लेखकों में क्रिएटिव राइटिंग के लिए जगह नहीं : मुअज्जम बेग

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रॉकस्टार, साड्डा हक़, मनी है तो हनी है जैसी सफ़ल फिल्मों के पटकथा लेखक मुअज्जम बेग अपनी अगली फिल्म की तैयारी में लगे हैं. मुअज्जम अभिनेता और स्क्रिप्ट राइटर दोनों हैं. पहली फिल्म कीअपार सफलता के बाद भी मुअज्जम बॉलीवुड की दोहरी नीति से आहत हैं. वह कहते हैं कि इंडस्ट्री में सहायक कलाकारों का स़िर्फ शोषण किया जाता है. उन्हें काम के एवज में न उचित मेहनताना मिलता है और न ही नाम. आखिर, कैसे लेखकों का शोषण किया जाता है, इन तमाम मुद्दों पर बेग ने चौथी दुनिया संवाददाता प्रियंका तिवारी  से बातचीत की. पेश है, इस साक्षात्कार के मुख्य अंश:

आप कहां के रहने वाले हैं?

मैं उत्तर प्रदेश के ज़िला शाहजहांपुर का रहने वाला हूं. शुरुआती प़ढाई-लिखाई और परवरिश मेरी वहीं हुई. उसके बाद आगे की प़ढाई के लिए मैं दिल्ली चला आया. शाहजहांपुर राजनीतिक और ऐतिहससिक दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण स्थान है.

छोटे शहर से शायद ही लोग फिल्मों में करियर बनाने के बारे में सोचते हैं. आपको कहां से प्रेरणा मिली?
जी हां, छोटे शहर से निकलकर फिल्म इंडस्ट्री में करियर बनाना वाकई चुनौतिपूर्ण काम है, लेकिन मुझे बचपन से ही फिल्मों में काम करने का जुनून था. मैं शाहजहांपुर में स्टेज शो करता था. तब मैं अभिनय किया करता था, लेकिन अचानक मेरा रुझान पटकथा लेखन की तरफ़ हुआ. मेरे लगाव को देखते हुए मेरे घरवालों ने न स़िर्फ मुझे फिल्मों में काम करने की अनुमति दी, बल्कि इसके लिए बाक़ायदा कोर्स करने के लिए भी सुझाव दिया. फिर मैंने जामिया मिलिया इस्लामिया में मास कम्युनिकेशन ऐंड फिल्म मेकिंग में एडमिशन लिया.

शाहजहांपुर जैसे शहर से आने के बाद आपको काफ़ी स्ट्रगल करना प़डा होगा. सच तो यह है कि आपका कोई फिल्मी बैकग्राउंड भी नहीं था?
जी हां, काफ़ी स्ट्रगल करना प़डा था. 8-9 साल के स्ट्रगल के बाद मेरी फिल्म रॉकस्टार रीलिज हुई. हालांकि आज भी स्ट्रगल पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है.

आप हमेशा से पटकथा लेखक ही बनना चाहते थे?
शुरुआत में मैं थिएटर से ज़ुडकर अभिनय किया करता था. उसके बाद मैं नाटक लिखने लगा. यह शौकिया तौर पर था, लेकिन मुझे लगा कि मैं काफी अच्छा लिख सकता हूं. इसलिए बाद में मैंने गंभीरता से लिखना शुरू कर दिया. मैंने अपने करियर की शुरुआत मुक्ता आर्ट से की. पहले से काम कर रहे पटकथा लेखकों ने मुझे काफी गाइड किया. उनसे मैंने काफ़ी कुछ सीखा. हालांकि अब वह समय नहीं रहा, जब कोई किसी को कुछ सिखाए.

 एक लेखक के रूप में बॉलीवुड में किस तरह की मुश्किलें आती हैं?
बॉलीवुड में जहां एक तरफ अरबों का कारोबार होता है, निर्माता, निर्देशक और अभिनेता-अभिनेत्री लाखों-करो़डों में खेलते हैं, वहीं लेखकों को कोई पूछता भी नहीं. सच तो यह है कि उन्हें टीम का हिस्सा तक नहीं माना जाता. फिल्म की सफलता समारोह तक से उन्हें दूर ही रखा जाता है. अवॉर्ड प्रोग्राम्स में भी नहीं बुलाया जाता. इसके अलावा 90 प्रतिशत फिल्में हॉलीवुड, साउथ वगैरह से कॉपिड होती हैं. क्रिएटिव राइटिंग की भी बॉलीवुड में कोई कद्र नहीं होती. लेखकों को अपनी स्क्रिप्ट को लेकर काफी जूते घिसने प़डते हैं. अब इसी से समझ लीजिए कि मैंने अपनी कई फिल्मों, जैसे रॉकस्टार और साड्डा अड्डा की कहानी काफ़ी पहले ही लिख ली थी, लेकिन उन्हें पास कराने में 7-8 साल का वक्त लग गया. और तो और, अगर आपकी स्क्रिप्ट फिल्म निर्माता-निर्देशक को पसंद भी आ जाए, तो उसकी कहानी को तो़ड-मरो़ड कर पेश किया जाता है.

अपनी हिट फिल्म रॉकस्टार के बारे में कुछ बताइए.
जब मैं सुभाष घई के प्रोडक्शन हाउस में काम कर रहा था, उसी दौरान मेरी मुलाकात इम्तियाज अली से हुई. मैंने रॉकस्टार की कहानी बहुत पहले लिखी थी. इम्तियाज उस पर फिल्म बनाना चाहते थे. हालांकि पहले भी हमने इस फिल्म को बनाने की प्लानिंग की थी, लेकिन किन्हीं कारणों से यह स्थगित हो गया था. अंत में यह फिल्म बनी. मेरे लिए यह जीवन का सर्वाधिक खुशनुमा पल था. रॉकस्टार हिट हुई और एक नहीं, कई सारे अवॉर्ड्स मिले. एक बात और मैं ज़रूर कहना चाहूंगा कि मेरे फिल्म के रोल के साथ रणवीर ने पूरा-पूरा न्याय किया.

 क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आपकी फिल्म रॉकस्टार हर वर्ग की पसंद नहीं थी?
जी हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि यह फिल्म हर वर्ग की पसंद नहीं थी. कोई फिल्म हर वर्ग की पसंद नहीं हो सकती, क्योंकि हर वर्ग की अपनी अलग पसंद होती है. यह फिल्म एक ऐसे युवा की कहानी थी, जो अपने हिसाब से जीवन को जीता है, जिसे सामाजिक बंदिशें पसंद नहीं हैं. मेरे लिए खुशी की बात यह है कि इस फिल्म को कुछ लोगों ने ही सही, लेकिन काफ़ी पसंद किया. हालांकि मेरा अपना विजन इम्तियाज अली के रॉकस्टार, जिसे लोगों ने सिनेमाघरों में देखा, उससे थोड़ा अलग था.

अपनी अगली फिल्म मुन्ना भाई किलर्स ऑर हिलर्स के बारे में कुछ बताइए?
अब तक मैंने यूथ के लिए फिल्में बनाई है. इस बार मैं स्टार्स के जीवन पर फिल्म बनाने जा रहा हूं, तो यह मेरे लिए एक नया अनुभव है. दोनों कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ब़डे और लोकप्रिय कलाकार हैं. दोनों ने कुछ गलतियां कीं, जिनकी उन्हें सजा मिलने की बात हो रही है, लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आई. मैं इन्हें करीब से जानता हूं. मैंने देखा कि उनके नकारात्मक पक्ष को जानने के बाद भी उनके फैंस का लगाव उनके लिए कम नहीं हुआ. ऐसे में मैंने सोचा कि क्यों न उनके जीवन पर फिल्म बनाई जाए और दर्शकों को उनके जीवन की कुछ ऐसी बातों से रूबरू कराई जाए, जिसे वे नहीं जानते.

 इस फिल्म की ख़ासियत क्या है?

मैं इस फिल्म में दर्शकों को यह दिखाना चाहता हूं कि असल जीवन में सलमान और संजय कैसे हैं? उनकी ज़िंदगी के बहुत से पक्ष ऐसे भी हैं, जिनके बारे में लोगों को पता नहीं है. फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस को देखें, तो पाएंगे कि एक तरफ़ मुन्ना भाई है, तो दूसरी तरफ़ उसके कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं. वह इमोशनल है, समाज के लिए बुरा है, तो अच्छा भी है.

 ऐसा माना जाता है कि इंडस्ट्री में सहायक कलाकारों की कोई कद्र नहीं है, कितना सच है!
हां, यह बिलकुल सच है. फिल्मों के चमक-दमक से प्रभावित होकर ऐसे न जाने कितने युवा हैं, जो इंडस्ट्री में करियर बनाने के सपने देखते हैं. यहां पैसा और शोहरत सबकुछ है, लेकिन सबके लिए नहीं. बड़े अभिनेता और फिल्मकार जहां लाखों-करोड़ों में खेलते हैं, वहीं सहायक कलाकारों का यहां शोषण किया जाता है. उन्हें उनके काम के एवज में न उचित मेहनताना मिलता है, न नाम. वे इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहें, तो भी कोई उनकी आवाज़ सुनने वाला नहीं है. उल्टे उन्हीं की बदनामी होती है और आगे काम मिलना बंद हो जाता है. इंडस्ट्री में अधिकतर डायरेक्टर ख़ुद ही कहानी का ताना-बाना बुनते हैं और किसी लेखक से पूरी कहानी लिखवा लेते हैं. इसमें लेखक का अपना कुछ नहीं होता. उस पर रोल घटाने-बढ़ाने का भी दबाव रहता है. जो दिखता है, वही बिकता है, की तर्ज़ पर एक बार शुरू होने के बाद फिल्म की कहानी किधर जाती है, यह तो लेखक को भी नहीं पता होता. लेखकों को एक फिल्म के पांच सौ या एक हज़ार रुपये मिल जाते हैं, जबकि बजट में फिल्म लेखन के लिए लाखों का प्रावधान दिखाया जाता है. महत्वपूर्ण कड़ी होने के  बावजूद आश्‍चर्य की बात तो यह है कि फिल्म निर्माण के बाद लेखकों को क्रेडिट लाइन से बाहर ही रखा जाता है.

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