सरकार की अनदेखी कारण सीवर में मरते मजदूर

सरकार की अनदेखी कारण सीवर में मरते मजदूर

रोहिणी सेक्टर तीन में सीवर की सफाई के दौरान पिता और पुत्र की मौत हो गई. पुलिस ने इस मामले में ठेकेदार के खिलाफ लापरवाही के चलते मौत का मामला दर्ज किया. ठेकेदार ने दोनों को किसी तरह के सुरक्षा उपकरण मुहैया नहीं कराया था. हादसे के बाद से ठेकेदार फरार है. यह मौत किसकी लापरवाही से हुई. मृतक के परिजन आखिर केसके पास न्याय के लिए गुहार लगाए. ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है बल्कि इससे पहले भी कई सीवर की सफाई करते समय कई लोग मौत की भेंट चुढ चुके हैं. आकडों की मानें तो हर साल सीवर में काम करते समय 22 हजार 3 सौ 32 लोगों की मौत हो जाती है. लेकिन आज तक सरकार ने न तो इनकी सूध ली है और न हीं इनके सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया है. 
सीवर यानी समूचे शहर की गंदगी का निकास द्वार. ग्रीन दिल्ली और क्लीन दिल्ली के ठीक नीचे से गूजरती जानलेवा जहरीली गैसों और बैक्टीरिया से भरी मानव निर्मित सुरंगें. इन खौफनाक सीवरों में उतरते हैं सफाई कर्मचारी. सीवरों की सफाई किसी जंग से कम जोखिम भरा नहीं है. इन सफाई कर्मचारियों को खुद भी जिंदा वापस लौटने की उम्मीद नहीं होती, जिंदा वापस आ भी जाएं तो सीवर की गंदगी से उन्हें लाइलाज बिमारियां हो जाती है जो आखिर उन्हें मौत के मुंह में ले जाती है. कोई भी इंसान जानबूझकर मौत के मुंह में जाना नहीं चाहता, पेट की आग बुझाने के लिए इन मजदूरों को सीवर में उतरना पडता है. एक तरफ चमचमाती सड़के, बड़ी बड़ी गाड़ियों और अट्‌टालिकाएं और उनके ठीक नीचे खामोश अंधरे बदबू से बजबजाते गटर जिसे देखने भर से ही शरीर में सिहरन पैदा होने लगती है. इसे देखते ही हमारे मन में घृणा पैदा होने लगती है, लेकिन ये सफाई कर्मचारी बिना किसी सुविधा के इसमें उतरकर सफाई करते हैं. 
18 अक्टूबर 1990, दिपावली का दिन. सभी अपने घरों में दिपवाली की मनाने की तैयारियों में लगे थे, लेकिन 40 वर्षीय बेलदार तारीफ सिंह अपने घर से काम करने के लिए निकले. शाम को उनके घर पर खबर आई कि तारीफ सिंह की काम के दौरान हालत बिगड गई है वो अस्पताल में हैं. घरवाले भागे भागे अस्पताल गए जहां उनकी मौत  हो चुकी थी. तारीफ सिंह सीवर सफाई का काम करते थे. उनकी पत्नी ने कुछ दिन पहले ही तारीफ सिंह कहीं थी कि वो यह काम छोड दें. लेकिन तारीफ सिंह ने यह काम नहीं छोडा. सफाई कर्मचारियों में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जिनके दो- दो, तीन-तीन सदस्य सीवरों की भेंट चढ़ गए. चिपयाना गाजियाबाद के निवासी फुट सिंह वाल्मिकी ऐसे पिता हैं जिनके पांच पांच जवान बेटों को ये सीवर निगल गए. सबकी उम्र 20 से 35 वर्ष के बीच था. 
ऐसे हीं नंद नगरी की एक महिला ने पहले पति और बाद में अपने बुढापे का सहारा दो जवान बेटों को खो दिया. 
सीवर ने जवानी में सुहाग उजाड़ा और बुढ़ापे में कोख. एक ही घर में तीन तीन विधवाएं हैं. सीवरो में जान गंवाने वालो की एक लंबी फेहरिस्त है. अब तक काफी मौंते हो चुकी हैं और हो रही हैं, कभी न खत्म होने वाला एक अंतहीन सिलसिला. लेकिन इनसे पार पाने का ना सरकार कोई ठोस उपाय ढूंढ रही है और ना ही इन सफाईकर्मियों के पास अपनी जान देने के अलावा काई और रास्ता है. हर रोज मौतें होती रहती हैं और हम मुक बने तमाशा देखते रहते हैं जैसे हमें इन मौतों की आदत हो गई हो. 
अगर हम देश की राजधानी की ही बात करे तो यहां के सीवर मजदूरों की हालत काफी दयनीय है. दिल्ली जल बोर्ड के कर्मचारी बताते हैं कि कागजों पर उनका वेतन 7000 रुपएं है लेकिन मिलता उन्हें सिर्फ 3500 हजार. बाकी के पैसे दिल्ली जल बोर्ड और ठेकेदारों के हिस्से में चला जाता है. यह बेहद शर्मनाक है कि एक इंसान जो अपनी जिंदगी जोखिम में डालकर काम करता हैं और उसका मेहनताना कोई और खा जाता है. दिल्ली जल बोर्ड की और वहां के कामगारों की स्थिति के बारे में हरज्ञान सिंह और वेद प्रकाश कहते हैं कि एक तरफ तो दिल्ली की जनसंख्या बढ़ी है वहीं दूसरी ओर सफाई कर्मचारी की संख्या घटी है. इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों की मौतों की मुख्य वजह है- जीवन रक्षक उपकरणों तथा समुचित प्रशिक्षण की कमी. 1996 में मुंबई हाइकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया था कि सीवरों की सफाई करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना कानूनन अनिवार्य हैं वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सीवरों की सफाई करने वाले कर्मचारियों को सीवर सुरक्षा उपकरण देने के लिए दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिए थे. लेकिन बोर्ड ने अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते हुए सीवर की सफाई का ठेका निजी कंपरियों को देना शुरू कर दिया. और ये कंपनियों अदालती आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं और कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है.
एक तरफ दिनों दिन सीवर की लंबाई में वृद्वि हो रही है वहीं दूसरी मजदूरों की संख्या में कमी आई. एक सामाजिक कार्यकर्ता ने जो आकडें बताए वह काफी चौंकाने वाले थे साथ ही साथ यह दिल्ली जल बोर्ड में चल रहे धोखाधडी की ओर भी इशारा कर रहे हैं. इस सर्वे ने खुलासा किया कि सीवर सफाईकर्मी में करीब 37.2 प्रतिशत स्थांतरिक कॉलोनी में रहते हैं, 27 प्रतिशत किराए के घरों में, 11.3 प्रतिशत स्लम में वहीं 13 प्रतिशत अनाधिकृत कॉलोनी में रहते है. मात्र 13 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो सरकारी मकानो में रहते हैं. इनमें करीब 70 प्रतिशत सफाई कर्मचारी हीं अपने रिटायरमेंट तक जीवित रहते हैं. 
आजलम ग़ढ का 38 वर्षीय संजय सेंट्रल दिल्ली के एमसीडी में काम करते हैं. वह पाचवीें पास हैं वह कहते हैं कि हम भेार में चार बजे ही चले जाते हैं. पैसे की कमी के कारण हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते हैं ना ही अच्छा खाना. 3500 रुपये में घर चलाना मुश्किल होता है और ज्यादातर पैसा बिमारी में खर्च में हो जाता है. हमारे पास रहने को घर भी नहीं है. तिरपाल डालकर हम गुजारा करते हैं. मैं डेली बेसिस पर काम करता हूं. इसलिए मुझे मकान नहीं मिल सकता. हम नहीं चाहते की हमार बच्चे इसी व्यवसाय में जाए, लेकिन काम न मिलने के कारण वो भी इसी वयवसाय में चले जाते हैं. हमारा पारिवारिक जीवन भी पैसे के अभाव में तनावपूर्ण होता है. समाज में हमें अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. हमारे व्यवसाय के बारे में पता चल जाने के बाद कोई हमसे बात भी करना पसंद नहीं करता. हमें कोई प्रशिक्षण भी नहंी दिया जाता. सीवर के कांच से कई बार हम घायल हो जोत हैं, इससे निकलने वाले गैस से दम घुटना, बेहसी, सांस की समस्या, टीबी, अस्थमा  और लकवा आम बात है. महीने में हम लगभग 20 बार सीवर में उतरते हैं.  
इस समस्या को लेकर कुछ गैर सरकारी संगठनों ने आवाज उठाई. उन्होंने इन मजदूरों की समस्या की ओर ध्यान दिलाने के लिए जुलाई 2004 में एक अभियान भी चलाया. इन संगठनों का कहना था कि बिना सुरक्षा उपकरणों की वजह ये ही सीवर कर्मचारियों की जाने जाती हैं जो जहरीली गैसों से बच जाते हैं वो धीमी मौत के पंजे में फंस जाते है. ये कई तरह की बिमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इन तमाम बातों के बावजूद संबंधित विभागों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. लापरवाही जारी है और एक के बाद एक मौतें हो रही है. सेफ्टी के लिए सीवर वर्कर्स को सेफ्टी, बेल्ट, गैस मास्क, हेलमेट, बॉडी सूट, गम बूट्‌स, ग्लोभ्स, ऑक्सिजन मास्क और टॉर्च लेकर उतरना होता है, लेकिन इनमें से 77 प्रतिशत  सेफ्टी बेल्ट के बारे में, 44 प्रतिशत गैस सिलेंडर के बारे में, 40 प्रतिशत गैस मास्क के बारे में, 60 प्रतिशत हेलमेट के बारे में, 26 प्रतिशत बॉडीशूट के बारे में, 56 प्रतिशत गमबूट्‌स, 66.8 प्रतिशत ग्लोभ्स, 36 प्रतिशत ऑक्सिजन मास्क, 64 प्रतिशत टॉर्च के बारे में जानते हैं. 
कांचीराम कहते हैं कि मेरा बेटा ठेकेदार की जिम्मेदारी पर गया. सुबह काम करने गया और शाम को उसकी लाश आई. ठेकेदार तो भाग गया और किसी ने हमारी बात नही ंसुनी. कानून में सिवर वर्कर्स के लिलए नियमों की बात तो की गई है लेकिन उसपर अलन नही होता. वर्कर्स का कहना है कि सिलेंडर काफी भारी होता है जिससे काम करने में समस्या होती है, जूते कीचड में धंस जाता है. सारे उपकरण नाकामयाब है. सिवेज वर्कर्स के मामले पर शिला दीक्षित ने कहा कि हम उन्हें सारी सुविधा मुहैया कराते हैं और समस्याएं सूने बिना उनहोंने आगे देखेंगे कहते हुए पल्ला झाड लिया.  
कानून और नियमों ने सफ़ाई करने वालों की सुरक्षा की बात तो कही है लेकिन इस पर अमल नहीं होता. दिल्ली  जल बोर्ड के नियमों के मुताबिक सीवर में उतरने से पहले ये जांच होनी बहुत ज़रूरी है कि उसमें किसी भी तरह की ज़हरीली गैस तो नहीं है. साथ ही सीवर साफ करते समय सफ़ाई करने वाले को मास्क, दस्ताने, जैकेट और जूते पहनना ज़रूरी है. लेकिन हकीकत ऐसा कुछ भी नहीं होता. दिल्ली सरकार हर साल करोड़ों रुपये सीवर साफ़ करने के उपकरणों पर खर्च करने का दावा करती है लेकिन ये उपकरण सफाई कर्मियों को नहीं मिलता. अगर खरीदे भी जाते हैं तो वह दिल्ली जल बोर्ड के स्टोर रूम में बंद पड़े रहते हैं. इतना ही नहीं सीवर की सफ़ाई का काम दिल्ली  जल बोर्ड के सफ़ाई कर्मचारियों को करना चाहिये क्योंकि नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन की गाइड लाइन साफ़ कहती है कि सीवर साफ़ करने का ज़िम्मा सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकार का है. मगर होता ये है कि सफ़ाई का काम ठेके पर दे दिया जाता है और कोई हादसा होने पर दिल्ली जल बोर्ड यह कह कर पल्ला झाड़ लेता है कि मरने या ज़ख्मी होने वाले लोग उसके कर्मचारी नहीं थे. 
सीवर – मौत का पाताल
2002 -2003
320 लोगों की मौत
2003- 2004
316 लोगों की मौत
2004 – 2005
288  लोगों की मौत
हर साल सीवर में काम करने वाले 
22,327 लोगों की होती है मौत
6 मई 2007
सीवर सफाई करते 3 लोगों की मौत
31 मई 2012
सीवर साफ करते 2 मजदूर की मौत
20 जून 2012
सीवर साफ करते 2कर्मचारी ं की मौत
27 जून 2012
स्ुबह 10.30 बजे एक मजदूर की मौत
जहरीली गैस से हुई सारी मौते   
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