बदलते परिवेश में नारी

बदलते परिवेश में नारी

समाज सेविका और लेखिका जयति गोयल कहती हैं कि स्त्री कभी पुरुष नहीं हो सकती, ठीक उसी तरह पुरुष स्त्री नहीं हो सकता। नारी को पुरुष के समान बनाने की बात करना तो स्त्री के अस्तित्व को मिटाने जैसा ही है। नारी कोमल है, लेकिन कमजोर नहीं। समाज के निर्माण में स्त्री और पुरुष दोनों की अलग-अलग भूमिका है। जयति ने अपनी पुस्तक बदलते परिवेश में नारी में महिलाओं से संबंधित तमाम पहलूओं पर जिक्र किया है। 

महिला और पुरुष एक गाड़ी के दो पहिये हैं। दोनों समान हैं और दोनों को प्रकृति ने अपनी अपनी अलग पहचान दी है। आज जब हम स्त्री और पुरुष में समानता की बात करते हैं, तब हम भूल जाते हैं कि जो नियम प्रकृति ने बनाए हैं, उसके विपरित आखिर हम कैसे जा सकते हैं। स्त्री कभी पुरुष नहीं हो सकती, ठीक उसी तरह पुरुष स्त्री नहीं हो सकता। नारी को पुरुष के समान बनाने की बात करना तो स्त्री के अस्तित्व को मिटाने जैसा ही है। नारी कोमल है, लेकिन कमजोर नहीं। समाज के निर्माण में स्त्री और पुरुष दोनों की अलग-अलग भूमिका है।

जयति गोयल द्वारा लिखित आज के बदलते परिवेश में नारी भी एक ऐसी ही पुस्तक है, जिसमें बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में नारी की स्थिति और भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में वर्तमान की उन सभी समस्याओं पर चर्चा की गई है, जिसमें महिला वर्ग की वास्तविक प्रगति के मार्गदर्शी भाव हैं। हालांकि लेखिका अर्थशास्त्र के लेखन से जुड़ी है, लेकिन फिर भी उन्होंने काफी गहन शोध किया है और आज के परिवेश में नारी की स्थिति पर एक सार्थक पुस्तक लिखी है। उन्होंने महिला संरक्षण के विविध प्रावधानों की समीक्षा की है, इस क्षेत्र के अनेक अटकावों और भटकावों को इंगित करते हुए अपने मौलिक विचार रखे हैं। बदलते परिवेश में नारी सफलता के नए आयाम खोजती हुई न जाने किस दिशा में जाने के व्यर्थ प्रयास में तत्पर है। संस्कृति और सभ्यता की लकीर को लांघ कर न जाने किस प्रगति की ओर बह रही है। समाज और परिवार को जोड़ने में स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन आज की नारी अपने अधिकार और उनके लिए बने कानून का दुरुपयोग कर रही है। वह परिवार को जोड़ने का नहीं, बल्कि परिवार को तोड़ने का काम कर रही है। नतीजतन समाज धीरे-धीरे टूट कर बिखर रहा है। अपनी बात की पुष्टि के लिए जयति ने आधुनिक महिला समाज के समक्ष स्वतंत्रता संग्राम काल की तेजस्विनी महिलाओं का आदर्श चरित्र प्रस्तुत किया है। आज की महत्वाकांक्षी महिला संगठनों की कार्यप्रणाली के गुण दोष बताकर समाज के समक्ष आपने कुछ सुझाव प्रस्तुत किए हैं। यह युग सूचनाओं का युग है, उसे ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता के पश्चात हर क्षेत्र की प्रथम महिलाओं की सूची प्रकाशित की है। लेखिका ने स्पष्ट रूप से पाश्चात्य जीवन शैली को अपनाने और भारतीय संस्कृति के संस्कारों को भुलाने के दुष्परिणामों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है। लेखिका ने तार्किक ढंग से यह बताने का सफल प्रयास किया है कि गांव-देहात में रहने वाली महिलाओं के उत्थान के बिना महिला समाज का सर्वांगीण विकास हो ही नहीं सकता। सारे देश में हो रहे महिला उत्पीड़न के आंकड़े देकर यह सिद्ध किया है कि असुरक्षा का भय प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इन बिंदुओं और परिस्थितियों के मद्देनजर यह पुस्तक पठनीय है।

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