श्रेया घोषाल ने कहा ….. आइटम के बहाने अशलील गाने कभी नही गाउगी

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कोई भी इंसान सफल तभी होता है, जब वह समय और परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढाल लेता है. सुरों की मल्लिका श्रेया घोषाल का कहना है कि उन्होंने ख़ुद को ऑडियंस के डिमांड के मुताबिक अब ढाल लिया है. सच तो यह है कि श्रेया की आवाज़ दिल को सुकून पहुंचाती है. आज की फिल्मों की एक बहुत ब़डी डिमांड है आइटम सॉन्ग्स.  यही वजह है कि एक तरफ उन्होंने देवदास का सिलसिला ये चाहत का…, ऐ मेरी जिंदगी…, चलो तुमको लेकर चलें…जैसे गीतों से लोगों को दिवाना बनाया, तो वहीं दर्शकों के आइटम सॉन्ग्स के प्रति ब़ढते के्रज को देखते हुए उन्होंने ओ बलमा…, ऊ ला ला…, चिकनी चमेली…, चलाओ ना नैनों से बाण रे…, तेरा इश्क ब़डा तीखा…जैसे गाने भी गाए. लेकिन वह कहती हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह आइटम के नाम पर अश्‍लील गाने कभी नहीं गाएंगी, श्रेया ने कहा, और अगर ऐसे मौके आए, तो मैं उन गीतों को ठुकराने से परहेज भी नहीं करूंगी. हाल ही में एक रियालिटी शो के सिलसिले में दिल्ली आईं श्रेया घोषाल की चौथी दुनिया की संवाददाता प्रियंका प्रियम तिवारी  से हुई बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश : 

हर वर्ग के लोगों की आप पसंद हैं, पहले और अब के गानों के बारे में आप क्या कहेंगी.
पुराने दौर के संगीत की बात करें, तो तब संगीत में मेलोडी थी. ख़ासकर रोमांटिक मेलोडी, लेकिन आज के गीतों में वह बात, वह कशिश नहीं है. पहले के गानें दिल को छू लेने वाले होते थे, लेकिन आज के गानों में उस स्तर की मेलोडी नहीं होती है. वैसे, दरअसल, तब अच्छे गीतकार भी थे. हालांकि अच्छा लिखने वाले आज भी हैं, लेकिन एक सच तो यह भी है कि उनसे काम नहीं लिया जा रहा है. इसकी वजह यह है कि फिल्मकारों को लगता है कि आज के समय में त़डकते-भ़डकते गाने ही लोगों को पसंद आ रहे हैं, शायद इसीलिए वैसे गीत न केवल लिखे, बल्कि गाए भी जा रहे हैं.

एक गायिका के रूप में कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा खुशी देती है ?
जब मैं बाहर जाती हूं किसी मॉल में, पार्टी में, शादियों में और देखती हूं कि लोग मेरे गीतों को एंज्वाय कर रहे हैं, तो मुझे बेहद खुशी होती है.

आपको लगता है कि समय की मांग के मुताबिक हॉट सॉन्ग्स गाना अब गायकों की मजबूरी बन गई है?
हां, आप यह कह सकते हैं, लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि यह किसी चैलेंज से कम नहीं है. यह काफी मुश्किल काम है. अच्छे मेलोडी वाले सॉन्ग्स आप दिल से गाते हैं, जबकि ऐसे गीत, जिनमें न समझ आने वाले शब्द हों, बिना भाव वाले वाक्य हों, उन पर गाना और यह भी उम्मीद करना कि वह सबको पसंद आए, वाकई मुश्किल काम है. ३ मीनट का गीत या तो छा जाता है, या फिर एकदम बाहर हो जाता है, यानी तुरंत खारिज हो जाता है. दरअसल, अब वह ट्रेंड बिल्कुल नहीं रहा, जब कोई गीत धीरे-धीरे लोगों की जुबान पर आता था और फिर उसे सुना जाता था.

क्या आप भी इस तरह के गीत गाएंगी?
नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगी. मैंने कुछ गानों को तो गाने से इंकार भी कर दिया है. हर चीज की एक सीमा होती है. सच तो यह है कि जिन गानों के साथ मैं सहज महसूस नहीं कर सकती, उन गानों को मैं नहीं गा सकती.

आप कई अन्य भाषाओं बांग्ला, असमी, राजस्थानी, तेलुगू में भी गाती हैं?

जी हां, मैं कई भाषाओं में गा सकती हूं, क्योंकि हर भाषा को मैं एंज्वाय करती हूं. मैं बांग्लाभाषी हूं, इसलिए घर में बांग्ला में ही बोलती हूं. चूंकि राजस्थान में मेरी परवरिश हुई है, इसलिए यहां के लोकसंगीत और जीवन से मैं भलीभांति परिचित हूं. मुझे दूसरी भाषाओं से भी गाने का ऑफर मिल रहा है. हां, जो भाषा मैं नहीं जानती, उसके साथ थो़डी समस्या मुझे ज़रूर होती है, लेकिन लगातार कोशिश करने से कोई भी काम असंभव नहीं होता. भारतीय फिल्मों में बहुत-सी धुनें और गीत लोकसंगीत से ही प्रभावित होते हैं.

ऐसे कौन से गीत हैं, जिन्हें आप गाना चाहेंगी?

कोई एक नहीं, ऐसे बहुत से गाने हैं, जिन्हें मैं गाना चाहूंगी. उनमें से कुछ हैं, बहारों मेरा जीवन भी संवारो…, माई री कासे कहूं…, हमारी याद आएगी…, किस तरह भूलेगा दिल…, ये जिंदगी उसी की है…, मेघा छाए आधी रात…, इन आंखों की मस्ती के…, पिया तोसे नैना लागे रे…, ये सब गाने आज भी मेरे पसंदीदा हैं, जो मेरे मन को छू लेते हैं.

आपकी जिंदगी का वह पल, जिसने आपके जीवन की दिशा बदल दी?
जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं, लेकिन रिएलिटी शो सारेगामा के बाद कल्याणजी ने मुझे मुंबई आने की सलाह दी. और दरअसल, इसीलिए मैं अपने परिवार के साथ मुंबई आ गई. इसके बाद जिस पल मुझे फिल्म देवदास में पारो की आवाज के लिए चुना गया, वह पल वाकई मेरे जीवन का सबसे यादगार पल था. सच तो यह है कि इसके बाद मेरा जीवन और इसके मायने ही बदल गए. हालांकि मैं हर गीत को अपने लिए एक नया अवसर मानती हूं. दरअसल, मेहनत, लगन, भक्ति ही किसी भी इंसान को इस उचाई पर बैठाती है. मेरी मेहनत और मां पापा के आशीर्वाद के कारण ही मैं यहां तक पहुंच पाई हूं.

फिल्मों में लोगों की पसंद लगातार बदलती रहती है. कुछ समय पहले सूफी गीत चलन में थे, लेकिन आजकल आइटम सॉन्ग की डिमांड है. आगे कैसे गीत चलन में होंगे?
मुझे लगता है कि लोग शायद फिर से रोमांटिक गीतों को सुनना पसंद करेंगे. वैसे, ड्यूट सांग बहुत सुने जा रहे हैं इन दिनों. मैं अपने शो में भी देखती हूं कि ज्यादातर फरमाइशें रोमांटिक गीतों को लेकर ही होती हैं.

किस तरह के गाने आप गाना पसंद करती हैं?
मैं हर तरह के गाने गाती हूं, ठुमरी से लेकर क्लब नंबर तक, लेकिन मुझे इमोशनल और दिल को छू जाने वाले गाने ज्यादा लुभाते हैं.

आप एक रिएलिटी शो से आई हैं. इस तरह के शो के बारे में आप क्या सोचती हैं?
जब मैंने टैलेंट हंट शो में हिस्सा लिया था, तब ये शो इतने ऑडियंस बेस्ड नहीं होते थे. आजकल टैलेंट  हंट शो के चलते ही प्रतियोगी रातोंरात पॉपुलर हो जाते हैं. खुद फिल्म इंडस्ट्री भी नए-नए टैलेंट को ढूंढती रहती है. इन टैलेंट हंट शो में हिस्सा लेने वाले प्रतियोगी अगर मेहनत करें, तो वे अपना करियर खुद बना सकते हैं.

भविष्य के लिए आपकी योजना क्या है?
जिंदगी में हमेशा गाती रहूं, यही मेरी योजना और तमन्ना है. दरअसल, मैं समाज के लिए अच्छा करना चाहती हूं, इसीलिए अभी एक अच्छे मीडियम की तलाश में हूं.


…और लता जी की बात सच हुई

श्रेया घोषाल का जन्म 12 मार्च 1984 को बहरमपुर पश्‍चिम बंगाल में हुआ था. उनका बचपन राजस्थान कोटा के पास एक छोटे से कस्बे रावतभाटा में बिता. पिता भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में नाभिकीय ऊर्जा संयत्र इंजीनियर के रूप में काम करते हैं. मां साहित्य में स्नातकोत्तर हैं. चार साल की उम्र में श्रेया ने अपनी मां के साथ हारमोनियम सीखना शुरू किया. संगीत के प्रति उनके लगाव को देखते हुए उनके माता-पिता ने उन्हें कोटा में महेशचंद्र शर्मा के पास शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने के लिए भेजा. सारेगामा में उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर कल्याणजी ने उन्हें मुंबई में आकर रहने के लिए कहा. श्रेया ने 18 महीने तक कल्याण जी से संगीत की शिक्षा ली. श्रेया एक प्रतियोगी के रूप में जीटीवी के शो सारेगामा से सुर्खियों में आई थीं. तब वह छोटी-सी बच्ची थी. उस दौरान शो के जज कल्याण जी थे और कार्यक्रम की मेजबानी की थी सोनू निगम ने. लता जी ने श्रेया के अद्भूत प्रतिभा को देखकर तभी कहा था कि यह बच्ची काफी आगे जाएगी. लता जी की बात सच साबित हुई और श्रेया आज सर्वश्रेष्ठ गायिकाओं में गिनी जाती हैं. वह अपनी पहली ही फिल्म के बाद स्टार बन गईं. हुआ यह कि जब दूसरी बार उन्होंने सारेगामा में भाग लिया, तब वह वयस्क हो चुकी थीं. तब संजय लीला भंसाली अपनी फिल्म देवदास की तैयारी में लगे थे. उन्होंने श्रेया को सारेगामा में सुना और उन्हें देवदास के पारो, जिसकी भूमिका ऐश्‍वर्या राय निभा रही थीं, की आवाज के लिए चुन लिया. देवदास के गाने के लिए उन्हें उस साल के सर्वश्रेष्ठ गायिका का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी दिया गया. गौरतलब है कि उसी साल उभरती हुई गायिका का आरडी बर्मन पुरस्कार भी उन्हें दिया गया.

 

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