जीवन के स़फर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को…

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अपने जमाने में सिनेमा प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाली नलिनी जयवंत गुमनामी के अंधेरे में खो गईं. अस़फल प्रेम और रिश्तों में मिली नाक़ामयाबी के बाद नलिनी ने अकेलेपन को ही चुना. उन्हीं की फिल्म ममुनीम जीफ का गाना, जीवन के स़फर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को. और दे जाते हैं यादें, तन्हाई में तड़पाने को उनकी असल कहानी बयां करता है. अपने जमाने में लोगों के दिलों पर राज करने वाले न जाने कितने सितारे करियर के एक म़ुकाम पर पहुंचकर फिर गुमनामी के अंधेरे में खो गए. चाहें वो अभिनेता मर्लिन ब्रांडो, राबर्ट डी नीरो, विख्यात अभिनेत्री ग्रेटा गाबरे हों या अपने जमाने के सर्वश्रेष्ट अभिनेत्रियों में शुमार साधना, नंदा, सुचित्रा सेन हों. अपने जमाने में लोगों के दिलों पर राज करने वाली बला की खूबसूरत अभिनेत्री और गायिका नलिनी जयवंत ने भी उन्हीं की राह चुनी. नलिनी जयवंत अपने जमाने की स़फलतम अभिनेत्री शोभना समर्थ के मामा की बेटी थी. फिल्मों में नलिनी का आना एक संयोग था. कहते हैं कि कुछ लोगों की किस्मत खुद उन तक चलकर आती है. नलिनी जयवंत भी उन्हीं खुशकिस्मत लोगों में से थी. हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर के निर्माता-निदेशकों में से एक चमनलाल देसाई और उनके बेटे वीरेंद्र देसाई थे. वे दोनों एक दिन फिल्म देखने सिनेमा हॉल गए. शो के दौरान उनकी नज़र नलिनी पर पड़ी. उस समय नलिनी की उम्र 13-14 बरस थी. देसाई बाप-बेटे को नलिनी में उनकी आने वाली फिल्म की हिरोइन नज़र आई, लेकिन उस समय उनकी मुलाकात नलिनी से नहीं हो पाई.

एक दिन विरेंद्र देसाई अभिनेत्री शोभना समर्थ से मिलने उनके घर पहुंचे. वहां उन्होंने नलिनी को देखकर उनकी खुशी का ठिकाना न था, उन्होंने उसी वक्त नलिनी के सामने अपनी फिल्म में बतौर अभिनेत्री काम करने का प्रस्ताव रख दिया. अपनी स्टार बहन शोभना समर्थ से प्रभावित नलिनी को खुशी का ठिकाना न था. डर था तो पिता से जो फिल्मों के  सख्त विरोधी थे. देसाई ने उन्हें बहुत सारे पैसे और नलिनी के सुनहरे भविष्य का हवाला देकर मना लिया. उस समय नलिनी का परिवार तंगहाली में जी रहा था. वीरेंद्र देसाई के निर्देशन में नलिनी की पहली फिल्म राधिका 1941 में रिलीज़ हुई. इस फिल्म के अन्य कलाकार थे हरीश, ज्योति, कन्हैयालाल, भुड़ो आडवानी. इस फिल्म के 10 में से 7 गीतों में नलिनी जयवंत की आवाज़ थी. इस फिल्म के बाद नलिनी को सितारा घोषित कर दिया गया.  नलिनी ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. उनकी अगली फिल्म महबूब ख़ान के निर्देशन में बनी. नलिनी के साथ इस फिल्म में थे, शेख मुख्तार और बेबी मीना कुमारी. इस फिल्म में नलिनी ने 4 गीत गाए थे. इनमें से वजाहत मिर्जा के लिखे गीत, मनहीं खाते हैं भैया मेरे पान, का़फी लोकप्रिय हुआ. उसी साल वीरेंद्र देसाई के निर्देशन में फिल्म निर्दोष भी आई, इसमें मुकेश नायक की भूमिका में थे.
उनकी अगली फिल्म आंख मिचौली उनके लिए मिल का पत्थर साबित हुई. उस समय नलिनी स्कूल की छात्रा थीं. निर्देशक विरेंद्र देसाई उनकी खूबसूरती के ऐसे कायल हुए कि उन्होंने न स़िर्फ पहली ही नज़र में अपनी फिल्म की हिरोइन चुन लिया बल्कि अपना दिल भी हार बैठे. साथ काम करते दोनों में प्यार हो गया और दोनों ने शादी भी कर ली. नलिउस दौर के एक लेखक ने कहा था: जब ये हंसती हैं तो मालूम होता है कि जंगल की ताजग़ी में जान पड़ गई और नौ-शगुफ्ता कलियां फुल बनकर रुखसारों की सूरत में तब्दील हो गई हैं. नलिनी की  शादी ज़्यादा दिन तक नहीं चली. जल्द ही उनका तलाक हो गया. उन्होंने दुबारा घर अपने सह कलाकार प्रभू दयाल के साथ घर बसाया. बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच वर्ष 1950 में वह अशोक कुमार के साथ फिल्म समाधि और संग्राम में आई. यह फिल्म एकबार फिर नलिनी को बुलंदियों पर ले गई. इसके पहले वर्ष 1948 रीलीज दिलीप कुमार और नरगिस के साथ उनकी फिल्म आई. इस फिल्म में उन दोनों के मुक़ाबले नलिनी की का़फी सराहना हुई. दो फिल्मों के बाद उन्हें स्टार कलाकारों  में गिना जाने लगा. नलिनी और अशोक कुमार को पर्दे पर दर्शकों ने का़फी पसंद किया. दोनों का नाम साथ जोड़ा जाने लगा. अशोक कुमार ने चैबूर के यूनियन पार्क इलाक़े में नलिनी जयवंत के घर के सामने बंगला भी ले लिया, जहां वे आ़खिरी दिनों में रहे. इस जोड़ी ने काफिला, नौबहार, सलोनी, मिस्टर एक्स और शेरू में साथ साथ काम किया. फिल्म अनोखा प्यार के बाद नलिनी जयवंत को सबसे बड़ी अदाकारा का दर्जा दिया जाने लगा. अनोखा प्यार के अलावा शिकस्त (1953) और देव आनंद के साथ राही (52), मुनीम जी (55) और काला पानी (58) जैसी कामयाब फिल्में कीं. फिल्म काला पानी में किशोरी बाई की भूमिका के लिए नलिनी जयवंत को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला. इस फिल्म में उस जमाने की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री मधुबाला के होते हुए उनके सौंदर्य और अभिनय की सराहना हुई. अपनी बेहतरीन फिल्म काला पानी के बाद से नलिनी ने फिल्मों में काम करना लगभग बंद कर दिया था. बाद में उनकी दो फिल्में और आई बॉम्बे रेसकोर्स (1965) और नास्तिक (1983). नास्तिक में उन्होंने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका निभाई थी. नलिनी जयवंत पर  कई यादगार गाने फिल्माए गए. उनमें से कुछ हैं, ठंडी हवाएं, लहरा के आएं (नौजवान 51), कारे बदरा तू न जा, न जा (शिकस्त 53), आ कि अब आता नहीं दिल को करार/राह तकते थक गया है इंतज़ार (महबूबा 54), तेरे फुलों से भी प्यार, तेरे कांटों से भी प्यार (नास्तिक 54), नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर, गोरे गोरे ओ बाके छोरे, घायल हिरनिया मैं बन-बन डोलूं  (मुनीमजी 55), हाए जिया रोए (मिलन-58), जीवन के स़फर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को. और दे जाते हैं यादें, तन्हाई में तड़पाने को (फिल्म मुनीम जी). अशोक कुमार के प्रति उन्हें आत्मिक अनुराग था. दोनों के संबंध अरसे तक बने रहे, लेकिन न जाने ऐसा क्या हुआ कि उनके प्रेम में उनके घर के सामने घर बसाने वाले अशोक कुमार से भी उन्होंने मिलना छोड़ दिया और खुद को अपने ही घर में क़ैद कर लिया. गुमनामी की जिंदगी जी रही नलिनी की की मौत की खबर 21 दिसंबर 2010 को आई. तीन दिन पहले नलिनी का देहांत हो चुका था, इस बात की खबर उनकी पडोसियों की भी नहीं हुई. पड़ोसियों ने उनके घर से एक चौकीदार को शव गाड़ी में ले जाते देखा. बाद में संदीप जयवंत नाम के एक व्यक्ति का बयान आया कि वह नलिनी जयवंत का भतीजा है और उसने उनकी इच्छा के अनुसार चुपचाप उनका दाह-संस्कार कर दिया है. हर इंसान की इच्छा होती है कि वह उसकी मौत उसके अपनों के बीच हो. नलिनी के प्रसंशकों और चाहने वालों का ब़डा दायरा था, लेकिन उनकी मौत पर आंसू बहाने वाले उनके दो पालतू कुत्ते थे, जो उनकी मौत के बाद बेघर हो गए. मुनीमम जी फिल्म का गाना, जीवन के स़फर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को/और दे जाते हैं यादें, तन्हाई में तड़पाने को यही उनकी असल कहानी भी थी.
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