झारखंड पुन: अस्थिरता की राह पर

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बुधवार को ठंड से लोगों को तो राहत मिली लेकिन राजनीतिक दलों की कपकपी कम नहीं हुई .सिबू सोरेन दिन के दो बजे तक तो बाबूलाल मरांडी दिन के तीन बजे तक धूप में बैठकर धूप खाते रहे .कम ठण्ड में झारखंड के राजनीतिक गलियारों में बहनेवाली बर्फीली हवाओं की ठंडी तासीर देखने लायक थी। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा गठबंधन से समर्थन वापसी की
घोषणा की और मंगलवार को समर्थन वापसी का पत्र राज्यपाल को सौंप दिया।
झामुमो के समर्थन वापसी के तत्काल बाद मंगलवार को अर्जुन मुंडा ने अपने
पद से इस्तीफा दे दिया। इसके पहले समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए हेमंत
सोरेन ने बयान दिया कि सरकार से समन्वय का अभाव एवं सरकार से उपेक्षित
महसूस करने के कारण झामुमों ने समर्थन वापस लिया है। सोमवार को झामुमो
कार्यसमिति की बैठक थी। बैठक के वक्त ही मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा गुरु
जी और हेमंत सोरेन से अलग-अलग मिले। इस मुलाकात में हेमंत सोरेन ने तीन
शर्त रखीं। पहली, सरकार में नेतृत्व परिवर्तन किया जाए। दूसरी, 28-28
महीने के मुद्दे पर झामुमो और केन्द्रिय नेतृत्व एक प्लेटफार्म पर आए और
तीसरा, झामुमो पार्टी अध्यक्ष पर संतालपरगना के सांसद निशिकांत दुबे ने
जो बयानबाजी की उसका लिखित माफीनामा।
लेकिन जाहिर हो गया कि सरकार के अल्पमत में आने का मुख्य कारण पहली शर्त
ही है। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का इस्तीफा भी इसीका परिणाम है। इस
मुद्दे पर भाजपा राजी हो जाती तो बाकी दो मुद्दे बेमानी हो जाते। हेमंत
सोरेन की निगाह अपने पिता गुरुजी के रहते झारखंड की कुर्सी हासिल करने की
है। वे संभवत: इसी कुर्सी की ताकत से अपनी पार्टी (झामुमो) में मुखर होते
विरोध के स्वर को दबाने के प्रयास में थे। यह कुर्सी ही सरकार के साथ
समन्वय के अभाव को दूर कर सकती थी। इसके लिए पिछले एक माह से भाजपा के
साथ झामुमो बारगेनिंग का खेल खेल रहा था। बात नहीं बनी तो हेमंत सोरेन ने
सरकार के साथ पूरे प्रदेश को राजनीतिक अस्थिरता के गर्त में धकेल दिया।
इससे झारखंड की सत्ता येन-केन-प्रकारेण पाने को आतुर कांग्रेस की बांछे
खिल गई हैं। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि झारखंड की सत्ता में
साझेदारी अगले आम चुनाव के लिए फायदेमंद होगी। छुपे तौर पर कांग्रेस के
प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचु ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पर कमेंट के लहजे
में जो कुछ कहा, उससे भी यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस की मंशा क्या है?
बालमुचु ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से कहा — ‘अब तक आपलोग मलाई खा रहे थे,
अब दूसरों को खाने दीजिए।’ जाहिर है कि झारखंड में पर्दे के पीछे
सत्ता-राजनीति की जोड़-तोड़ का पुराना खेल शुरू हो गया है। अलग राज्य के
रूप में झारखंड के 12 साल के इतिहास में अब तक 8 बार मुख्यमंत्री
बनने-बनाने का खेल हो चुका है। शह-मात के नौवें खेल का परिणाम अगले
दो-तीन दिन में स्पष्ट होगा। या तो यहां तीसरी बार राष्टÑपति शासन लागू
होगा। या फिर हेमंत सोरेन की रणनीति का समर्थन करते हुए कांग्रेस सत्ता
में साझेदारी के सुख के लिए तैयार होगी। दोनों ही विकल्प पर निर्णय करने
का अधिकार फिलहाल कांगे्रस के आलाकमान के हाथ में पहुंच गया है। लेकिन
दिलचस्प अनुमान यह है कि किसी भी विकल्प में झारखंडी सत्ता-राजनीति की
गेन्द कांग्रेस के पांवों की ठोकर में रहेगी। फिलहाल हेमंत सोरेन गेन्द
पर अपने कब्जे के लिए दिल्ली रवाना हो चुके हैं — कांग्रेस की बैसाखी के
लिए। वह अपनी रणनीति में सफल हों या विफल यह तय है कि झारखंड की जनता, जो
पिछले 12 साल से अस्थिरता के अभिशाप से ग्रस्त है, आगे भी जल्द उससे
मुक्त होने का सपना संजो नहीं सकती। इधर रांची में सत्ता को अस्थिर करने
का खेल शुरू ही हुआ कि उधर पलामू में नक्सली हमले से 17 फौजी जवानों के
शहीद होने की खबर आ रही है।
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