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नहीं रहे डायलॉग डॉन प्राण : आत्मविश्‍वास से भरपूर एक कलाकार

93 साल की उम्र में पिछले दिनों महान फिल्म अभिनेता प्राण की मृत्यु हो गई. आइए, जानते हैं प्राण के नीजी और फिल्मी सफर के बारे में…

प्राण के बारे में कहा जाता है कि वे जिस रोल को करते थे, उसमें बहुत गहराई से उतर जाते थे. विलेन के रूप में लोगों ने उनसे नफरत किया हो, लेकिन असल जिंदगी में वह बेहद नेकदिल इंसान थे. साल 1940 में यमला जट फिल्म में पहली बार प्राण बड़े पर्दे पर दिखाई दिए. प्राण खलनायक ही नहीं, एक सशक्त चरित्र अभिनेता भी रहे. – See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/08/%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%a1%e0%a5%89%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3.html#sthash.OhO6U8Uk.dpuf

 प्राण के बारे में कहा जाता है कि वे जिस रोल को करते थे, उसमें बहुत गहराई से उतर जाते थे. विलेन के रूप में लोगों ने उनसे नफरत किया हो, लेकिन असल जिंदगी में वह बेहद नेकदिल इंसान थे. साल 1940 में यमला जट फिल्म में पहली बार प्राण बड़े पर्दे पर दिखाई दिए. प्राण खलनायक ही नहीं, एक सशक्त चरित्र अभिनेता भी रहे.

वयोवृद्ध अभिनेता प्राण अब हमारे बीच नहीं रहे. 93 साल की उम्र में अंतिम सांस ली उन्होंने. इस उदीयमान सितारे ने नफरत भरे किरदारों से भी लोगों के दिल पर अंत तक राज किया. प्राण के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि पहले और आखिरी सुपर स्टार विलेन का निधन हो गया है. आज अगर प्राण होते और निधन किसी और का हुआ होता, तो वह गंभीर होकर कहते, तुमने ठीक ही सुना है बरखुरदार. और साथ ही यह डॉयलॉग जो़डते कि प्राणों के ही वसूल होते हैं जनाब. ऐसे किरदार मरते नहीं हैं लिलि, वह तो अमर हो जाते हैं, सदा सदा के लिए.
सच तो यह है कि उनमें आत्मविश्‍वास इतना था कि जेब में पैसे नहीं होने के बावजूद मुंबई के ताजमहल होटल में एक कमरा बुक करा लिया था, जबकि उन्होंने एक फोटोग्राफर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. तन्ख्वाह थी महज 200 रुपये. जी हां, उन्हें पूरी उम्मीद थी कि काम जरूर मिलेगा. यह उनका आत्मविश्‍वास ही था कि अंतत: काम मिला और खूब और खूब मिला. इतना काम मिला कि आज भी लोग उन्हें और उनकी अदाकारी को याद करते हैं. उनके हर एक किरदार को याद करते हैं, चाहे उपकार का मलंग चाचा हो, या राम और श्याम का गजेंद्र बाबू या फिर जिस देश में गंगा बहती है का राका.
प्राण के बारे में कहा जाता है कि वे जिस रोल को करते थे, उसमें बहुत गहराई से उतर जाते थे. विलेन के रूप में लोगों ने उनसे नफरत हो, लेकिन असल जिंदगी में वह बेहद नेकदिल इंसान थे. साल 1940 में यमला जट फिल्म में पहली बार प्राण बड़े पर्दे पर दिखाई दिए. प्राण खलनायक ही नहीं, एक सशक्त चरित्र अभिनेता भी रहे. 1968 में उपकार, 1970 में आंसू बन गए फूल और 1973 में बेईमान फिल्म के लिए प्राण को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजा गया. इसके बाद उन्हें सैकड़ों सम्मान और अवॉर्ड मिले. इस साल यानी 2013 में प्राण को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाजा गया था.
प्राण का जन्म एक सरकारी ठेकेदार लाला केवल कृष्ण सिकंद के घर 12 फरवरी, 1920 को दिल्ली में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर जैसे शहरों में हुई. साल 1945 में प्राण की शादी शुक्ला से हुई, जिनसे उन्हें दो बेटे अरविंद और सुनील व एक बेटी पिंकी हुईं. पचास और साठ के दशक का दौर, जो हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिमकाल माना जाता है, में यदि कोई कलाकार खलनायकी का पर्याय था, तो वे थे प्राण. पर्दे पर तमाम दिग्गज हीरोज से टक्कर लेने वाले प्राण ने एक के बाद एक इतनी हिट फिल्मों में खलनायकी की थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना ही बंद कर दिया था. एक खलनायक के रूप में प्राण पर्दे पर खौफ पैदा कर देते थे. प्राण के  करियर में ऐतिहासिक मोड़ आया वर्ष 1967 में, जब मनोज कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म उपकार में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक रोल ऑफर किया.
उपकार की कहानी थी देश के आम किसान भारत (मनोज कुमार) और उसके इर्द-गिर्द के पात्रों की. इन सबके बीच थे मलंग चाचा यानी प्राण, जो गांव की अंतरात्मा को आवाज देते थे. मलंग चाचा के रोल में प्राण ऐसे डूबे कि वह और मलंग चाचा एकाकार हो गए. उन पर फिल्माया गया गीत कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं बातों का क्या… इस फिल्म को दार्शनिक ऊंचाई देता है. कहते हैं कि जब कल्याणजी-आनंदजी को पता चला कि इंदिवर के जिस गीत को उन्होंने किसी खास अवसर के लिए सहेजकर रखा था, वह प्राण पर फिल्माया जाने वाला है, तो उन्होंने मनोज कुमार से शिकायत की कि प्राण तो पर्दे पर इस गीत का सत्यानाश कर देंगे! बाद में जब उन्होंने गीत का फिल्मांकन देखा, तो प्राण का लोहा मान लिया. उपकार के लिए प्राण को फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला, लेकिन जो सबसे बड़ा पुरस्कार उन्हें मिला, वह था दर्शकों की नजर में पूरी तरह बदली उनकी छवि का.
फिल्म पत्रकार बन्नी रूबेन ने प्राण की बॉयोग्राफी और प्राण में लिखा है, 11 अगस्त को बच्चे का पहला जन्म दिन था. पत्नी की जिद थी कि वे इस मौके पर साथ हों. फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त प्राण बमुश्किल लाहौर से निकले और इंदौर पहुंचे. उसी समय वहां सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे. प्राण फिर कभी लाहौर नहीं लौट पाए. वह बेघर थे. और उनके पास कुछ नहीं था. आठ महीने बाद वह इंदौर से किस्मत आजमाने मुंबई गए. कई महीनों के इंतजार और कोशिशों के बावजूद कहीं काम नहीं मिला. लाहौर से जितने पैसे ला पाए थे, खर्च हो गए. फाकाकशी की नौबत आई, तो उन्होंने नन्हे अरविंद को बेहतर परवरिश के लिए फिर इंदौर छोड़ा. प्राण ने कहा, मैं फिर कभी लौट नहीं सका, क्योंकि 15 अगस्त (1947) को मेरा घर विदेश बन चुका था. प्राण का पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था. उन्हें  सिगरेट पीना काफी पसंद था, सो उनके पास सिगरेट पाइप्स का बड़ा कलेक्शन था.
प्राण बड़े शर्मीले थे. शौकत हुसैन की फिल्म खानदान में वह नूरजहां के हीरो बनकर आए. यह फिल्म सुपरहिट हुई, मगर प्राण नायक के रोल में काम करते हुए बेहद संकोच करते थे. वह कहते थे कि पेड़ों के पीछे चक्कर लगाना अपने को जमता नहीं था. वह दोबारा हीरो नहीं बने. प्राण फोटोग्राफर बनना चाहते थे और इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली की ए दास कंपनी में काम शुरू कर दिया था. प्राण के पिता एक सरकारी सिविल कॉन्ट्रैक्टर थे, इसलिए उनकी पढ़ाई भारत के अलग-अलग हिस्सों में हुई. प्राण ने अपने पिता को नहीं बताया था कि वह शूटिंग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर था कि उनके पिता को उनका फिल्मों में काम करना पसंद नहीं आएगा. जब अखबार में उनका पहला इंटरव्यू छपा था, तो उन्होंने अखबार ही छुपा लिया, लेकिन फिर भी उनके पिता को इन सबकी जानकारी मिल गई. प्राण के इस करियर के बारे में जानकर उनके पिता को भी अच्छा लगा था, जैसा कि प्राण ने कभी नहीं सोचा था. उन्होंने शुरुआती फिल्मों में से एक में हीरो का किरदार भी निभाया था. फिल्म का नाम था खानदान, जो 1942 में आई थी.
– See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/08/%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%a1%e0%a5%89%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3.html#sthash.OhO6U8Uk.dpuf

वयोवृद्ध अभिनेता प्राण अब हमारे बीच नहीं रहे. 93 साल की उम्र में अंतिम सांस ली उन्होंने. इस उदीयमान सितारे ने नफरत भरे किरदारों से भी लोगों के दिल पर अंत तक राज किया. प्राण के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि पहले और आखिरी सुपर स्टार विलेन का निधन हो गया है. आज अगर प्राण होते और निधन किसी और का हुआ होता, तो वह गंभीर होकर कहते, तुमने ठीक ही सुना है बरखुरदार. और साथ ही यह डॉयलॉग जो़डते कि प्राणों के ही वसूल होते हैं जनाब. ऐसे किरदार मरते नहीं हैं लिलि, वह तो अमर हो जाते हैं, सदा सदा के लिए.

सच तो यह है कि उनमें आत्मविश्‍वास इतना था कि जेब में पैसे नहीं होने के बावजूद मुंबई के ताजमहल होटल में एक कमरा बुक करा लिया था, जबकि उन्होंने एक फोटोग्राफर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. तन्ख्वाह थी महज 200 रुपये. जी हां, उन्हें पूरी उम्मीद थी कि काम जरूर मिलेगा. यह उनका आत्मविश्‍वास ही था कि अंतत: काम मिला और खूब और खूब मिला. इतना काम मिला कि आज भी लोग उन्हें और उनकी अदाकारी को याद करते हैं. उनके हर एक किरदार को याद करते हैं, चाहे उपकार का मलंग चाचा हो, या राम और श्याम का गजेंद्र बाबू या फिर जिस देश में गंगा बहती है का राका.

प्राण के बारे में कहा जाता है कि वे जिस रोल को करते थे, उसमें बहुत गहराई से उतर जाते थे. विलेन के रूप में लोगों ने उनसे नफरत हो, लेकिन असल जिंदगी में वह बेहद नेकदिल इंसान थे. साल 1940 में यमला जट फिल्म में पहली बार प्राण बड़े पर्दे पर दिखाई दिए. प्राण खलनायक ही नहीं, एक सशक्त चरित्र अभिनेता भी रहे. 1968 में उपकार, 1970 में आंसू बन गए फूल और 1973 में बेईमान फिल्म के लिए प्राण को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजा गया. इसके बाद उन्हें सैकड़ों सम्मान और अवॉर्ड मिले. इस साल यानी 2013 में प्राण को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाजा गया था.

प्राण का जन्म एक सरकारी ठेकेदार लाला केवल कृष्ण सिकंद के घर 12 फरवरी, 1920 को दिल्ली में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर जैसे शहरों में हुई. साल 1945 में प्राण की शादी शुक्ला से हुई, जिनसे उन्हें दो बेटे अरविंद और सुनील व एक बेटी पिंकी हुईं. पचास और साठ के दशक का दौर, जो हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिमकाल माना जाता है, में यदि कोई कलाकार खलनायकी का पर्याय था, तो वे थे प्राण. पर्दे पर तमाम दिग्गज हीरोज से टक्कर लेने वाले प्राण ने एक के बाद एक इतनी हिट फिल्मों में खलनायकी की थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना ही बंद कर दिया था. एक खलनायक के रूप में प्राण पर्दे पर खौफ पैदा कर देते थे. प्राण के  करियर में ऐतिहासिक मोड़ आया वर्ष 1967 में, जब मनोज कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म उपकार में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक रोल ऑफर किया.

उपकार की कहानी थी देश के आम किसान भारत (मनोज कुमार) और उसके इर्द-गिर्द के पात्रों की. इन सबके बीच थे मलंग चाचा यानी प्राण, जो गांव की अंतरात्मा को आवाज देते थे. मलंग चाचा के रोल में प्राण ऐसे डूबे कि वह और मलंग चाचा एकाकार हो गए. उन पर फिल्माया गया गीत कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं बातों का क्या… इस फिल्म को दार्शनिक ऊंचाई देता है. कहते हैं कि जब कल्याणजी-आनंदजी को पता चला कि इंदिवर के जिस गीत को उन्होंने किसी खास अवसर के लिए सहेजकर रखा था, वह प्राण पर फिल्माया जाने वाला है, तो उन्होंने मनोज कुमार से शिकायत की कि प्राण तो पर्दे पर इस गीत का सत्यानाश कर देंगे! बाद में जब उन्होंने गीत का फिल्मांकन देखा, तो प्राण का लोहा मान लिया. उपकार के लिए प्राण को फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला, लेकिन जो सबसे बड़ा पुरस्कार उन्हें मिला, वह था दर्शकों की नजर में पूरी तरह बदली उनकी छवि का.

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फिल्म पत्रकार बन्नी रूबेन ने प्राण की बॉयोग्राफी और प्राण में लिखा है, 11 अगस्त को बच्चे का पहला जन्म दिन था. पत्नी की जिद थी कि वे इस मौके पर साथ हों. फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त प्राण बमुश्किल लाहौर से निकले और इंदौर पहुंचे. उसी समय वहां सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे. प्राण फिर कभी लाहौर नहीं लौट पाए. वह बेघर थे. और उनके पास कुछ नहीं था. आठ महीने बाद वह इंदौर से किस्मत आजमाने मुंबई गए. कई महीनों के इंतजार और कोशिशों के बावजूद कहीं काम नहीं मिला. लाहौर से जितने पैसे ला पाए थे, खर्च हो गए. फाकाकशी की नौबत आई, तो उन्होंने नन्हे अरविंद को बेहतर परवरिश के लिए फिर इंदौर छोड़ा. प्राण ने कहा, मैं फिर कभी लौट नहीं सका, क्योंकि 15 अगस्त (1947) को मेरा घर विदेश बन चुका था. प्राण का पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था. उन्हें  सिगरेट पीना काफी पसंद था, सो उनके पास सिगरेट पाइप्स का बड़ा कलेक्शन था.

प्राण बड़े शर्मीले थे. शौकत हुसैन की फिल्म खानदान में वह नूरजहां के हीरो बनकर आए. यह फिल्म सुपरहिट हुई, मगर प्राण नायक के रोल में काम करते हुए बेहद संकोच करते थे. वह कहते थे कि पेड़ों के पीछे चक्कर लगाना अपने को जमता नहीं था. वह दोबारा हीरो नहीं बने. प्राण फोटोग्राफर बनना चाहते थे और इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली की ए दास कंपनी में काम शुरू कर दिया था. प्राण के पिता एक सरकारी सिविल कॉन्ट्रैक्टर थे, इसलिए उनकी पढ़ाई भारत के अलग-अलग हिस्सों में हुई. प्राण ने अपने पिता को नहीं बताया था कि वह शूटिंग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर था कि उनके पिता को उनका फिल्मों में काम करना पसंद नहीं आएगा. जब अखबार में उनका पहला इंटरव्यू छपा था, तो उन्होंने अखबार ही छुपा लिया, लेकिन फिर भी उनके पिता को इन सबकी जानकारी मिल गई. प्राण के इस करियर के बारे में जानकर उनके पिता को भी अच्छा लगा था, जैसा कि प्राण ने कभी नहीं सोचा था. उन्होंने शुरुआती फिल्मों में से एक में हीरो का किरदार भी निभाया था. फिल्म का नाम था खानदान, जो 1942 में आई थी.

वयोवृद्ध अभिनेता प्राण अब हमारे बीच नहीं रहे. 93 साल की उम्र में अंतिम सांस ली उन्होंने. इस उदीयमान सितारे ने नफरत भरे किरदारों से भी लोगों के दिल पर अंत तक राज किया. प्राण के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि पहले और आखिरी सुपर स्टार विलेन का निधन हो गया है. आज अगर प्राण होते और निधन किसी और का हुआ होता, तो वह गंभीर होकर कहते, तुमने ठीक ही सुना है बरखुरदार. और साथ ही यह डॉयलॉग जो़डते कि प्राणों के ही वसूल होते हैं जनाब. ऐसे किरदार मरते नहीं हैं लिलि, वह तो अमर हो जाते हैं, सदा सदा के लिए.
सच तो यह है कि उनमें आत्मविश्‍वास इतना था कि जेब में पैसे नहीं होने के बावजूद मुंबई के ताजमहल होटल में एक कमरा बुक करा लिया था, जबकि उन्होंने एक फोटोग्राफर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. तन्ख्वाह थी महज 200 रुपये. जी हां, उन्हें पूरी उम्मीद थी कि काम जरूर मिलेगा. यह उनका आत्मविश्‍वास ही था कि अंतत: काम मिला और खूब और खूब मिला. इतना काम मिला कि आज भी लोग उन्हें और उनकी अदाकारी को याद करते हैं. उनके हर एक किरदार को याद करते हैं, चाहे उपकार का मलंग चाचा हो, या राम और श्याम का गजेंद्र बाबू या फिर जिस देश में गंगा बहती है का राका.
प्राण के बारे में कहा जाता है कि वे जिस रोल को करते थे, उसमें बहुत गहराई से उतर जाते थे. विलेन के रूप में लोगों ने उनसे नफरत हो, लेकिन असल जिंदगी में वह बेहद नेकदिल इंसान थे. साल 1940 में यमला जट फिल्म में पहली बार प्राण बड़े पर्दे पर दिखाई दिए. प्राण खलनायक ही नहीं, एक सशक्त चरित्र अभिनेता भी रहे. 1968 में उपकार, 1970 में आंसू बन गए फूल और 1973 में बेईमान फिल्म के लिए प्राण को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजा गया. इसके बाद उन्हें सैकड़ों सम्मान और अवॉर्ड मिले. इस साल यानी 2013 में प्राण को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाजा गया था.
प्राण का जन्म एक सरकारी ठेकेदार लाला केवल कृष्ण सिकंद के घर 12 फरवरी, 1920 को दिल्ली में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर जैसे शहरों में हुई. साल 1945 में प्राण की शादी शुक्ला से हुई, जिनसे उन्हें दो बेटे अरविंद और सुनील व एक बेटी पिंकी हुईं. पचास और साठ के दशक का दौर, जो हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिमकाल माना जाता है, में यदि कोई कलाकार खलनायकी का पर्याय था, तो वे थे प्राण. पर्दे पर तमाम दिग्गज हीरोज से टक्कर लेने वाले प्राण ने एक के बाद एक इतनी हिट फिल्मों में खलनायकी की थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना ही बंद कर दिया था. एक खलनायक के रूप में प्राण पर्दे पर खौफ पैदा कर देते थे. प्राण के  करियर में ऐतिहासिक मोड़ आया वर्ष 1967 में, जब मनोज कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म उपकार में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक रोल ऑफर किया.
उपकार की कहानी थी देश के आम किसान भारत (मनोज कुमार) और उसके इर्द-गिर्द के पात्रों की. इन सबके बीच थे मलंग चाचा यानी प्राण, जो गांव की अंतरात्मा को आवाज देते थे. मलंग चाचा के रोल में प्राण ऐसे डूबे कि वह और मलंग चाचा एकाकार हो गए. उन पर फिल्माया गया गीत कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं बातों का क्या… इस फिल्म को दार्शनिक ऊंचाई देता है. कहते हैं कि जब कल्याणजी-आनंदजी को पता चला कि इंदिवर के जिस गीत को उन्होंने किसी खास अवसर के लिए सहेजकर रखा था, वह प्राण पर फिल्माया जाने वाला है, तो उन्होंने मनोज कुमार से शिकायत की कि प्राण तो पर्दे पर इस गीत का सत्यानाश कर देंगे! बाद में जब उन्होंने गीत का फिल्मांकन देखा, तो प्राण का लोहा मान लिया. उपकार के लिए प्राण को फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला, लेकिन जो सबसे बड़ा पुरस्कार उन्हें मिला, वह था दर्शकों की नजर में पूरी तरह बदली उनकी छवि का.
फिल्म पत्रकार बन्नी रूबेन ने प्राण की बॉयोग्राफी और प्राण में लिखा है, 11 अगस्त को बच्चे का पहला जन्म दिन था. पत्नी की जिद थी कि वे इस मौके पर साथ हों. फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त प्राण बमुश्किल लाहौर से निकले और इंदौर पहुंचे. उसी समय वहां सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे. प्राण फिर कभी लाहौर नहीं लौट पाए. वह बेघर थे. और उनके पास कुछ नहीं था. आठ महीने बाद वह इंदौर से किस्मत आजमाने मुंबई गए. कई महीनों के इंतजार और कोशिशों के बावजूद कहीं काम नहीं मिला. लाहौर से जितने पैसे ला पाए थे, खर्च हो गए. फाकाकशी की नौबत आई, तो उन्होंने नन्हे अरविंद को बेहतर परवरिश के लिए फिर इंदौर छोड़ा. प्राण ने कहा, मैं फिर कभी लौट नहीं सका, क्योंकि 15 अगस्त (1947) को मेरा घर विदेश बन चुका था. प्राण का पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था. उन्हें  सिगरेट पीना काफी पसंद था, सो उनके पास सिगरेट पाइप्स का बड़ा कलेक्शन था.
प्राण बड़े शर्मीले थे. शौकत हुसैन की फिल्म खानदान में वह नूरजहां के हीरो बनकर आए. यह फिल्म सुपरहिट हुई, मगर प्राण नायक के रोल में काम करते हुए बेहद संकोच करते थे. वह कहते थे कि पेड़ों के पीछे चक्कर लगाना अपने को जमता नहीं था. वह दोबारा हीरो नहीं बने. प्राण फोटोग्राफर बनना चाहते थे और इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली की ए दास कंपनी में काम शुरू कर दिया था. प्राण के पिता एक सरकारी सिविल कॉन्ट्रैक्टर थे, इसलिए उनकी पढ़ाई भारत के अलग-अलग हिस्सों में हुई. प्राण ने अपने पिता को नहीं बताया था कि वह शूटिंग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर था कि उनके पिता को उनका फिल्मों में काम करना पसंद नहीं आएगा. जब अखबार में उनका पहला इंटरव्यू छपा था, तो उन्होंने अखबार ही छुपा लिया, लेकिन फिर भी उनके पिता को इन सबकी जानकारी मिल गई. प्राण के इस करियर के बारे में जानकर उनके पिता को भी अच्छा लगा था, जैसा कि प्राण ने कभी नहीं सोचा था. उन्होंने शुरुआती फिल्मों में से एक में हीरो का किरदार भी निभाया था. फिल्म का नाम था खानदान, जो 1942 में आई थी.
– See more at: http://www.chauthiduniya.com/2013/08/%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%a1%e0%a5%89%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3.html#sthash.OhO6U8Uk.dpuf

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