सरकार की उदासीनता से – महिलाओं का जीवन हाशिए पर

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हिंदुस्तान में महिलाओं का स्वास्थ्य हाशिए पर है. देश में गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय आने वाली जटिलताओं के कारण हर 10 मिनट में एक महिला की मौत हो जाती है. वहीं महिलाएं कई और तरह की जानलेवा बीमारियों के कारण असमय ही मौत के मुंह में समा जाती हैं, लेकिन सरकार इस तरफ से आंखें बंद किए बैठी है.

भारत में हर साल हजारों-लाखों महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के कारण मौत के मुंह में समा जाती हैं. इसकी वजह यह है कि उन्हें मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पाती हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 21वीं सदी का भारत महिलाओं के लिए घातक साबित हो रहा है. महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर समाज में जागरूकता की काफी कमी है. इसके अलावा, सरकारी स्तर पर भी महिलाओं में जागरूकता फैलाने के लिए किसी तरह की कोई योजना नहीं चलाई जा रही है. यहां अस्पतालों की भी भारी कमी है और जो हैं, वे काफी बदहाल हैं. अस्पताल हैं, तो डॉक्टर नहीं और डॉक्टर हैं, तो दवाएं नहीं हैं. समुचित इलाज न मिल पाने के कारण अस्पतालों में ही लाखों-हजारों महिलाएं दम तोड़ देती हैं. हालांकि ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत गांवों के अस्पतालों के लिए बजट में बढ़ोत्तरी तो की गई है, लेकिन आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की भारी कमी है. देश में अधिकतर अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 74,500 मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एक्रिडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) और 21,066 आग्जिलरी नर्स मिडवाइफ्स (एएनएम) की कमी है. सरकारी मानकों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 की आबादी पर एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और 5000 की आबादी पर एक एएनएम होनी चाहिए. सच तो यह है कि गांवों में पर्याप्त अस्पताल नहीं हैं, और जहां हैं, उनमें सुविधाओं की कमी है. भारत की गिनती विश्व के उन देशों में होती है, जहां स्वास्थ्य पर सबसे कम राशि खर्च होती है. इसका खामियाजा आर्थिक तौर पर कमजोर परिवारों को भुगतना पड़ता है.  स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि महिलाओं में मोटापा, स्ट्रोक, ऑस्टियोपोरोसिस, एनीमिया, हृदय रोग एवं कैंसर जैसी कई जानलेवा बीमारियां आम हैं. इसके अलावा, इन दिनों महिलाओं में गर्भधारण एवं प्रसव संबंधी जटिलताएं भी काफी हद तक बढ़ गई हैं. कहते हैं कि स्वास्थ्य मां स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मां ही स्वस्थ न हो, तो क्या होगा. माताओं के स्वास्थ्य को लेकर अल्प विकसित देशों की एक रिपोर्ट तैयार की गई. इसमें भारत का स्थान 75वां है. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय माताओं की स्थिति बोत्सवाना, कांगो और कैमरून जैसे पिछड़े दक्षिण एशियाई देशों से भी ज्यादा दयनीय है. वहीं संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन के मुताबिक, भारत में हर साल अड़सठ हजार महिलाएं मात्र गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों या प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच के मुताबिक, सरकारी क्लीनिक और अस्पताल अक्सर संसाधनों की भारी कमी से जूझते रहते हैं. यही वजह है कि बहुत-सी महिलाएं प्रसूति के बाद या तो मर जाती हैं या संक्रमित होकर गंभीर रूप से बीमार हो जाती हैं.

    महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता चिंतित हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 21वीं सदी का भारत महिलाओं के लिए घातक साबित हो रहा है. एक सर्वे के मुताबिक़, हर 10 मिनट में एक महिला की मौत गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय आने वाली जटिलताओं के कारण हो जाती है.

एनीमिया: कैलाश हॉस्पिटल में पोषण विशेषज्ञ डॉ. पल्लवी वैश्य कहती हैं कि भारत में हर दूसरी महिला एनीमिया से ग्रस्त है. भारत की 52 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त हैं. इनमें 2 प्रतिशत महिलाएं गंभीर रूप से ग्रस्त हैं, जबकि 35 प्रतिशत महिलाओं में एनीमिया का स्तर हल्का और 15 प्रतिशत महिलाओं को मध्यम स्तर का एनीमिया है. इसकी वजह काफी हद तक स्वास्थ्य संबंधी ग़लत आदतें होती हैं. डॉक्टर पल्लवी कहती हैं कि न स़िर्फ महिलाएं, बल्कि संतुलित आहार की कमी और जंक फूड खाने के कारण बच्चे भी इन दिनों एनीमिया से काफी प्रभावित हैं.

    सच तो यह है कि महिलाओं में कुछ घातक बीमारियों एवं स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण हज़ारों की संख्या में होने वाली मौतें समाज ही नहीं, सरकार के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई हैं. हालांकि, इसके बाद भी सरकारी स्तर पर ऐसी किसी योजना की पहल नहीं की जा रही है, जिससे कि महिलाओं को उनके स्वास्थ्य से संबंधित मुश्किलों से निजात दिलाई जा सके.

कैंसर : पिछले एक दशक में भारतीय महिलाओं में कैंसर के मामले काफी बढ़े हैं. आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण महिलाओं के मुक़ाबले शहरी क्षेत्रों की कामकाजी महिलाओं में उनकी जीवनशैली और तनाव के कारण कैंसर होने का ़खतरा इन दिनों ज़्यादा बढ़ गया है. विश्व में कैंसर के कारण होने वाली मौतों में हर 10वीं मौत शहरी भारत में होती है. यह अत्यधिक चिंताजनक बात है कि 75-80 प्रतिशत रोगियों में बीमारी की पहचान विकसित अवस्था में ही होती है.

स्तन कैंसर: अपोलो अस्पताल में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ साहनी ने कहा कि भारत में कैंसर के इन दिनों आ रहे मामलों में से लगभग 40 प्रतिशत मामले महिलाओं में ही पाए जाते हैं. पिछले दशक में स्तन कैंसर के मामले मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में सबसे ज़्यादा पाए गए हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि इसने गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर को भी पीछे छोड़ दिया है. आंकड़े बताते हैं कि हर साल केवल दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में लगभग 3000 महिलाएं स्तन कैंसर से प्रभावित होती हैं. यही नहीं, देश में हर 14 में से एक लड़की को स्तन कैंसर होने की आशंका है. दरअसल, स्तन कैंसर की आशंका उम्र के साथ-साथ बढ़ती जाती है. वर्तमान में 40 से 60 साल की लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं कैंसर से जूझ रही हैं. ग़ौरतलब है कि भारत में हर साल स्तन कैंसर के कारण 60,000 महिलाओं की मौत हो जाती है. एक अनुमान के  मुताबिक, स्तन कैंसर के मरीजों की संख्या 2020 तक गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के मरीजों से ़बहुत ज़्यादा हो जाएगी.

गर्भाशय का कैंसर: गर्भाशय का कैंसर दुनिया भर की महिलाओं के लिए आज भी एक गंभीर समस्या बना हुआ है, लेकिन आंकड़े कहते हैं कि पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां सबसे ज़्यादा गर्भाशय के कैंसर के मामले आते हैं. विश्व भर में गर्भाशय कैंसर के 4,93,000 नए मामले आए हैं. उनमें से 27 प्रतिशत यानी 1,32,000 भारत में हैं. दुनिया भर में हर साल इस गंभीर बीमारी से 2,73,000 महिलाओं की मौत हो जाती है. इनमें से 27 प्रतिशत महिलाएं भारतीय होती हैं यानी 74,118. मतलब यही है कि इस बीमारी से लड़ने के लिए अब तक कुछ ़खास कोशिश नहीं की गई है. यह रोग किसी वर्ग विशेष या आयु वर्ग तक ही सीमित नहीं है. दरअसल, जागरूकता न होने के कारण इस रोग की स्क्रीनिंग भी लोग नहीं कराते. आंकड़ों के मुताबिक, प्रत्येक 3 सालों में 18 से 69 वर्ष की सभी भारतीय महिलाओं में से मात्र 2.6 प्रतिशत की ही स्क्रीनिंग हो पाती है. इनमें से शहरी महिलाएं 4.3 और ग्रामीण महिलाएं 2.3 प्रतिशत हैं. वर्ष 2009 में केवल 1,32,082 महिलाओं में गर्भाशय कैंसर का पता चला, जबकि हक़ीक़त का़फी भयावह है. हमारे देश में 15 वर्ष से अधिक उम्र की 36 करोड़, 65 लाख, 80 हज़ार महिलाएं इस ़खतरे की गिरफ्त में हैं. इस बीमारी की मुख्य वजह है ह्यूमन पैपीलोमा वायरस या एचपीवी वायरस. दरअसल, 99.7 प्रतिशत गर्भाशय कैंसर के मूल में यही वायरस होता है. कैंसर विशेषज्ञ कहते हैं कि एचपीवी पर हमला करने वाली वैक्सीन ही इस कैंसर से होने वाली मौतों में कमी ला सकती है, पर इससे पहले ज़रूरी है नियमित स्क्रीनिंग.

मोटापा : बदलती जीवनशैली की एक और देन है मोटापा. अत्यधिक जंक फूड खाने और फिजिकल वर्क आउट बिल्कुल न करने के कारण महिलाएं बहुत जल्द मोटापे की गिरफ्त में आ जाती हैं. इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट सर्जन (मिनिमल एक्सेस सर्जरी) डॉ. अरुण प्रसाद के अनुसार, महिलाओं में मोटापा इन दिनों तेजी से बढ़ रहा है. दरअसल, मोटापा अब एक बीमारी बनता जा रहा है, जिसे किसी भी रूप में अनदेखा नहीं किया जा सकता. रक्तचाप, मधुमेह, दिल का दौरा, कैंसर, डिंबग्रंथि के रोग, स्लीप एप्निया, जोड़ों एवं पीठ के दर्द जैसे रोग मोटापे की ही देन हैं. ये रोग स़िर्फ ज़्यादा खाने की वजह से नहीं होते हैं, बल्कि इसके कई और महत्वपूर्ण कारण हैं. इसके इलाज के लिए जीवनशैली में परिवर्तन, व्यायाम, आहार, चिकित्सा, उपचार आदि पर ध्यान देना चाहिए. फिटनेस विशेषज्ञ एवं पूर्व एशियाई मैराथन चैंपियन सुनीता गोदरा कहती हैं कि जो महिलाएं कुपोषित एवं बीमार होती हैं और जिन पर ज़िम्मेदारियों का अधिक बोझ होता है, उन पर इन बीमारियों का हमला ज़्यादा होता है. लेकिन वे न बीमारियों की सही ढंग से पहचान कर पाती हैं और न इलाज कराने में सक्षम होती हैं. वैसे, यहां बता देना ज़रूरी है कि कई बार गंदगी और अन-हाइजेनिक जीवनशैली के कारण भी महिलाओं का सामान्य स्वास्थ्य प्रभावित होता है.

हृदय रोग: ऐसा माना जाता है कि दिल की बीमारियां पुरुषों में ही होती हैं, लेकिन यह सच नहीं है, क्योंकि बदलते परिवेश में महिलाओं में भी मौत की एक बड़ी वजह हैं दिल से संबंधित बीमारियां. हकीकत तो यह है कि यूरोपियन देशों में महिलाओं में सबसे ज़्यादा मौतें दिल की बीमारियों की वजह से ही होती हैं. मेट्रो हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. पुरुषोत्तम लाल कहते हैं कि दु:ख तो इस बात का है कि इस बीमारी के बारे में समय पर पता भी नहीं चल पाता! इसे साइलेंट इस्चीमिया कहा जाता है. इसमें खून का दिल तक पहुंचना बाधित हो जाता है, लेकिन तत्काल कोई परेशानी महसूस नहीं होती. डॉ. लाल कहते हैं कि दिल को ज़रूरी ऑक्सीजन पहुंचाने वाली कोरोनरी ऑर्टरीज जब ज़रूरत के अनुसार खून की आपूर्ति नहीं कर पाती है, तो लोग सीने में दर्द की शिकायत करते हैं, जिसे एंजाइना कहते हैं. दरअसल, शरीर में ़खून पहुंचाने के लिए दिल किसी पंप की तरह काम करता है. इस पंप को चालू रखने के लिए दिल तक खून पहुंचाने वाली रक्तवाहिका को कोरोनरी ऑरटरी कहते हैं. कुछ लोगों को पता ही नहीं होता कि वे कोरोनरी ऑरटरीज डिजीज (सीएडी) से पीड़ित हैं. ऐसे में सांस लेने में परेशानी होती है या फिर पैरों एवं टखनों में सूजन आ जाती है. दिल से जुड़ी उनकी ऑरटरी पूरी तरह से काम करना बंद कर देती है, तब उन्हें दिल का दौरा पड़ता है. डॉ. लाल कहते हैं कि हालांकि महिलाओं में एस्ट्रोजन समेत कुछ हार्मोंस के स्राव के कारण उनमें हार्ट अटैक की आशंका कम ज़रूर होती है, लेकिन मेनोपॉज के बाद उनमें भी दिल से संबंधित बीमारियों का जोखिम उतना ही बढ़ जाता है, जितना एक पुरुष में. वैसे, आजकल महिलाओं में 30 की उम्र के आसपास भी दिल की बीमारियां देखी जा रही हैं, लेकिन इसकी वजह है आज की जीवनशैली. पिछले एक दशक में शहरी महिलाओं में सिगरेट एवं शराब के सेवन का चलन बढ़ा है. इसके अलावा, हाई ब्लड कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर, तनाव, धूम्रपान, मोटापा और शारीरिक श्रम न करना जैसी प्रवृत्तियों में भी वृद्धि हुई है.

 आस्टियोपोरोसिस: आजकल आस्टियोपोरोसिस भी महिलाओं में एक बड़ी बीमारी के रूप में देखने को मिल रहा है. प्रमुख अस्थि सर्जन एवं आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एएफसी) के अध्यक्ष डॉ. (प्रो.) राजू वैश्य कहते हैं कि 50 साल से अधिक उम्र की लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं

ऑस्टियोपोरोसिस से संबंधित एक से अधिक फ्रैक्चर से पीड़ित होती हैं. हालांकि, ऑस्टियोपोरोसिस के कारण होने वाले फ्रैक्चर महिलाओं में आम हैं. हड्डियों के भंगुर होने की वजहें हैं कम शारीरिक गतिविधियां, शारीरिक विकृति, लंबे समय से दर्द, रुग्णता, मृत्यु दर में वृद्धि, सामाजिक अलगाव, अवसाद आदि. डॉ. वैश्य कहते हैं कि सभी उम्र की महिलाओं में पुरुषों की तुलना में उनकी हड्डी का द्रव्यमान कम होता है और 35 साल की उम्र के बाद उनमें हर साल एक प्रतिशत की दर से संबंधित हड्डी की क्षति होती रहती है. रजोनिवृत्ति के पहले पांच साल के दौरान इस दर में तेजी से वृद्धि होती है और इस दौरान हर साल 3 से 5 प्रतिशत की दर से उनमें हड्डियों का क्षय होता है. 40 से 50 साल के दौरान महिलाओं में आम तौर पर कशेरुका (वर्टिब्रल) हड्डी द्रव्यमान में 10 प्रतिशत का नुक़सान हो सकता है. इस प्रकार किसी महिला के जीवन में उसके हड्डी द्रव्यमान में से 40 प्रतिशत का नुकसान हो सकता है. अधिकतर महिलाएं 30 वर्ष की आयु के बाद बहुत मोटी होने लगती हैं. इससे न केवल उनकी पुरानी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, बल्कि नई हड्डियां बननी भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं.

राजीव गांधी कैंसर संस्थान की डॉ. रुचिका गोयल कहती हैं कि भारतीय महिलाओं का जीवन बहुत ज़्यादा हाशिए पर है. वे तभी बेहतर जीवन जी सकती हैं, जब वे खुद जागरूक हों. महिलाओं का स्वास्थ्य और सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़े ज़रूर हैं, लेकिन अधिकतर उनके लिए उनका स्वास्थ्य उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे पीछे आता है. यदि हम अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करते हैं, तो यह न केवल हमारे परिवार का, बल्कि समाज और अंत में देश का नुक़सान है. इसलिए यदि महिलाएं अपनी सेहत के प्रति थोड़ी-सी सावधानी बरतती हैं, तो वे तमाम बीमारियों से छुटकारा पा सकती हैं.

 

हिंदुस्तान में महिलाओं का स्वास्थ्य हाशिए पर है. देश में गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय आने वाली जटिलताओं के कारण हर 10 मिनट में एक महिला की मौत हो जाती है. वहीं महिलाएं कई और तरह की जानलेवा बीमारियों के कारण असमय ही मौत के मुंह में समा जाती हैं, लेकिन सरकार इस तरफ से आंखें बंद किए बैठी है. – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/05/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b2.html#sthash.BB48VzWj.dpuf
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