भोजपुरी फिल्‍म इंडस्‍ट्री का हालः कलाकार कंगाल निर्माता मालामाल

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कई भोजपुरी फिल्मों एवं एलबमों में काम कर चुके संजीव गुलाटी बताते हैं कि उन्हें इस इंडस्ट्री में काम करते हुए 15 साल से ज़्यादा बीत गए, लेकिन वह आज तक इतना नहीं कमा पाए कि ख़ुद के पैसे से एक बाइक ख़रीद सकें. संजीव कहते हैं कि भोजपुरी फिल्मों में काम के एवज में उन्हें प्रतिदिन 100-200 रुपये तक मिलते हैं. 100-200 रुपये में घर तो चलेगा नहीं, इसलिए वह अपना और अपने परिवार का ख़र्च चलाने के लिए बल्ब और मोमबत्ती सप्लाई का काम भी करते हैं. ज़ाहिर है, हम रुपहले पर्दे पर इन कलाकारों को देखकर उनकी हैसियत का अंदाज़ा का़फी बढ़ा-चढ़ाकर लगाते हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में हालात कुछ और ही होते हैं.

भोजपुरी फिल्मी दुनिया में ऐसे न जाने कितने युवा हैं, जो इंडस्ट्री की चमक-दमक से प्रभावित होकर इस क्षेत्र में करियर बनाने को उतावले हैं. जबकि समाज का आईना कही जाने वाली फिल्म इंडस्ट्री की सच्चाई यह है कि यहां सहायक कलाकारों का स़िर्फ शोषण किया जाता है. उन्हें उनकी मेहनत और प्रतिभा के अनुरूप पैसा नहीं मिलता है और अगर वे  इसके ख़िला़फ आवाज़ उठाना चाहते हैं तो उन्हें प्रताड़ित भी किया जाता है. धनंजय पांडे एक ऐसे ही कलाकार हैं, जिनके लिए अभिनय महज़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं, बल्कि शौक है. का़फी समय से रंगमंच से जुड़े धनंजय कई भोजपुरी फिल्मों एवं धारावाहिकों में काम कर चुके हैं. धनंजय ने महुआ चैनल पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक तहक़ीक़ात में भी काम किया, लेकिन उसके एवज़ में उन्हें आज तक एक पैसा नहीं मिला. जब उन्होंने पैसों की मांग की तो कहा गया कि पैसा ही देना होता तो सीनियर आर्टिस्ट को न ले लेते? महुआ पर ही प्रसारित होने वाले दूसरे धारावाहिक राग रागिनी के लिए बिचौलिए ललन पांडे ने उन्हें बढ़िया रोल का झांसा दिया. वह अपने पैसे ख़र्च करके शहर से बाहर स्थित शूटिंग स्थल तक गए, लेकिन उन्हें उनके लायक रोल नहीं मिला. जो रोल मिला, उसे उन्होंने बखूबी निभाया, लेकिन उसके भी पैसे नहीं मिले. पैसे मांगने पर उनसे झग़डा किया गया. इन कलाकारों को पैसे भी बिचौलियों द्वारा मिलते हैं, जो वे ख़ुद खा जाते हैं या बहुत कम देते हैं. अगर हम शिक़ायत करते हैं तो यूनिट से निकाल देने की धमकी दी जाती है. निराश धनंजय कहते हैं कि जब तक आपके व्यक्तिगत संपर्क नहीं हैं, तब तक आपकी प्रतिभा की यहां कोई कद्र नहीं है. पांच साल के करियर में मुझे एक पैसा नहीं मिला, उल्टे मैंने अपना समय और पैसा दोनों गंवाया. कलाकारों को बिचौलियों द्वारा काम मिलता है. ये बिचौलिए ऐसे नए लोगों की तलाश में रहते हैं, जो काम के लिए यहां-वहां अपना बायोडाटा डालते रहते हैं, वहीं से उनका नंबर हासिल कर लिया जाता है.

इस समय भोजपुरी फिल्मों का सालाना कारोबार क़रीब एक हज़ार करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया है. लगातार फिल्मों का निर्माण हो रहा है और बड़ी संख्या में लोग भोजपुरी फिल्मों से जुड़ रहे हैं. एक तऱफ बॉलीवुड के जाने माने सितारे अमिताभ बच्चन, हेमामालिनी, जैकी श्रॉफ, अजय देवगन एवं नगमा जैसे लोग मोटी क़ीमत लेकर इस इंडस्ट्री की शान बढ़ा रहे हैं तो दूसरी तऱफ यहां काम करने वाले सहायक कलाकार जी तोड़ मेहनत के बाद भी भुखमरी का सामना कर रहे हैं. 30 लाख रुपये की लागत से बनने वाली मनोज तिवारी की कॉमेडी फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला 15 करोड़ रुपये का व्यवसाय करती है, उन्हीं की दूसरी फिल्म दारोगा बाबू आई लव यू 4 करोड़ रुपये की कमाई करती है और मनोज तिवारी करोड़ों में खेलते हैं, पर उनकी फिल्मों में बतौर सहायक काम करने वाले कई कलाकार दाने-दाने को मोहताज हैं. ऐसे कई बड़े कलाकार और निर्माता हैं, जिनका अपना दामन तो दौलत से भर गया, लेकिन साथी कलाकारों को न शोहरत मिली और न पैसा.

शीतला माता प्रोडक्शन के तहत काम करने वाले रोहित बनर्जी बताते हैं कि वह दो साल से इस इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं, पर अभी तक कोई पेपर वर्क नहीं हुआ है. उन्होंने कई प्रोजेक्ट में लीड रोल भी किए, लेकिन एक बार जूनियर आर्टिस्ट का ठप्पा लग जाने पर जूनियर ही बने रहना पड़ता है. जहां बड़े कलाकार बार-बार रीटेक लेते हैं, वहीं हमारा काम एक ही बार में ओके हो जाता है. ज़्यादा समझ, ज़्यादा मेहनत के अलावा बिना कोई नखरा किए काम करने के बावजूद हमें कोई तवज्जो नहीं दी जाती. कई बार तो ऑडिशन हो जाने के बाद अंत में कोई पहुंच वाला शख्स आ जाने पर हमें निकाल दिया जाता है. शूटिंग के दौरान कई कलाकारों को एक साथ एक कमरे में ठहरा दिया जाता है. कुछ महत्वपूर्ण कलाकारों-टेक्नीशियनों को छोड़ दिया जाए तो भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाले अधिकांश लोगों के साथ लिखित अनुबंध तक नहीं होता. हो गइल बा प्यार ओढ़निया वाली से समेत कई फिल्मों में बतौर मेकअप आर्टिस्ट काम कर चुके धर्मवीर श्रीवास्तव सरीन खान के निर्देशन में बनने वाली फिल्म पटाव सटाव हटाव की तैयारी में हैं. वह कहते हैं कि फिल्म के मेकअप और नॉर्मल मेकअप में बहुत फर्क़ होता है. आजकल फिल्मों के लिए भी पार्लर में मेकअप होने लगा है, जिससे उनके धंधे को बहुत नुक़सान हुआ है. उनका कहना है कि इंडस्ट्री में सहायक कलाकारों का बहुत शोषण है. हर कोई चाहता है कि वह कम पैसे या मुफ्त में अपना काम करा ले. जबकि हम लोग भी समान रूप से मेहनत करते हैं. मनोज तिवारी जैसे बड़े कलाकार एक फिल्म के लिए 45 से 50 लाख रुपये लेते हैं, रविकिशन 35 से 40 लाख लेते हैं और टॉप पर चल रहे दिनेश लाल यादव (निरहुआ) 50 से 55 लाख लेते हैं, वहीं छोटे कलाकारों को कुछ पैसों से ही संतोष करना पड़ता है.

लेखकों की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है. इंडस्ट्री में अधिकतर डायरेक्टर ख़ुद ही कहानी का ताना-बाना बुनते हैं और किसी लेखक से पूरी कहानी लिखा लेते हैं. इसमें लेखक का अपना कुछ नहीं होता. उस पर रोल घटाने-बढ़ाने का भी दबाव रहता है. जो दिखता है, वही बिकता है की तर्ज़ पर एक बार शुरू होने के बाद फिल्म की कहानी किधर जाती है, बेचारे लेखक को भी पता नहीं होता. इस तरह के फिल्मी लेखकों को एक फिल्म के पांच सौ या एक हज़ार रुपये मिल जाते हैं, जबकि बजट में फिल्म लेखन के लिए लाखों का प्रावधान दिखाया जाता है. महत्वपूर्ण कड़ी होने के बावजूद फिल्म निर्माण के बाद लेखकों को क्रेडिट लाइन से बाहर ही रखा जाता है. फिल्म निर्देशकों के बीच एक धारणा यह है कि लेखक को हमेशा भूखा रखो, नहीं तो उसकी रचनात्मकता खत्म हो जाएगी. इंडस्ट्री में काम करने वाली अभिनेत्रियों के बारे में एक असिस्टेंट डायरेक्टर ने बताया कि दरअसल एलबम और फिल्म बनाने के नाम पर अधिकतर प्रोड्यूसर अपनी अय्याशी का सामान जुटाते हैं.

अधिकतर भोजपुरी फिल्मों की स्क्रिप्ट शूटिंग शुरू होने के बाद भी कई बार लिखी जाती रहती है. कई तरह के फेरबदल होते रहते हैं. स्टार हीरो सेट पर आने के बाद अंतिम समय में अपना सीन देखते हैं और पसंद न आने पर उसे अपने तरीक़े से बदलवाते हैं. असिस्टेंट डायरेक्टरों एवं डायरेक्टरों की भी हालत बदतर है. पैसे बचाने के लिए उनसे कई लो प्रोफाइल काम भी कराए जाते हैं. एक असिस्टेंट डायरेक्टर ने कहा कि एक्शन और कट बोलने के अलावा भी सेट पर मैं कई काम करता हूं, फिर भी कहा जाता है कि मुझे काम नहीं आता. लोग प्रोडक्शन के हर काम में कमीशन खाने की कोशिश करते हैं. इस संबंध में प्रोडक्शन लाइन से जुड़े लोगों का कहना है कि ऊपर से पैसा नहीं मिलता है तो नीचे से काट लेते हैं. शीतला प्रोडक्शन हाउस में काम कर रहे अवनीश हिंदी फिल्मों के साथ ही भोजपुरी फिल्मों में भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. वह कहते हैं कि यह तो जगज़ाहिर है कि इंडस्ट्री में नए कलाकारों का शोषण होता है, लेकिन विकल्प भी क्या है. कामयाबी चाहिए तो इन रास्तों पर चलना ही होगा, क्योंकि डूबने के डर से मांझी पतवार खेना बंद नहीं करता.

ऐसा नहीं है कि भोजपुरी में काम करने वाले हर कलाकार को पैसा नहीं मिलता. बड़े कलाकारों को पैसा मिलता है, साथ ही उनसे फिल्म निर्देशक, प्रोड्यूसर अच्छे से भी पेश आते हैं, वहीं दूसरी ओर सहायक कलाकारों के प्रति इस तरह का नज़रिया फिल्मी पर्दे के पीछे छिपे सच को उजागर करता है.

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