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जाति बनाम धर्म की राजनीति

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बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में मायावती -मुलायम के साथ आने की लालू प्रसाद के सुझाव को मायावती ने सिरे से खारिज कर दिया है .माया द्वारा इस गठजोड़ के प्रस्ताव को खारिज करने का पहला कारण तो ये है कि बिहार में नीतीश और लालू यादव को लोक सभा के चुनाव में मिले वोटों के प्रतिशत ( ४९ फीसद ) एनडीए को मिले वोटों के प्रतिशत ( ४६ फीसद ) से ज्यादा है .लेकिन उत्तर प्रदेश में बीजेपी को अकेले मिले वोटों का प्रतिशत ( ४२ फीसद ) मायावती-मुलायम दोनों को मिले वोटो के प्रतिशत (४१.४ फीसद ) से ज्यादा है .अगर माया-मुलायम के साथ अपना दल को मिले एक फीसद वोट जुड़ भी जाते हैं तो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है . जाहिर दोनों के साथ आ जाने से भी बात बनती नहीं दिख रही है .
लेकिन मायावती मुलायम सिंह के साथ नहीं जाने का जो कारण बता रही है वह किसी के गले नहीं उतरने वाला .माया के अनुसार मुलायम सिंह का सांप्रदायिक ताकतों के साथ गठजोड़ है .इसमे कोई शक की गुंजाइश नहीं कि अडवाणी को लेकर मुलायम सिंह नरम रुख दिखलाते रहे हैं लेकिन मायावती तो इस मामले में मुलायम से कई कदम आगे हैं .नीतीश कुमार की तरह मायावती तीन बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बन चुकी हैं और उसके साथ गठबंधन की सरकार भी चला चुकी हैं . इतना ही नहीं, भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार चलाने के दौरान मायावती विश्व हिंदू परिषद के त्रिशूल दीक्षा समारोह में भी शामिल हो चुकी है .सच तो यहीं है कि बीजेपी को अछूत होने के अभिशाप से मायावती ने ही छुटकारा दिलाया था .जबतक मायावती ने बीजेपी का साथ नहीं लिया था दुसरे राजनीतिक दल बीजेपी के साथ जाने से कतराते थे .
बिहार में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ सरकार तो चलाई लेकिन मायावती की तरह बीजेपी की शर्तों पर नहीं बल्कि अपनी शर्तों पर .नीतीश कुमार मायावती की तरह मोदी का प्रचार करने कभी गुजरात नहीं गए.नीतीश कुमार ने मायावती की तरह धार्मिक उन्माद पर खुलेआम प्रयक्ष या परोक्ष रूप से ठप्पा कभी नहीं लगने दिया .सामाजिक न्याय की राजनीति का मतलब जातीय राजनीति है .लेकिन सामाजिक न्याय की सरकार के नारे के साथ जातीय सत्ता की प्रतिस्पर्द्धा को जन्म देने के दोषी नीतीश ,लालू माया की तरह दोषी जरुर हैं . इस जातीय सत्ता की होड़ में मंडलवादियों ने शामिल होकर धर्म के स्तंभों को और मजबूत किया। बीजेपी अपनी जीत का कारण भले जातीय बंधन का टूट जाना बता रही हो लेकिन सच्चाई ये है कि जातियों के कारण जो मजबूती हिंदुत्व को मिली उसी की वजह से आज बीजेपी सत्ता में है .
भारतीय जाति-व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसे धर्म और ईश्वर से जोड़ दिया गया। यही कारण था कि इसे ईश्वरीय देन मान लिया गया। गांधीजी जैसे व्यक्ति भी इसी अवधारणा में विश्वास करते थे। जाति के मजबूत होने से हिंदुत्व स्वत: मजबूत होता चला गया है। नब्बे के दशक में कांशीराम और लालू यादव ने एक से एक खतरनाक नारे दिए थे .कांशी राम का नारा था – ‘अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो’। इसी नारे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) खड़ी हुई। परिणामस्वरूप डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन की अवधारणा को मायावती ने शुद्ध जातिवादी अवधारणा में बदल दिया। लालू प्रसाद का नारा था -” भूरा बाल साफ़ करो “.मायावती ने गौतम बुद्ध द्वारा दी गई ‘बहुजन हिताय’ की अवधारणा को चकनाचूर करके ‘सर्वजन हिताय’ का नारा दिया वहीँ आज सबको साथ लेकर चलने का दवा करनेवाले लालू प्रसाद ने ” माय ” ( मुस्लिम -यादव ) समीकरण का नारा देकर जाति और संप्रदाय दोनों के दंभी गौरव को प्रतिष्ठित किया . बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों के दौरान बसपा के मंचों पर हवन कुंड खोदे जाने लगे और वैदिक मंत्रों के बीच ब्राह्मणत्व का प्रतीक परशुराम का फरसा (वह भी चांदी का) मायावती को भेंट किया जाने लगा। इस दौरान दलित बड़े गर्व के साथ नारा लगाते थे- ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं’।
सबसे ख़ास बात ये है कि सामाजिक न्याय और मंडल की राजनीति करनेवाले नेता राजनीति में धर्म के इस्तेमाल को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध तो मानते हैं लेकिन धर्म से उत्पन्न जाति के राजनीतिक इस्तेमाल को धर्म-निरपेक्ष मानते हैं .ये इस सच को मानते ही नहीं कि धर्म का राजनीति में इस्तेमाल जितना खतरनाक है, उससे कम खतरनाक जाति का इस्तेमाल नहीं है। इस सच्चाई को को लालू -नीतीश ,मुलायम और मायावती या तो समझ नहीं पाए या फिर वोट के लिए सच्चाई से मुंह मोड़ते हुए जातिवादी राजनीति के माध्यम से धर्म की राजनीति को मजबूत करते रहे हैं .
आज लालू-नीतीश,मुलायम और मायावती जैसे नेता इस बार लोकसभा चुनावों में अपना सफाया हो जाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को दोषी तो ठहरा रहे हैं लेकिन हकीकत तो यह है कि सभी अपने व्यक्तिगत सत्ता के लिए लगातार जातिवादी नीतियों को अपनाते रहे जिससे दलित निरंतर सबसे कटते चले गए। पिछले पचीस सालों के अनुभव से पता चलता है कि अब देश को जातिवादी पार्टियों की जरूरत नहीं है, बल्कि सबके सहयोग से जाति-व्यवस्था विरोधी एक मोर्चे की आवश्यकता है, अन्यथा जातियां मजबूत होती रहेंगी, जिससे धर्म की राजनीति को ऑक्सीजन मिलता रहेगा। अगर हम साम्प्रदायिकता राजनीति का खात्मा चाहते हैं तो हमें छदम धर्म-निरपेक्षता की राजनीति से तौबा करना पड़ेगा . डॉ. आंबेडकर ने गांधीजी से कहा था, ‘स्वतंत्रता आंदोलन में सारा देश एक तरफ है, पर जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन सारे देश के खिलाफ है, इसलिए यह काम बहुत मुश्किल है।’
इसलिए केवल राजनीतिक फायदे के लिए धर्म-निरपेक्षता का नारा देकर नेताओं के एकजुट हो जाने से साम्प्रदायिकता पराजित नहीं होनेवाली .उसे पराजित करने के लिए –सांप्रदायिकता ,छदम धर्म-निरपेक्षता और जाति की राजनीति से नेताओं को ऊपर उठना होगा .

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