सरकार का भोंपू : दूरदर्शन और आकाशवाणी

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देश एक ब़डे क्रांति के मुहाने पर है. सूचना क्रांति के तहत आकाशवाणी और दूरदर्शन को जब इसमें ब़ढ-च़ढ कर हिस्सा लेना चाहिए था, तब उन्होंने निष्क्रियता दिखाई. ऐसे में उनकी विश्‍वसनीयता पर कई सवाल उठने लगे हैं.
 
कांग्रेस नीत के दस साल के शासन काल में दूरदर्शन और आकाशवाणी की विश्‍वसनीयता में भारी गिरावट आई. ये जन माध्यम न रह कर सीमित होते चले गए. जहां अन्य चैनल आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण दर्शकों को कुछ बेहतरीन देने की कोशिश में लगे रहते हैं, वहीं दूरदर्शन पिछले कई सालों से एक ही फॉर्मेट पर चल रहा है. कछवे की चाल से चल रहे दूरदर्शन में काम करने वाले लोगों के लिए यह सुकून देने वाला सरकारी नौकरी मात्र है. देश में कई तरह की समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें दरकिनार कर सरकार की नुमाइंदगी वाली खबरों को ज्यादा तरजीह दी जाती है. यही वजह है कि इसे नाम दिया गया है सरकार का भोंपू. आकाशवाणी और दूरदर्शन को सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए कई प्रयास किए गए, पर सरकार ने हर बार साजिश के तहत इस पर नियंत्रण बनाए रखा.
कभी आकाशवाणी और दूरदर्शन रिलायबल न्यूज सोर्स माने जाते थे. वक्त के साथ जहां प्राइवेट माध्यमों ने अपने कंटेट और रचनात्मकता के दम पर एक अलग मुकाम हासिल किया, वहीं दूरदर्शन पिछड़ता गया. सरकार ने इन्हें मात्र व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पूरा करने का जरिया बना लिया. दूरदर्शन को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त कराने के लिए प्रसार भारती का गठन किया गया, लेकिन प्रसार भारती का संचालन सरकार ने अपने हाथों में ले लिया. अन्य चैनल्स जहां अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए, अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए लगातार काम काम कर रहे हैं, वहीं दूरदर्शन दिशाविहीन होकर अपने ही ढर्रे पर चल रहा है. दूरदर्शन के कार्यक्रमों को देखकर ऐसा लगता है, मानो समय ठहर गया हो. आज भी इस पर 70-80 के दशक के गाने बजते हैं. दुनिया 2014 में प्रवेश कर चुकी है और इनकी दुनिया में तो अभी 90 का दशक भी नहीं आया. दूरदर्शन अपने गुजरे वक्त में जैसे खो गया है और उससे बाहर ही नहीं निकल पा रहा है. दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बजाए ये अभी भी 30-40 साल पीछे चल रहे हैं. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दूरदर्शन होने का मतलब क्या 30-40 साल पीछे चलना ही है?
कलर्स, लाइफ ओके, चैनल वी जैसे कई छोटे प्राइवेट चैनलों ने अपने कंटेंट के दम पर अपनी लॉन्चिंग के मात्र कुछ ही समय बाद अपनी पहचान बना ली, लेकिन दूरदर्शन 55 साल बाद भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. गावों-कस्बों में केबल न होने के कारण भले ही लोग आज भी दूरदर्शन देखते हों, पर शहरों में रहने वाले लोग शायद ही दूरदर्शन देखते हों. कंटेंट के स्तर पर दूरदर्शन बेहद दोयम दर्जे का है. दूरदर्शन पर बुद्ध और चाणक्य जैसे कालजयी चरित्रों पर आधारित धारावाहिकों को दिखाया तो जाता है, जिनकी उपस्थिति मात्र ही है, जिनसे किसी तरह का जोश और जज्बा उत्पन्न नहीं होता. वहीं धारावाहिकों के नाम पर कहीं देर न हो जाए, दिल जो न कह सका, पवित्र बंधन और संन्यासी जैसे दोयम दर्जे के कार्यक्रम दिखाएं जाते हैं. बच्चों के कार्यक्रम के नाम पर तो ऐसे कार्यक्रम आते हैं, जिन्हें देखने और कुछ सिखने की बजाए इन्हें देखते-देखते ही बच्चे सो जाएं. रियालिटी शो के नाम पर फैमिली नंबर वन जैसे वाहियात कार्यक्रम आते हैं और दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली फिल्में भला कोई क्यों देखे? नई फिल्मों के कॉपीराइट्स खरीदकर अन्य चैनल्स रिलीज के कुछ समय बाद ही फिल्में टेलीकास्ट का देते हैं, जबकि दूरदर्शन पर फिल्में दिखाई भी जाती हैं तो नई या पुरानी बेहतरीन फिल्में नहीं, बल्कि कुछ भी दिखा देने का चलन है, वो भी कांट-छांट कर. कुल मिलाकर ये किसी भी क्लास को संतुष्ट नहीं करते.
दूरदर्शन के दूसरे विभागों का भी यही हाल है. 2003 मेंे दूरदर्शन से अलग 24 घंटे का समाचार चैनल शुरू किया गया डीडी न्यूज. वैसे तो देश की अनेक भाषाओं में समाचार प्रसारित करने वाला यह एकमात्र चैनल है, जिसकी पहुंच देश की आधी जनसंख्या तक है. समाचार भी इस पर पूरे दिन चलता है, लेकिन फिर भी लोग इस पर समाचार देखने के बजाए अन्य चैनलों पर ही समाचार देखना पसंद करते हैं. बेवकूफी की हद देखिए कि दूसरे चैनलों का कॉन्सेप्ट चुराकर एक कार्यक्रम शुरू किया गया इस पर. रात साढ़े दस बजे आने वाले इस प्रोग्राम का नाम है फटाफट न्यूज़. अब कोई यह बताए कि पूरे दिन चलने वाले न्यूज के बाद इस प्रोग्राम में आखिर क्या नया दिखाते हैं ये. प्रसार भारती के सीईओ केएस शर्मा कहते हैं कि डीडी न्यूज विजिबली काफी खराब है, लेकिन यह सैटेलाइट चैनल है और इसके कंटेंट करेंट अफेयर्स होते हैं. यह न्यूज चैनल नहीं है. दूरदर्शन पर सरकारी खबरों को ज्यादा दिखाए जाने के संबंध में वह ब़डी आसानी से पल्ला झा़डते हुए कहते हैं कि सरकार ही सबसे बड़ी न्यूज मेकर है. दूरदर्शन के लगातार गिरते स्तर की जांच की मीडिया कनसल्टेंट सिद्धार्थ रे ने. रे ने अपने अध्ययन में पाया कि दूरदर्शन का स्तर केबल और सैटेलाइट चैनल्स के प्रभाव के कारण नहीं गिरा, बल्कि इसलिए गिरा कि दूरदर्शन अपने दर्शकों के बदलते पसंद के साथ नहीं चल सका. दूरदर्शन पर उठते सवाल और दिनोंदिन गिरते स्तर को सुधारने के लिए दूरदर्शन ने उच्च स्तर के कार्यक्रमों के निर्माण करने की बात कही. इसके लिए उन्होंने कुछ अच्छे प्रोडक्शन कंपनियों से संपर्क करने की बात कही. इसके तहत कुछ कार्यक्रमों की भी शुरुआत की गई. जैसे संजय लीला भंसाली का सीरियल सरस्वतिचंद्र का प्रसारण दूरदर्शन पर किया गया, जोकि पहले ही स्टार प्लस पर आता है. अब स्टार पर पहले से ही इस धारावाहिक को देख रहे दर्शक भला दूरर्दशन पर इसे देखने का कष्ट क्यों करेंगे? इससे अलग कहानी ऑल इंडिया रेडियो की नहीं है. प्राइवेट रेडियो चैनल्स की धूम के बीच ऑल इंडिया रेडियो की आवाज कहीं दब सी जाती है. प्राइवेट रेडियो चैनल लिसनर्स की पसंद को समझते हुए अपने कंटेंट को बेहतर बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं, उनका पूरा कार्यक्रम इन्फोटेनमेंट पर आधारित होता है.
सरकार पर निर्भरता
दूरदर्शन और आकाशवाणी सरकार के हाथ की कठपूतली इसलिए है, क्योंकि आज तक ये वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन सके. सरकार इनकी वित्तीय मदद करती है और सच तो यह है कि सरकार भी चाहती है कि कभी ये आत्मनिर्भर न बनें, जिससे उनके नियंत्रण में रहें. 2008-09 में दूरदर्शन का कुल राजस्व 737.05 करोड़ रुपये था, जबकि खर्च 1152.42 करोड़ रुपये है. यानी इस साल 400 करोड़ रुपये से अधिक के घाटे में था, जबकि कई नए प्राइवेट चैनलों ने कुछ ही समय में बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत बनी ली और प्रॉफिट में जा रहे हैं. आकाशवाणी का भी यही हाल है. आकाशवाणी की कमाई 2008-09 में सिर्फ 208 करोड़ थी, जबकि आकाशवाणी 232 रेडियो स्टेशन चलाता है, जिसमें से 171 एफएम स्टेशन हैं. देश भर में स्थित निजी एफएम चैनलों की संख्या 242 हैं और 2008-09 में इनकी कुल कमाई 632 करोड़ रुपये थी. दरअसल, कई शहरों में आकाशवाणी के स्टेशन लोकप्रिय हैं, लेकिन मार्केटिंग के मामले में यह पीछे रह जाते हैं, जबकि प्राइवेट चैनल्स के लिए रिवेन्यू खुद जेनरेट करना होता है. ऐसे में वे मार्केटिंग पर ज्यादा ध्यान देते हैं. सोशल मीडिया और इंटरनेट का भी सहारा आजकल चैनल्स अपनी मार्केटिंग के लिए ले रहे हैं, पर यहां भी दूरदर्शन या आकाशवाणी की उपस्थिति नगण्य है.
प्रसार भारती
प्रसार भारती का गठन दूरदर्शन और आकाशवाणी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के इरादे से किया गया था. 29 जून, 1989 को प्रसार भारती एक्ट पहली बार लोकसभा में तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री पी. उपेन्द्र के समय में पेश किया गया. जुलाई, 1990 में संसद ने इसे पारित किया और इसे तुरंत ही राष्ट्रपति ने स्वीकृति दे दी, लेकिन इसे अधिसूचित नहीं किया गया, क्योंकि उसी दौरान कांग्रेस सत्ता में आ गई थी. कांग्रेस का मानना था सैटेलाइट चैनलों के संदर्भ में प्रसार भारती एक्ट में कई संशोधनों की जरूरत है. प्रसार भारती अधिनियम (एक्ट) को संसद में पारित होने के सात साल बाद अधिसूचित कर कानून का रूप 1997 में दिया गया. इस कानून ने दूरदर्शन और आकाशवाणी को स्वायत्तता प्रदान की, लेकिन सिर्फ कागजों पर. दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक भास्कर घोष कहते हैं कि प्रसार भारती एक्ट का सेक्शन 22 कहता है कि केंद्र जब चाहे, प्रसार भारती को कोई भी निर्देश दे सकता है. सवाल यह है कि फिर ऐसे में प्रसार भारती की स्वायत्तता क्या रही? कई समितियां बैठी और सबने यही कहा कि सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त होने और वास्तविक स्वायत्तता प्राप्त करने के लिए प्रसार भारती को वित्तीय तौर पर आत्मनिर्भर बनना होगा, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. नियुक्तियां भी यहां सरकार के इशारे पर होती हैं, जिनसे कुछ सुधार की उम्मीद करना बेकार है. पूरा का पूरा सिस्टम सरकार के इशारों पर चलता है. प्रसार भारती ने 2010 के बाद दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के लिए लगभग 200 से अधिक सलाहकारों की नियुक्ति की है, पर हकीकत में 2010 के बाद लगभग 42 सलाहकारों को कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त किया गया था, जिनमें से 8 को निष्कासित कर दिया गया. इनमें से लगभग 23 सलाहकारों को दूरदर्शन के डायरेक्टर जनरल द्वारा नौकरी पर रखा गया और 6 दूरदर्शन के न्यूज़ सर्विस डिविजन के डायरेक्टर जनरल द्वारा नौकरी पर रखे गए थे. वहीं ऑल इंडिया रेडियो रिटायर हो चुके 216 सलाहकारों को बनाए रखा है, जबकि न्यूज़ डिविजन ने 8 रिटायर्ड न्यूज रीडर सह ट्रांसलेटर्स को नियुक्त किया था. यह तो मात्र एक बानगी है. प्रसार भारती अपने ख़र्च के लिए सरकार पर निर्भर है, जो उसकी स्वायत्तता में सबसे बड़ी बाधा है. प्रसार भारती का ख़र्च क़रीब 1800 करोड़ रुपए है और उसकी आमदनी स़िर्फ 600 करोड़ रुपए. सरकार पूरी तरह से प्रसार भारती की मदद करती है और उसे कंट्रोल में भी रखती है. हालांकि प्रसार भारती के पास अरबों की प्रॉपर्टी है, जिसे सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता तो सरकार पर निर्भरता खत्म होती. प्रसार भारती के पास सबसे बड़ी ताकत प्रसारण से जुड़ा इसका विशाल ढांचा है, करोड़ों-अरबों की जमीन, विशाल टावर्स, ट्रांसमीटर और सैकड़ों इंजीनियर इसके पास हैं. इस विशाल भंडार को अगर किराए पर भी दे दे तो इसके खर्चे आसानी से निकल जाए. दरअसल, सरकार खुद चाहती है कि प्रसार भारती की निर्भरता हमेशा सरकार पर बनी रहे, ताकि सरकार अपने हिसाब से उसे चला सके. अगर वास्तव में प्रसार भारती की निर्भरता सरकार पर से खत्म हो जाएगी तो, यह सरकार के हाथों की कठपुतली नहीं रहेगी और खबरों को लेकर न्यायप्रिय हो जाएगी. ऐसे में हो सकता है कि यह सरकार के खिलाफ ही ख़डी हो जाए और उसकी पोल खोलती नजर आए.

कभी दूरदर्शन की धूम थी…
दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को हुआ था. इसके तहत आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों को शुरू किया गया. उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में सिर्फ तीन दिन आधा-आधा घंटे होता था. तब इसे टेलीविजन इंडिया नाम दिया गया था. 1975 में इसे दूरदर्शन नाम दिया गया. शुरुआती दौर में दिल्ली भर में 18 टेलीविजन सेट लगाए गए और फिर दूरदर्शन का प्रभाव धीरे-धीरे ब़ढने लगा. दिल्ली (1965), मुंबई (1972), कोलकाता (1975), चेन्नई (1975) में इसके प्रसारण की शुरुआत हुई. दूरदर्शन 80 के दशक में देश के कोने-कोने में पहुंच गया. 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के दौरान ब्लैक ऐंड ह्वाइट दूरदर्शन रंगीन भी हो गया. दूरदर्शन पर पहला पारिवारिक कार्यक्रम प्रसारित हुआ हम लोग. भारत और पाकिस्तान के विभाजन पर आधारित बुनियाद को भी लोगों ने काफी पसंद किया. इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ (मास्टर जी), अनीता कंवर (लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ घर घर में लोकप्रिय हो चुके थे. फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारवाहिकों ने दूरदर्शन को घर-घर प्रिय बना दिया.  इस पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम थे मालगुडी डेज़, ये जो है जिंदगी, रजनी, ही मैन, वाहः जनाब, तमस, नुक्कड़, सिग्मा,स्पीड, जंगल बुक, कच्ची धूप, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, सुरभि, शांति चित्रहार, कथासागर, विक्रम बेताल, फिल्मी गानों पर आधारित चित्रहार, भारत एक खोज, व्योमकेश बक्शी, टर्निंग प्वॉइंट, अलिफ लैला, चंद्रकांता शाहरुख़ खान की फौजी, देख भाई देख. इन कार्यक्रमों के जरिये दूरदर्शन पूरे देश की पसंद बन गया था. गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी इन धारवाहिकों को ज़बर्दस्त लोकप्रियता मिली. किसान भाइयों का कार्यक्रम कृषि दर्शन और बीच-बीच में मोटिवेशनल विजुअल्स मिले सुर मेरा तुम्हारा, प्यार की गंगा बहे देश में, स्कूल चलें हम, सूरज एक चंदा तारे अनेक, एक चिड़िया अनेक चिड़िया, एक अन्न का ये दाना सुख देगा मुझको मनमाना को काफी पसंद किया गया. श्रीकृष्ण, टीपू सुल्तान, चाणक्य, रामायण और महाभारत जैसे ऐतिहासिक धारावाहिक काफी सफल रहे. रामायण की लोकप्रियता का आलम तो ये था कि लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करके अगरबत्ती और दीपक जलाकर रामायण का इंतजार करते थे और एपिसोड के खत्म होने पर बकायदा प्रसाद बांटी जाती थी. रविवार की दुट्टी दर्शकों के लिए खास होती थी. सुबह गीत संगीत के कर्यक्रम रंगोली से होती थी और उसके बाद कई बेहतरीन प्रोग्राम्स और 4 बजे फिल्म.
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