मानसिक अक्षम बच्चे: बहिष्कार न करें, वेदना को समझें

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नीतिन की उम्र 31 साल है। वह आम बच्चों की तरह न खेल पाता है, न सोच-समझ पाता है, क्योंकि वह शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर है। उनके पिता डॉ. केपी सिंह रक्षा मंत्रालय में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रह चुके हैं। नीतिन  के बीमारी और लक्षण के बारे में बताते हुए श्री सिंह की आंखें भर आती हैं। कहते हैं कि उनकी एक ही चाह है कि उनकी आंखों के सामने ही बेटे की सांस टूटे, क्योंकि उनके बाद नीतिन को देखने वाला कोई नहीं है। मां बहुत पहले ही गुजर चुकी है। उसकी बहन आस्ट्रेलिया में डॉक्टर है, एक भाई एम्स में डॉक्टर है। अपने बेटे की ऐसी हालत देख कर समाज में इस तरह के अन्य बच्चों के लिए उनके दिल में संवेदना उत्पन्न हुई और उन्होंने दिल्ली के दवारका में एक्सेल वेलफेयर चैरिटेबल ट्रस्ट की  नींव डाली। इसका मकसद था समाज में रहने वाले इस तरह के अन्य बच्चों को एक अच्छा जीवन देना। उनका मानना है कि जैसे उनका बच्चा आज समाज से बहिष्कृत है, लोग उसे अजीब नजरों से देखते हैं, समाज में ऐसे और भी उपेक्षित बच्चे हैं।

डॉ केपी सिंह कहते हैं कि ऐसे बच्चे समान्य बच्चों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होते हैं। बस इन्हें जरूरत होती हैं प्यार की। प्यार से उन्हें कोई भी बात समझाई जा सकती है। दरअसल आज के परिवेश में लोग स्व केंद्रित हो गए हैं। वे खुद से ज्यादा किसी के बारे में नहीं सोच पाते। यहां तक की माता पिता को भी ऐसे बच्चे बोझ लगते हैं, क्योंकि वे डॉक्टर इंजीनियर बन कर उनका नाम रौशन नहीं कर सक ते। उन्हें लगता है कि आजीवन उनकी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी, ऐसे में माता पिता को ऐसे बच्चे बोझ से लगते हैं। वे सोचते हैं कि कल कि बजाए आज मर जाए। माता पिता और अपने ही भाई बहनों से मिलने वाले उपेक्षा के कारण कई बार उनकी स्थिति और गंभीर होती चली जाती है।

यह स्थिति सिर्फ नीतिन की नहीं है, बल्कि लाखों ऐसे हैं, जो इस समाज में रहते हुए समाज से तिरस्कृत है, क्योंकि उनकी समझ और सोच हमारे समाज की गति के अनुरूप नहीं है। दुखद है कि हमारा समाज इन्हें गति देने के लिए कोई प्रयत्न भी नहीं करता। सेक्टर बी, पॉकेट 2 वसंत कुंज स्थित मुस्कान एनजीओ ऐसे ही बच्चों को ट्रेंड करके उन्हें समाज में पुर्नस्थपित कर रही है। मुस्कान की डाइरेक्टर नीरा कहती हैं कि कि हम बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं। उन्हें पेंटिंग करना, क्राफट, मोमबत्ति बनाना, खाना बनाना और उसे सर्व करना सिखाते हैं। शुरुआत में इन बच्चों के समझने की क्षमता भले ही धीमी होती है, लेकिन हम उनमें ललक पैदा करते हैं। उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हम उन्हें महीने के आखिरी में सैलरी भी देते हैं। हालांकि यह काफी कम होता है, लेकिन इससे उनमें प्रोत्साहन बढ़ता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर के हमारे चार बच्चे एक रेस्टोरेंट में काम कर रहे हैं। वहां के लोग उनसे काफी खुश हैं। वो सबके  साथ प्यार से रहते हैं। चूंकि वो बहुत ज्यादा दिमाग से नहीं सोचते ऐसे में किसी भी तरह के आॅफिसियल पॉलिटिक्स या गॉसिप  का हिस्सा नहीं बनते। उनके लिए सभी सिर्फ दोस्त हैं। नीरा कहती हैं कि जब हम अपने बच्चों के रेस्टोरेंट में गए और वहां उनके सहकर्मियों से बात की तो उन्होंने बताया कि उनके व्यवहार से सभी वहां खुश हैं, उनमें से कोई एक दिन भी नहीं आए तो उनके सहकर्मियों को उनकी अनुपस्थिति खलती है। यही नहीं हम अपनी संस्थ में साारे त्योहार एक परिवार की तरह मनाते हैं। कल्चरल प्रोग्राम्स भी यहां आयोजित करते हैं। उनके फिटनेस, खान पान उनकी शारीरिक मानसिक जरुरतों को पूरा करने की हम हर संभव कोशिश करते हैं। यहां के बच्चों ने बताया कि घर की बजाए उन्हें यहां ज्यादा अच्छा लागता हैं।

क्या कहते हैं आकडेÞ
एक गैर सरकारी संस्था के अनाधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत में शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर लोगों की संख्या 6 करोड़ से भी ज्यादा है। इनमें तकरीबन 80 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जबकि शारीरिक एवं मानसिक कमजोरियों के शिकार 49 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। आंकड़ों से दूर हटकर देखें तो भाारतीय समाज में शारीरिक या मानसिक विकलांगता के शिकार लोगों को बोझ की तरह देखा जाता है। एकल परिवार के इस दौर में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। कई बार ऐसा देखा गया है कि माता-पिता भी उनकी परवरिश से मुंह मोड़ लेते हैं और उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं। ऐसे में उन्हें आरोग्य केंद्रों या अनाथालयों में माता पिता भर्ती करा देते हैं।

सरकार की उदासिनता
शारीरिक या मानसिक अक्षमता कई तरह की होती है। इसमें मानसिक विकलांगता, गूंगापन, बहरापन, अंधापन, चलने में असमर्थता आदि कई श्रेणियां हैं। भारत में इन श्रेणियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, जिसके चलते ऐसे लोग उन कानूनों और योजनाओं का लाभ भी नहीं उठा पाते, जो उनके फायदे के लिए बनाई गई हैं। पर्सन्स विद डिसेब्लिटीज (ईक्वल अपॉर्च्युनिटीज, प्रोटेक्शन आॅफ राइट एंड फुल पार्टिसिपेशन) एक्ट, 1995 में शारीरिक अक्षमता के शिकार लोगों के लिए समान अधिकार, अवसरों में समानता और उनकी भागीदारी की बात कही गई है। इसके अलावा इसमें समाज के इस वर्ग के सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार सुनिश्चित करने की बात भी कही गई है। लेकिन इस कानून के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें केवल सात तरह की अक्षमताओं की चर्चा है। इसके दायरे से बाहर के लोगों को इसका फायदा नहीं मिल पाता। इसके अलावा डिसेब्लिटीज एक्ट के प्रावधानों के तहत शारीरिक अक्षमता को चिकित्सकीय आधार पर परिभाषित किया गया है, इसके सामाजिक पहलुओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। भारत में समस्या यह है कि अधिकांश अभिभाावक शारीरिक या मानसिक कमजोरी को समय रहते समझ नहीं पाते और चिकित्सकीय प्रमाणपत्र के अभाव में इस कानून का फायदा नहीं उठा पाते। यही वजह है कि समाज के इस वर्ग को हर स्तर पर असमानता का शिकार होना पड़ता है। तमाम योग्यताओं के बावजूद उन्हें सामान्य शिक्षण संस्थानों में जगह नहीं मिल पाती और ऐसे शिक्षण संस्थानों का देश में नितांत अभाव है, जहां उनके लिए शिक्षा की विशेष व्यवस्था हो। उनके लिए सरकारी नौकरियों में 3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी है, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। निजी क्षेत्र की नौकरियां इस दायरे में नहीं आतीं, जबकि रोजगार के ज्यादा अवसर निजी क्षेत्र में ही उपलब्ध हैं। नेशनल ट्रस्ट एक्ट, 1999 भी अब तक इनकी हालत में ज्यादा बदलाव लाने में कारगर साबित नहीं हुआ है। दरअसल, शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर तबके की हालत में सुधार के लिए कानूनी पहलुओं के साथ उनके प्रति सामाजिक नजरिये में भी बदलाव की सख्त आवश्यकता है। उन्हें समाज का कोढ़ या भगवान के अभिशाप के रूप में देखे जाने की परंपरागत सोच बदलनी होगी। हमें यह समझना होगा कि वे भी इंसान हैं, उनकी भी भावनाएं होती हैं और उन्हें भी समाज में समानता के साथ जीने का हक है। इसके लिए जरूरी है कि उनकी देखभाल की उचित व्यवस्था हो, उन्हें शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें। इस मामले में गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। ये संस्थाएं समाज में जागरूकता फैलाने के अलावा शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता के शिकार लोगों के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती हैं। इसके अलावा, विकसित देशों की तर्ज पर आरोग्य केंद्रों एवं केयर सेंटरों का पूरे देश में जाल बिछाए जाने की जरूरत है। गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने वाले शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता के शिकार लोग चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं और उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो पाता। इसके साथ-साथ सरकार को इन लोगों के लिए यातायात की ऐसी सुविधाओं का विकास करना होगा, जिसका ये आसानी से इस्तेमाल कर सकें। अभी जो हालत है, उसमें देश में शारीरिक-मानसिक कमजोरियों के शिकार लोगों के इलाज के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सकों का घोर अभाव है। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना होगा। इसके साथ-साथ कानून में भी बदलाव की जरूरत है, इसे ज्यादा समग्र बनाया जाना चाहिए, जिससे हर श्रेणी के अक्षम लोग लाभांवित हो सकें। निजी क्षेत्रों एवं गैर सरकारी संस्थाओं को भी समाज के इस वर्ग के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा, तभी किसी व्यापक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। शारीरिक और मानसिक कमजोरियों के शिकार लोग अपने दम पर जिंदगी जीने में समर्थ नहीं होते, बल्कि दूसरों पर निर्भर होते हैं। उनकी जरूरतें भी  अलग-अलग होती हैं, लेकिन इनकी सबसे बड़ी जरूरत मानसिक सहयोग की होती है। हम यदि इन्हें यह उपलब्ध कराने में कामयाब हुए तो समाज का यह उपेक्षित वर्ग भी समाज में बराबरी के स्तर पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है।

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