बदलेगी बुनकरों की तस्वीर

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कभी भागलपूर सिल्क की पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी खूब था, लेकिन सरकारी उपेक्षा और फिर भागलपूर दंगे ने यहां के बुनकारों को तबाह कर दिया। यहां के युवाओं के पहल से बुनकरों में उम्मीद की एक किरण जगी है। 

कभी भागलपुर सिल्क की धूम पूरी दुनिया में थी, लेकिन यहां हमेशा से समस्या रही मार्केट की। इन बुनकरों के बनाये प्रोडक्ट को बेचकर लोगों ने खुब मुनाफा कमाया। पर ये तंगहाली से ही जुझते रहे। ऐसे दिन भी आए जब भुखमरी के शिकार हो ये लोग अपना पुराना पेशा छोड़ने लगे और रोजी रोटी के जुगाड़ में मजदूरी करने के लिए यहां से पलायन करने को विवश हो गए। अधिकतर बुनकर अब दूसरे शहरों में जाकर मजदूरी करते हैं, सब्जी बेचते हैं या रिक्शा चलाते हैं। लालू हो या नीतीश किसी भी सरकार ने इन बुनकरों के बदहानी को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया।

आंकड़ों की माने तो पूरे बिहार में बुनकरों की संख्या करीब 4 लाख है। केवल भागलपुर में ही 50 हजार से अधिक बुनकर हैं। भागलपुर के नाथनगर, चंपानगर, हसनाबाद एवं नरगाह आदि इलाकों में सबसे ज्यादा बुनकर हैं, जिनकी आय का जरिया सदियों से केवल सिल्क उद्योग ही रहा है। वर्ष 1989 तक भागलपुर के बुनकर अकेले पूरे देश का 48 फीसदी सिल्क तैयार करते थे। भागलपुर में सरकारी रेशम कॉलेज भी था, जिसमें रेशम बनाने के गुर सीखने के लिए दूर-दूर से छात्र आते थे और उन्हें डिप्लोमा दिया जाता था, लेकिन 1989 के दंगे के बाद सब खत्म हो गया। उस दंगे में सबसे ज्यादा नुकसान भागलपुर जिले के बुनकरों का हुआ, जिनकी रोजी-रोटी सिल्क से ही चलती थी। दंगे के बाद से इस उद्योग में लगातार गिरावट आती गई। बाहर के देशों से आॅर्डर आने बंद हो गए। धीरे धीरे इनकी स्थिति बिगड़ती गई।

उनकी मदद के लिए आगे आए बिहार के वो युवा जो बिहार में बदलाव की चाह रखते हैं। उनके परेशानी को देखकर यहां के युवकों ने उनके लिए कुछ करने की सोची। हालांकि राहें आसान नहीं थी, पर उनके हौसले मतबूत थे। बांका, भागलपुर के उदयन सिंह कहते हैं कि मैंने बचपन से देखा। यहां के बुनकर इतनी मेहनत करते हैं। मार्केटिंग के अभाव में उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता। साहुकार उनका शोषण करते थे। कारीगरों से औने पौने दाम में सिल्क खरीद कर साहुकार मुनाफा कमाते हैं। इसीलिए मैंने बांका सिल्क नाम से अपनी कंपनी की स्थापना की। हैंडलूम को बढ़ावा देने के लिए मैंने कहाअपनी कंपनी स्टार्ट की है। यहां के बुनकरों की सबसे बड़ी समस्या है मार्केट की। मैंने यहां के बुनकरों से मैंने कहा कि वे अपने प्रोडक्ट मुझे देकर पैसे ले जा सकते हैं। दरअसल उन्हें रोजाना पैसे की जरूरत होती है। इसके अलावा, हैंडलूम उद्योग को असल में मार्केटिंग की जरूरत है। इसके लिए फिल्म जगत को आगे लाना जरूरी है। इसी के तहत मैंने निफ्ट, आईएम और मुंबई के कुछ डिजाइनर्स से भी बात की है। इसकेअलावा, हम मधूबनी पेंटिंग की डिजाइंस को सिल्क के प्रोडक्ट जैसे साड़ी और स्टोल पर डिजाइन करा रहे हैं। इसके लिए डिजाइनर्स काम में लगे हैं। साथ ही हम सरकारी स्तर पर भी सहयोग दिलाने की दिशा में अग्रसर हैं। इसके अलावा, एथनीक वीयर की जानी मानी इ कॉमर्स साइट इंडियन रूट्स पर भी अब हमारे प्रोडक्ट उपलब्ध है।

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