गंगा मैली हो गई

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एक तऱफ सरकार नदियों की स़फाई और उनके पुनरुद्धार के लिए अरबों रुपये ख़र्च कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ नदियों को मिटाने वाले तमाम काम भी अंजाम दिए जा रहे हैं. विकास के नाम पर हम प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ कर रहे हैं. इसके लिए हमने सदियों से अपनी सहायक रहीं नदियों को भी नहीं छोड़ा. बिजली पैदा करने के लिए इन नदियों पर एक साथ कई जल विद्युत परियोजनाएं बन रही हैं. इनके साथ जो छेड़छाड़ की जा रही है, उससे इनका अस्तित्व ख़तरे में आ गया है. इन परियोजनाओं द्वारा शायद हम बिजली पा लेंगे, लेकिन जब पानी ही नहीं रहेगा तो कृषि कार्य कैसे करेंगे और जब कृषि नहीं होगी तो खाद्यान्न कहां से आएगा. एक तऱफ हम पेयजल की किल्लत से जूझ रहे हैं और दूसरी तऱफ पानी के सबसे बड़े स्रोत नदियों को मिटा रहे हैं. आने वाले समय में पानी की इतनी किल्लत होगी कि कहा जा रहा है, तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा. भारत की विभिन्न नदियों पर छोटे-बड़े कई बांध हैं, जिनमें 4,500 बड़े बांध हैं. अब तक उत्तरकाशी और गंगोत्री के बीच स़िर्फ एक यानी मनेरी भाली-1 परियोजना थी, मगर अब इस 125 किलोमीटर लंबे इलाक़े में पांच बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इन परियोजनाओं को कामयाब बनाने के लिए भागीरथी यानी गंगा को अपना मार्ग बदलना होगा. 125 किलोमीटर तक अधिकांश जगहों पर गंगा को सुरंगों में डाल दिया जाएगा. यहां गंगा एक जगह सुरंग से निकलेगी तो कुछ दूरी पर जाकर दूसरी सुरंग में प्रवेश कर जाएगी. सरकार की योजना के मुताबिक़, 2020 तक प्रदेश की बड़ी नदियों पर बिजली परियोजनाओं की संख्या लगभग 115 तक पहुंच जाएगी, जबकि छोटे प्रोजेक्टों की संख्या इससे अलग है. सरकार की योजना के मुताबिक़, अगर प्रस्तावित परियोजनाएं पूरी कर ली जाती हैं तो अकेले सतलुज नदी पर आधारित परियोजनाओं की कुल संख्या 37 हो जाएगी. इसी तरह व्यास नदी पर आधारित परियोजनाओं की संख्या 32, रावी पर 20, चेनाब पर 9 एवं यमुना पर 14 हो जाएगी. मतलब सा़फ है कि हर नदी पर औसतन आठ किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ी बिजली परियोजना लगेगी. इस समय दर्जनों ऐसी बड़ी परियोजनाएं लाइन में हैं, जिन्हें 12वीं पंचवर्षीय योजना में म़ंजूरी मिल जाएगी. 12वीं पंचवर्षीय योजना में लगभग 35 बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं. केंद्र के साथ साझेदारी में लगने वाली इन बड़ी बिजली परियोजनाओं में चार बड़े प्रोजेक्ट भी शामिल हैं. इन परियोजनाओं के चलते कई नदियों का अस्तित्व पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा. निजी क्षेत्र में भी 31 बड़ी बिजली परियोजनाएं प्रस्तावित हैं. इनमें भी लगभग दस परियोजनाओं का आवंटन किया जा चुका है और 17 प्रोजेक्टों के आवंटन की प्रक्रिया जारी है. सतलुज नदी बेसिन पर लगने वाली बिजली परियोजनाओं की संख्या सबसे अधिक है. 15 जल विद्युत परियोजनाएं अकेले सतलुज नदी बेसिन पर ही लग रही हैं, जबकि 9 चेनाब नदी, 7 रावी नदी, 3 व्यास नदी और दो यमुना नदी के बेसिन पर प्रस्तावित हैं. जुलाई 2006 में विद्युत उत्पादन के लिए सबसे पहले गंगा पर टिहरी बांध का निर्माण हुआ था. टिहरी से लगभग 50 किलोमीटर दूर धरासू नामक जगह पर मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना है. जनवरी 2008 से यहां विद्युत उत्पादन हो रहा है. योजनानुसार यहां 304 मेगावॉट बिजली बनाई जाएगी, जिसके लिए पानी टरबाइन पर एक निश्चित ऊंचाई से गिरना ज़रूरी है. इस ऊंचाई को पाने के लिए गंगा को 24 किलोमीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुज़ारा जाता है, जिससे 24 किलोमीटर तक उसका अस्तित्व ख़त्म हो चुका है. इस क्षेत्र में इतनी परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं कि जहां एक परियोजना ख़त्म होती है, वहीं से दूसरी शुरू हो जाती है. मतलब सा़फ है कि गंगा अब सुरंगों में बहा करेगी. आश्चर्य की बात यह है कि यहां जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण से पहले यह जानने की  कोशिश भी नहीं की गई कि नदियों का पानी इन परियोजनाओं के लिए पर्याप्त है भी या नहीं. इन परियोजनाओं के चलते नदियों का अस्तित्व ख़त्म हो गया, करोड़ों रुपये ख़र्च हुए सो अलग. उसके बाद भी परिणाम लगभग शून्य है. यही वजह है कि टिहरी और मनेरी भाली प्रथम एवं द्वितीय योजनाएं केवल 30 से 35 प्रतिशत विद्युत का ही उत्पादन कर पा रही हैं. इनकी सभी टरबाइनों को चलाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं है. टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है. मार्च 2008 तक इस बांध पर कुल 8,298 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे, जो उस अनुमानित लागत से कहीं ज्यादा है, जो परियोजना के प्रारंभ में तय की गई थी. इसकी प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावाट थी, मगर वर्तमान में यह केवल 1000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है, यानी क्षमता के आधे से भी कम. वहीं मनेरी भाली वर्तमान में अपनी निर्धारित क्षमता से का़फी कम यानी स़िर्फ 102 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है. इलाक़े में स्थित तीनों बांध यानी टिहरी और मनेरी प्रथम एवं द्वितीय कभी भी अपनी निर्धारित क्षमता के बराबर विद्युत उत्पादन नहीं कर पाए, जबकि इन सभी परियोजनाओं को मंज़ूरी ही इस आधार पर दी गई थी कि इनमें क्षमता अनुसार शत प्रतिशत उत्पादन होगा. आंकड़ों के अनुसार, 208 बांधों में से 89 फ़ीसदी अपनी निर्धारित क्षमता से कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं. 49 फीसदी में तो कुल क्षमता से आधी से भी कम बिजली बन रही है. इससे सा़फ ज़ाहिर है कि बड़ी संख्या में ऐसी परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है और दी जा रही है, जो बिल्कुल भी व्यवहारिक नहीं हैं. बिना सोचे-समझे मंज़ूरी देने का ही अंजाम है कि करोड़ों रुपये ख़र्च हो गए, जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया, बावजूद इसके परियोजनाएं अपने लक्ष्य से कोसों दूर हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2030 तक गंगोत्री ग्लेशियर के आकार में 80 फ़ीसदी तक की कमी आ जाएगी, जिससे गंगा सदानीरा से एक मौसमी नदी में तब्दील हो जाएगी. इसका मतलब है कि अगले 20 सालों में इतना भी पानी नहीं बचेगा कि इन बांधों की टरबाइनें चलाई जा सकें. यही बात जब दिल्ली स्थित टेरी संस्था के अध्यक्ष राजेंद्र पचौरी ने अपनी रिपोर्ट में कही थी कि हिमालय के हिमनद 2035 तक समाप्त हो जाएंगे, तब इस पर का़फी विवाद हुआ. इसके बाद पचौरी को अपना दावा वापस लेना पड़ा था, लेकिन हालात देखकर तो यही लगता है कि उनकी कही बात सत्य थी. हिमनद का़फी तेज़ी से पिघल रहे हैं. गंगोत्री अब तक अपने स्थान से 17 किलोमीटर पीछे खिसक गई है और अभी भी पीछे जा रही है. हिमनदों से पानी का प्रवाह लगातार कम होता जा रहा है. इसके बावजूद सरकार इन विशाल परियोजनाओं के निर्माण को म़ंजूरी दे रही है. वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है, जिनके अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है. गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 45 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस पर जीविकोपार्जन के लिए निर्भर हैं. कभी हम कहा करते थे कि गंगा तेरा पानी अमृत अथवा गंगा के पानी में अमृत सा गुण मिलता है. पर्यावरणविद्‌ कहते हैं कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फ़ीसदी ज्यादा होता है, लेकिन अब यह बीते ज़माने की बात है, क्योंकि अब गंगा सुरंगों में बहेगी, जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी. जल विद्युत परियोजनाएं नदी के रास्ते का बुनियादी स्वरूप भी बदल देती हैं, जिससे पानी में जैविक बदलाव आ जाते हैं. अब गंगा के पानी को भरकर नहीं रखा जा सकेगा, क्योंकि अब यह अधिक दिनों तक रखने से सड़ जाएगा. जल विद्युत परियोजनाओं के कारण कृषि कार्यों पर भी का़फी विपरीत असर पड़ा है. इन परियोजनाओं ने लगभग एक लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि को बर्बाद कर दिया है. इनके निर्माण और पावर लाइनों को बिछाने के लिए अब तक आठ लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं. पूर्व में निर्मित भाखड़ा एवं पौंग बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं के कारण हज़ारों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा. इसके अलावा आठ हजार हेक्टेयर से अधिक जंगल फारेस्ट लैंड डायवर्जन के कारण समाप्त हो चुके हैं. एक लाख हेक्टेयर कृषि भूमि विभिन्न बांधों से बने जलाशयों में समा चुकी है. 

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