भारत एक तस्वीर

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भारत दुनिया का सबसे ब़डा लोकतंत्र है. यह ब़डे बदलावों, विभाजनों और अनगिनत पहचान के कारण दुनिया भर में मशहूर है. सच तो यह है कि भारत की आजादी और इसके विभाजन को लेकर लोग अलग-अलग राय रखते हैं. इंग्लैंड सहित पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुके लेखक और इतिहासकार पैट्रिक फैंरच ने भारत की आजादी और विभाजन पर लिबर्टी ऑर डेथ नाम से एक किताब लिखी है. यह किताब राजनेताओं से लेकर माफिया डॉन तक और जंजीरों में बंधे खदान मजदूरों से लेकर अपने बूते अरबपति बने उद्यमियों तक की कहानी कहती है. लेखक ने आजादी के बाद की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जो अब तक किसी और लेखक ने नहीं लिखी.

भारत विविधताओं से भरा देश है, जो पूरी दुनिया के लिए उत्सुकता का केंद्र है. इस देश के बारे में हर व्यक्ति की कोई न कोई राय जरूर है. भले ही उसने कभी भारत की यात्रा तक न की हो. वह या तो भारत से प्यार करता है या नफरत. दुनिया में भारत को रहस्यमय देश या प्राचीन पुरातनपंथी विश्‍वासों में यकीन करने वाला देश माना जाता है. या फिर त़डक-भ़डक वाला रोगियों का देश माना जाता है. दुनिया में भारत के खान-पान को या तो दुनिया का सबसे बेहतरीन खान-पान वाला या सबसे खराब खान-पान वाला देश माना जाता है. पूर्वी एशिया के देशों के लिए भारत एक प्रतिद्वंद्वी और उनकी कुछ आध्यात्मिक परंपराओं का देश है. अमेरिका के लिए भारत एक चुनौती तो है ही, साथ ही आर्थिक सहयोग की संभावनाओं वाला या फिर भविष्य का आर्थिक प्रतिद्वंद्वी भी है, क्योंकि दोनों ही देश आकार में विराट और विविधताओं से भरपूर हैं. युरोप के लोगों के लिए भारत एक धार्मिक देश है, जिसका एक विशेष, लेकिन अपरिभाषित पहचान है. अंग्रेजों के लिए भारत उनकी पुरानी प्रतिष्ठा की क़डी है. एक ऐसा मुल्क, जो उनके अतीत को दिलचस्प बनाता है. पाकिस्तान के लिए भारत एक खतरा है और आकर्षण का केंद्र भी है. भारत की सार्वजनिक बहस इन्हीं पुराने दृष्टीकोण में उलझी हुई है, लेकिन इस पुस्तक में लेखक ने बाहर और अंदरखाने दोनों ही पक्षों पर लिखा है. इसमें दिए गए विवरण को तीन अलग-अलग चश्मों में देखा गया है. पहला दृष्टिकोण राजनीतिक है, दूसरा आर्थिक और तीसरा सामाजिक. लोगों की व्यक्तिगत कहानियां, प्राकृतिक आपदाएं , लोगों की आकांक्षाएं और उनकी जीत की कहानियां इस पुस्तक के कथानक के केंद्र में है. किताब के तीनों हिस्सों में इस बात का जवाब देने की कोशिश की गई है कि भारत वैसा क्यों है, जैसा आज दिख रहा है?

पुस्तक के उप खंड में आजादी के बाद की कहानी है. इस पुस्तक में देश में लागू किए गए आर्थिक उदारीकरण को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझने की कोशिश की गई है. आजादी के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आखिर क्यों इतने जोर-शोर से दॄढ निश्‍चय के साथ खारिज किया गया? किसी आजाद हुए मुल्क को कौन सी घटना समृद्घ बनाती है? अचानक वह कौन सी बात थी, जो समाजवादी सांचे में ढले देश की जनता जोर-शोर से लालची तरीके से पूंजीवादी विचारों को अपनाने और आर्थिक रचनात्मकता की दिशा में कदम आगे ब़ढाने के लिए तैयार हो गई? इस प्रक्रिया में कौन सा तबका धन कुबेर बन गया, किसे फायदा हुआ और कौन सा वर्ग मुंह ताकता रह गया? इन सारे सवालों का जवाब इस किताब में लेखक ने दिया है.

तीसरे अध्याय में भारत की सामाजिक व्यवस्था के बारे में लिखा गया है. इसमें उन सामाजिक परंपराओं और चरित्र को जानने की कोशिश की गई है, जिससे इस देश का निर्माण हुआ.

भारत की एक ब़डी विकट समस्या यहां की असंतुलित सामाजिक व्यवस्था भी है. एक तरफ अत्यधिक धन का संचयन, दूसरी तरफ भयावह गरीबी, एक तरफ शिक्षित लोगों की विशाल संख्या, तो दूसरी तरफ निरक्षरों की भारी तादाद, इस देश में मौजूद प्रतिस्पर्धी विचारधाराएं, एकरूपता का अभाव, इसकी दयालुता और साथ ही कू्ररता के उदाहरण, धर्म के साथ जटिल संबंध, यहां मौजूद कटु वास्तविकताएं और साथ ही तीव्र सामाजिक बदलाव हिंदुस्तान को एक लघु ब्रह्मांड बनाकर पेश करता है और शायद भारत के भविष्य के लिए अपवाद हो सकता है.

इस पुस्तक का अनुवाद मधुबनी के रहने वाले सुशांत झा ने किया है. पेशे से पत्रकार सुशांत कई और पुस्तकों का अनुवाद कर चुके हैं. इस पुस्तक को पेंगुइन प्रकाशन ने प्रकाशित की है.

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