत ने मान्यता की महत्वपूर्ण प्रक्रिया 2009 ई. में शुरू की। इसी वर्ष एक आवेदन प्रस्तुत किया गया। यूएन ने शांत पर व्यापक भाव से 2009 से 2012 के दौरान किस की गतिविधियों कार्यकलाप एवं उपलब्धियों का मूल्यांकन किया। पर्यवेक्षण का स्तर बीत जाने के बाद किस की विभिन्न गतिविधियों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। किस की गतिविधियों से यूएन की सभी समितियां संतुष्ट हुईं। 2012-14 के दौरान यूएन की विभिन्न समितियों ने किस को विशेष दर्जा देने के पक्ष में सिफारिश की। बाद में अंतिम मान्यता उपलब्ध हो गई। यूएन महासचिव वान की मून के मान्यता प्रदान के बाद सदस्य देशों के मुख्यों के जीए अधिवेशन में स्वीकृति दी गई। गौरतलब है कि विश्व से हजारों आवेदन इस आकर्षक दर्जे के लिए आते हैं। यह लंबी और जटिल प्रक्रिया है लेकिन अंतत: डॉ. अच्युत सामंत की मेहनत रंग लाई।

किस को मिलेंगी विशेष सुविधाएं
यूएन इकोसेक को विशेषज्ञ सूचना प्रदान।
यूएन इकोसेक के तत्कालिक एजेंडा की सूचना प्राप्त करना।
यूएन महासचिव से मिलकर यूएन इकोसेक के तात्कालिक एजेंडे में विशेष महत्व के विषय स्थापित करना।
यूएन में प्रवेशाधिकार एवं बैठकों में न्यूयार्क में मुख्यालय में प्राधिकृत प्रतिनिधि की सेवा एवं विवेचना कार्यालयों में उपस्थिति विभिन्न कार्यक्रमों, सम्मेलनों एवं यूएन की गतिविधियों में भागीदारी।
यूएन-इकोसेक एवं इसकी अधीनस्थ संस्थाओं यूएन की साधारण सभा, मानवाधिकार काउंसिल एवं यूएन की अंतरराष्ट्रीय निर्णयकर्ता संस्थाओं की बैठक में उपस्थिति।
यूएन इकोसेक के कामकाज पर अपनी विशेषज्ञता संबंधी विषयों पर लिखित वक्तब्य प्रदान करना।
यूएन इकोसेक में मौखिक प्रतिवेदन प्रदान।
यूएन की सुविधाओं का उपयोग।

कौन हैं डॉ. सामंत
उड़ीसा में लोग उन्हें कलिंग का नया अशोक कहकर बुलाते हैं। गरीब आदिवासी बच्चों के लिए तो वे किसी सेंटा क्लाज से कम नहीं है। वहीं कुछ लोग उन्हें कारपोरेट संत कहकर सम्मान देते हैं। काफी हद तक यह बात सच भी लगती है क्योंकि पच्चीस हजार आदिवासी बच्चों को मुफ्त आवास, भोजन और शिक्षा के जरिए आत्मनिर्भर बनानाना कोई आसान काम नहीं है। दरअसल किस (कलिंगा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज) के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत नहीं चाहते कि जिस गरीबी के आंगन से वह गुजरे हैं, उससे कोई और आदिवासी बच्चा गुजरे। डॉ. सामंत का बचपन बहुत गरीबी में बीता था और वे महज चार साल के थे, जब उनके सिर से उनके पिता का साया उठ गया। उन दिनों सात भाई-बहन वाले परिवार को काफी दिक्कतों से गुजरना पड़ा। डॉ. सामंत का परिवार उड़ीसा के उस निर्जन इलाके में पले बढ़े, जहां पर कभी बिजली जैसी मूलभूत सुविधा भी मौजूद नहीं थी। गरीबी और अभाव से सबक लेते हुए उन्होंने उन लोगों की जिंदगी का कायाकल्प करने की ठानी, जिनके पास जीवन निर्वाह करने का कोई साधन नहीं था। डॉ. सामंत ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद संकल्प लिया कि वे अपनी पूरी जिंदगी ऐसे ही कमजोर तबके के लोगों को शिक्षा देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में लगा देंगे। डॉ. सामंत ने किस की शुरुआत 125 आदिवासी गरीब बच्चों से की थी। लेकिन आज यहां पर 25 हजार बच्चे पढ़ रहे हैं। जिनके खाने-पीने-रहने और पढ़ने की पूरी व्यवस्था संस्था करती है। मौजूदा समय में यह विश्व का सबसे बड़ा पूर्ण रूप से मुफ्त शिक्षा, आवास और भोजन देने वाला संस्थान है, जहां पर एक गरीब और पिछड़े तबके के बच्चे को केजी से लेकर पीजी तक की पूरी शिक्षा मिलती है। यहां पर प्रवेश लेने के बाद एक बच्चा न सिर्फ उच्च शिक्षा बल्कि रोजगार हासिल करके ही निकलता है। किस में आदिवासी बच्चों को तमाम तरह की वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है। इसके तहत बच्चे को किसी एक वोकेशनल ट्रेनिंग में पारंगत किया जाता है। इस ट्रेनिंग के दौरान प्रत्येक बच्चों को हर माह एक हजार रुपये भी दिये जाते हैं। इस ट्रेनिंग के दौरान जो भी माल तैयार होता है, उसका पचास प्रतिशत मिलने वाले लाभ को बच्चों में बांट दिया जाता है। जिसे अक्सर बच्चे अपने माता-पिता, भाई-बहन के खर्च के लिए भेज देते हैं। मात्र पांच हजार रुपये में शुरू होने वाली उनकी संस्था का नाम देश-दुनिया में तब गूंजा, जब एशिया के सबसे बड़े आदिवासी स्कूल के बच्चों की रग्बी टीम ने लंदन में दक्षिण अफ्रीका को हराकर विश्व जूनियर रग्बी चैंपियनशिप जीत ली। डॉ. सामंत आदिवासी बच्चों के लिए चलाए जा रहे किस संस्था का विस्तार करने के लिए अब दूसरे राज्यों में भी प्रयासरत हैं। इसके तहत वे अलग-अलग स्थानों पर विद्यालय खोलकर दो लाख आदिवासी बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। हालांकि वे इस बात को मानते हैं कि भले ही वे किस संस्था को अपने बलबूते चला रहे हों लेकिन बड़े स्तर पर कार्य करने के लिए उन्हें समाज के सभी तबकों का सहयोग लेना होगा।

सामंत को 2014 में मिला था गुसी शांति पुरस्कार
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता एवं कलिंग इंस्टीट्यूट आफ सोसल साइंसेज के प्रतिष्ठाता अच्युत सामंत ने 2014 में गुसी शांति पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। भारत से यह पुरस्कार अब तक कुल तीन लोगों को ही मिला है। ओडिशा से पहले शिक्षाविद श्री सामंत हैं। श्री सामंत को यह पुरस्कार उनके आदर्श जीवन मंत्र गरीबी का उन्मूलन और मानवतावाद को बढ़ावा सिर्फ शिक्षा द्वारा ही संभव है। वह अपनी विश्वविख्यात संस्था किस में इसके अक्षरश: प्रयोग कि लिए मिला।

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