खुदकुशी के लिए जिया खुद ज़िम्मेदार

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प्यार , वफा, शक, नफरत और फिर ख़ुदकुशी. दो प्यार करने वालों में से एक दुनिया में नहीं है और दूसरा है सलाखों के पीछे. सूरज के जेल जाने को भले ही हम उसकी ग़लती की सज़ा के रूप में देख रहे हैं, लेकिन इस पूरे मामले में क्या वाकई सूरज गुनहगार है? भला किस प्रेमी युगल में नोंक-झोंक नहीं होती! ज़िया और सूरज के बीच भी ल़डाई होती होगी, लेकिन अपनी ज़िंदगी को ख़त्म कर लेना किसी कमजोर मानसिकता की ही निशानी कही जाएगी.

जिया की खुदकुशी पर पहले मीडिया ने फिल्म इंडस्ट्री को ज़िम्मेदार ठहराया. कहा गया कि उन्हें काम नहीं मिल रहा था. हम आपको बता दें कि मात्र 18 साल की उम्र में ज़िया ने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ काम किया. उसके बाद मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर ख़ान और अक्षय कुमार के साथ भी उन्होंने काम किया. उन्होंने ब़डे स्टार्स के साथ एक नहीं, तीन-तीन हिट फिल्में कीं. बाद में तहक़ीक़ात के बाद पता चला कि उन्होंने प्यार में नाकामयाबी मिलने की वजह से खुदकुशी कर ली. फिर यहां एक ब़डा सवाल यह है कि क्या ज़िया इतनी नादान थीं कि प्यार में नाकामयाबी मिलने पर मौत को गले लगा लें. वह कोई 15-16 साल की नासमझ ल़डकी तो थीं नहीं. ज़िया ने दुनिया देखी थी, लेकिन वह फैंटेसी की दुनिया में जीने वाली ल़डकियों में से थीं. जिया ने अपने लेटर में अपना सबकुछ सूरज को समर्पित कर देने की बात लिखी थी. जिस समर्पण की बात उन्होंने अपने लेटर में लिखा था, क्या आज के समय में प्यार में समर्पण का कुछ ख़ास मतलब है? उनके लिए मां-बहन, परिवार और किसी रिश्ते का कोई मतलब नहीं था, सिवाए प्यार के.

देखा जाए, तो जिया और सूरज हमउम्र थे, बल्कि ज़िया सूरज से एक साल बड़ी थीं. या यूं कहें कि ज़िया कुछ मायनों में सूरज से कहीं ज़्यादा अनुभवी थीं. उन्होंने दुनिया देखी था. इंग्लैंड और अमेरिका में उनकी परवरिश हुई. करियर भी ठीक-ठाक था. पहली ही फिल्म से उन्हें अपार सफलता मिली. उन्होंने कुल तीन फिल्में कीं. वे भी ब़डे बजट की. अभी और मेहनत करतीं और चुजी नहीं होतीं, तो उन्हें और काम मिलता. ज़िया को प़ढने-लिखने का भी काफ़ी शौक था. वह काफ़ी क्रिएटिव भी थीं. वह अभिनेत्री होने के साथ ही गायिका भी थीं. अपनी पहली फिल्म नि:शब्द का एक गाना उन्होंने ख़ुद गाया था. वह अपना बैंड बनाना चाहती थीं. अपनी ऊर्जा को वह सही जगह लगातीं, तो बहुत कुछ कर सकती थीं और एक मिसाल बन सकती थीं. वह पब्लिक फिगर थीं. वहीं दूसरी ओर मात्र 23 साल के सूरज फिल्मों में आने के लिए हाथ-पैर मार रहे थे. अभी उनके करियर की शुरुआत भी नहीं हुई थी. सूरज की पहचान स़िर्फ आदित्य पंचोली के बेटे के रूप में है. ज़िया हर लिहाज से सूरज से श्रेष्ठ थीं, फिर सवाल यह उठता है कि उन्होंने सूरज को क्यों चुना? सूरज एक आकर्षक फिजिक के मालिक हैं. ल़डकियां उनकी डिलडौल  पर्सनैलिटी से आकर्षित हो जाती थीं. मतलब साफ़ है, ज़िया उनके लुक से प्रभावित थीं. शायद इसीलिए वह सूरज को लेकर ओवर पोजेसिव भी थीं. सच तो यह है कि ज़िया जैसी ल़डकियां या यूं कहें कि ज़िया जैसे लोग अपनी बेवकूफी से ही मरते हैं. ल़डकियों के बारे में कहा जाता है कि वे हमेशा सपनों के पीछे भागती हैं. उन्हें लगता है कि जो वे चाहती हैं और जो वे सोचती हैं, वही बेस्ट वे ऑफ लाइफ है. ज़िया भी उन्हीं में से एक थीं. जिस उम्र में उन्हें करियर पर फोकस करना था, उस उम्र में वह प्यार मोहब्बत में ज़्यादा इन्वॉल्व थीं. किसी भी रिलेशनशिप में बैलेंस बनाना बहुत ज़रूरी होता है. अति हमेशा बुरी होती है. उनकी यह चाहत कि सूरज हमेशा उनके इर्द-गिर्द रहें, उनका फोन उठाएं. उनकी जासूसी करना कि कब कितने बजे वह किससे मिलने वाले हैं. इन सारी बातों से यह साफ़ हो जाता है कि वह सूरज को लेकर ओवर पोजेसिव, ओवर इमोशनल और ओवर डिमांडिंग थीं. यह किसी रिश्ते की ख़राब शुरुआत भर है. यह तो हम सभी जानते हैं कि इंडस्ट्री में सर्वाइव करना काफ़ी मुश्किल काम है. लोगों से मिलना-जुलना, अच्छा पीआर होना, आज के प्रोफेशन की डिमांड है और ख़ासतौर पर इंडस्ट्री में तो इसके बिना काम ही नहीं चलता! ऐसे में यह कैसे संभव था कि सूरज अपना काम छो़ड कर उनके इर्द-गिर्द घूमते रहते और उनके हर डिमांड को पूरा करते! प्यार का मतलब यह तो नहीं कि ख़ुद को बर्बाद कर लिया जाए, या जिसे हम प्यार करते हैं, उसे बर्बाद कर दें. ज़िया और सूरज के एक साल के प्यार में ल़डाई-झग़डे, धोखा, शक़ अबॉर्शन सबकुछ था. ज़िया अपनेे लेटर में लिखती हैं कि मेरे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा. यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जब उन्हें लगता था कि वह एक ल़डकी हैं और उनके पास खोने के लिए कुछ है, फिर वह उस रिश्ते में इतना आगे तक क्यों गईं? उन्होंने प्यार को सबकुछ मान लिया. यह जानते हुए कि सूरज के सामने अभी सबसे ब़डी प्रायोरिटी उनका करियर है, फिर एक ऐसे ल़डके से रिश्ता क्यों जो़ड लिया, जो किसी मुक़ाम पर नहीं था. झग़डे उस दिन से पहले भी सूरज और ज़िया के बीच हुए थे, लेकिन उस दिन जिया ने शराब पी थी. नशा, अविश्‍वास और अत्यधिक ग़ुस्से में आकर ज़िया ने अपनी ज़िंदगी ही ख़त्म कर ली. शायद ज़िंदा रहतीं और सबकुछ ठीक करने की कोशिश करतीं, तो सब ठीक हो भी जाता और नहीं भी होता, तो सूरज से अलग एक नई ज़िंदगी की शुरुआत तो कर ही सकती थीं. हम अनुभव लेकर पैदा नहीं होते. हम इंसान हैं, भगवान नहीं, ग़लतियां तो होती हैं. ज़िया और सूरज एक-दूसरे से प्यार करते थे, उनके इंटिमेट रिलेशन थे और वे इस स्थिति में नहीं थे कि बच्चे को जन्म दे पाते या उसकी परवरिश कर पाते. जिया ने अबॉर्शन करा लिया, तो ऐसा नहीं था कि उनकी ज़िंदगी ख़त्म हो गई थी या वह दुबारा मां नहीं बन सकती थीं. अबॉर्शन या उनके बीच ल़डाई-झग़डे होते थे, इन वजहों से खुदकुशी करना हरगिज सही नहीं माना जा सकता.

हादसों से ज़िंदगी ख़त्म नहीं होती. समझदार इंसान वही है, जो ग़लतियों से सीखे और उन्हें न दोहराए. किसी शायर ने ठीक ही कहा है…और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवा. ऐसे लोग, जो प्यार में जान देने की बात सोचते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि किसी एक के लिए ज़िंदगी को ख़त्म नहीं किया जा सकता. ऐसे लाखों-करो़डों लोग इस दुनिया में हैं, जिन्हें विरासत में कुछ नहीं मिला. उन्होने संघर्ष किया, जीवन के क़डवे अनुभवों से सीखा और समाज में एक मिसाल क़ायम की.

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