कोई रिश्ता कभी ख़त्म नहीं होता गुलज़ार

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स्प्रिंग फिवर फेस्टिवल 2013 के मौक़े पर गुलज़ार ने इंडिया हैबिटेट सेंटर, दिल्ली में अपने अनुभवों पर आधारित पुस्तक हाफ ए रूपी का विमोचन किया. इस मौक़े पर हमें उनसे अंतरंग बातचीत करने का मौक़ा मिला. उन्होंने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं के बारे में विस्तार से चौथी दुनिया से बातचीत की. 

हिंदी सिनेमा में गुलज़ार वह नाम हैं, जिन्होंने जनजीवन से जुड़ी कई तरह की रचनाएं की हैं.गुलजार यानी सभी के पसंदीदा लेखक, गीतकार, निर्माता एवं निर्देशक. गुलजार उन लोगों में से हैं, जो समय के साथ चलते हैं. एक तरफ़ उन्होंने मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास प़डा है…जैसे गीत दिए, तो दूसरी तरफ छैंया छैंया.. और कजरारे कजरारे… जैसे गीतों पर युवाओं को थिरकने पर मजबूर कर दिया. उन्हें डैनी बॉयल की फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर में गीत जय हो… के लिए ऑस्कर अवॉर्ड और गैमी अवॉर्ड भी मिल चुका है. वहीं उन्हें वर्ष 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2004 में पद्मभूषण अवॉर्ड भी मिला. गुलज़ार ने विमल राय की फिल्म बंदिनी से शुरुआत की थी. वर्ष 1962 में यह फिल्म बनी थी. फिल्म बंदिनी के मिलने के पीछे एक कहानी है. एक बार उनकी दुकान पर उस जमाने के  मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन अपनी मोटर ठीक करवाने आए. बातों-बातों में एसडी बर्मन मेकेनिक संपूर्णानंद सिंह, यानी गुलज़ार की गीत लिखने की प्रतिभा से परिचित हुए. एस डी बर्मन उन दिनों काफ़ी परेशान थे. परेशानी की वजह यह थी कि फिल्म बंदिनी के गीत शैलेंद्र लिख रहे थे, लेकिन फिल्म के एक सीन पर लिखा उनका कोई भी गीत विमल राय को जम नहीं रहा था. तब उन्हें मेकेनिक संपूर्णानंद का ख्याल आया. उन्होंने विमल राय से उनकी बात कराने की सोची. इसमें परेशानी यह थी कि विमल राय किसी भी बात को आसानी से स्वीकार नहीं करते थे. सचिन दा को उनके सामने अपनी बात रखने के लिए कई बार सोचना प़डता था. आख़िरकार उन्होंने फैसला किया कि चाहे जो भी हो, वह विमल राय को संपूर्णानंद सिंह से ज़रूर मिलवाएंगे. विमल राय संपूर्णानंद सिंह की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें इस तरह बंदिनी के गीत का धुन बनाने के लिए चुन लिया गया. बंदिनी के गीत मेरा गोरा रंग लईले, मोहे श्याम रंग देई दे, छुप जाऊंगी रात ही में, मोहे पी के रंग देई दे…को स्वर दिया स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा. वह इस गीत के हिट होते ही रातों रात मोटर मेकेनिक संपूर्णानंद सिंह से गीतकार गुलज़ार बन गए. कुछ समय बाद विमल राय ने उन्हें अपना सहायक बना लिया. गुलजार ने विमल राय से फिल्म निर्माण सीखा, इसलिए वह विमल राय को अपना गुरु मानते हैं. गुलज़ार ने विमल राय की मृत्यु के  बाद उनके प्रमुख सहायक ऋषिकेश मुखर्जी के साथ भी काम किया. तब तक ऋषिकेश मुखर्जी ने स्वतंत्र रूप से फिल्म निर्देशन शुरू कर दिया था. इन दोनों का साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए काफ़ी सफ़ल साबित हुआ. ऋषि दा के लिए गुलज़ार ने सबसे पहले फिल्म आनंद के  संवाद लिखे. फिल्म के लिए गुलजार को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया. यह गुलज़ार का पहला फिल्म फेयर पुरस्कार था. इस फिल्म में गुलज़ार का लिखा गीत-मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने… को मुकेश ने अपनी आवाज़ दी, जिसे खूब पसंद किया गया. ऋषि दा के साथ गुलज़ार ने और कई बेहतरीन फिल्में दीं. इनमें से प्रमुख हैं, बावर्ची, गुड्डी, मिली, नमक हराम, गोलमाल, जंजीर और अभियान, जो सुपर हिट रहीं. अफसोस की बात यह रही कि कई हिट फिल्में देने के बाद कुछ मतभेदों की वजह से इन दोनों महान कलाकारों ने फिर कभी साथ काम न करने का फैसला कर लिया. गुलजार की अपनी बनाई फिल्मों की कथा, पटकथा तथा संवाद भी गुलजार स्वयं लिखते हैं. समाज में उपेक्षित गूंगे-बहरों की समस्या पर आधारित गुलज़ार की फिल्म कोशिश ने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया. अभिनेता के रूप में संजीव कुमार गुलज़ार की पहली पसंद थे. और शायद इसीलिए उनकी फिल्मों अंगूर, कोशिश, आंधी, परिचय, नमकीन, मौसम में संजीर कुमार ही थे. उनके अलावा, गुलज़ार ने विनोद खन्ना, नसीरुद्दीन, शाह, अमोल पालेकर एवं जितेंद्र को अपनी फिल्मों में लिया. गुलज़ार ने जब फिल्म परिचय में जितेंद्र को लिया, तो इंडस्ट्री में उनके इस फैसले को शंका भरी दृष्टि से देखा गया. इंडस्ट्री में लोगों को लगा कि जितेंद्र गंभीर अभिनय नहीं कर सकते, वह पेड़ों के इर्द-गिर्द घूमने वाले अभिनेता साबित होंगे. लेकिन गुलज़ार ने सबकी शंकाओं को दरकिनार करते हुए जितेंद्र से बेहतरीन अभिनय करवाया. बाद में जितेंद्र बॉलीवुड के उम्दा अभिनेताओं में गिने जाने लगे. गुलजार ने नसीरुद्दीन शाह को लेकर ऐतिहासिक धारावाहिक मिर्जा गालिब बनाया, जिसे बेहद सराहा गया. इसके अलावा, बच्चों के लिए जंगल बुक तथा एलिस इन वंडरलैंड के शीर्षक गीत भी लिखे, जो बेहद प्रसिद्ध रहे. 73 वर्ष के गुलज़ार आज भी उतनी ही ऊर्जा के साथ लेखन में व्यस्त हैं. गुलज़ार ने भारत पाक विभाजन की त्रासदी को न केवल झेला है, बल्कि नजदीक से देखा और भोगा भी है. उनका जन्म झेलम ज़िला पंजाब के दीना गांव में वर्ष 1943 में हुआ था. उनका असली नाम संपूर्णानंद सिंह है. वह अपने पिता की दूसरी पत्नी की इंकलौती संतान थे. नौ भाई बहनों में वह चौथे स्थान पर थे. मां उन्हें तब छोड़कर चली गईं, जब वे दूध पीते बच्चे थे. मां के आंचल की छांव और पिता का दुलार तक उन्हें नहीं मिला. उनका बचपन दिल्ली की सब्जी मंडी में बीता. बंटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर, पंजाब आकर बस गया और गुलज़ार जीविकोपार्जन के लिए मुबंई चले गए. वहां वह बतौर मेकेनिक काम करते थे और खाली समय में कविताएं लिखते थे. गुलज़ार और राखी वर्ष 1973 में गुलज़ार ने राखी से शादी की. राखी ने गुलजार के पसंद न होने के कारण फिल्मों में काम न करने का ़फैसला कर लिया. कुछ समय बाद, जब उनकी बेटी मेघना लगभग डेढ़ वर्ष की थी, इन दोनों का रिश्ता टूट गया. दोनों के बीच तलाक ज़रूर नहीं हुआ, लेकिन आपसी सहमति से दोनों अलग हो गए. हालांकि उनकी बेटी मेघना को हमेशा दोनों का प्यार मिलता रहा. मीना कुमारी और गुलजार  उस जमाने में लोगों के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री मीना कुमारी और गुलज़ार के  रिश्ते काफ़ी भावनात्मक थे. मीना कुमारी ने मरने से पहले अपनी तमाम डायरी और शायरी की कापियां गुलज़ार को सौंप दी थीं. गुलज़ार ने उन्हें संपादित कर प्रकाशित भी कराया. दोनों की भेंट फिल्म बेनज़ीर के सेट पर हुई थी. विमल राय फिल्म के निर्देशक थे और गुलज़ार सहायक. बाद में जब गुलज़ार स्वतंत्र फिल्म निर्देशक बने, तो फिल्म मेरे अपने की मुख्य भूमिका मीना कुमारी को सौंप दी. वर्ष 1972 में मीना चल बसीं. आज भी गुलज़ार मीना कुमारी को याद कर के भावुक हो जाते हैं. गुलज़ार की फिल्मों की विशेषता यह है कि उनके फिल्मों के पात्र भावुक और संवेदनाओं से भरे होते हैं. स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियां गुलज़ार की विशेषता है. उनकी फिल्मों के  गीत कथानक के  तानेबाने में बुने होते हैं. गुलज़ार का दर्शन है कि कोई रिश्ता कभी ख़त्म नहीं होता, कोई रिश्ता कभी मरता नहीं है. हमेशा भावनाएं ही काम आती हैं. अंतत: भरोसा और विश्‍वास की जीत होती है. गुलज़ार की फिल्में (बतौर निर्देशक)  मेरे अपने (1971),  परिचय (1972),  कोशिश (1972),  अचानक (1973),  खुशबू (1974),  आंधी (1975),  मौसम (1976),  किनारा (1977),  किताब (1978),  अंगूर (1980),  नमकीन (1981),  मीरा (1981),  इजाजत (1986),  लेकिन (1990),  लिबास (1993),  माचिस (1996), हुतूतू (1999) टीवी सीरियल मिर्जा गालिब (1988), किरदार (1993) प्रमुख किताबें चौरस रात (लघु कथाएं, 1962), जानम (कविता संग्रह, 1963),  एक बूंद चांद (कविताएं, 1972),  रावी पार (कथा संग्रह, 1997), रात, चांद और मैं (2002), रात पश्मीने की, खराशें (2003) प्रमुख एलबम दिल पड़ोसी है (आरडी बर्मन, आशा/ 1987), मरासिम (जगजीत सिंह/ 1999), विशाल (ग़ुलाम अली/ 2001), आबिदा सिंग्स कबीर (2003).

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