किसानों पर राजनीति कब तक

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उत्तर प्रदेश में किसानों की भूमि अधिग्रहण का मामला अब आमने सामने की लड़ाई में तब्दील हो गया है. कॉरपोरेट पूंजीवाद ने किसानों की उपजाऊ ज़मीन हड़पने और इसे अधिक से अधिक पैसा कमाने का ज़रिया बना दिया है. पिछले दिनों ऐसे कई मामले देखने को मिले. इसी क्रम में करछना पावर प्लांट के लिए अधिग्रहीत ज़मीन के उचित मुआवज़े की मांग को लेकर आंदोलनरत किसानों के तेवर को देखकर लगता है कि अब किसान चुप बैठने वाले नहीं हैं. करछना पॉवर प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन अधिग्रहण के तहत उचित मुआवज़ा न मिलने से गुस्साए किसानों ने करछना के कचरी गांव में जमकर हंगामा किया. उचित मुआवज़े को लेकर यहां किसान कई दिनों से अनशन पर बैठ रहे, उनकी मांगे माने बिना उन्हें जबरदस्ती उठाने से किसान और उग्र हो गए तथा पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों पर हमला बोल दिया. जिसमें बड़ी संख्या में किसान, मजदूर और महिलाओं ने अधिकारियों पर पथराव किया. इसके बाद उनपर लाठीचार्ज किया गया जिससे भागने के बजाय किसान और क्रोधित हो गए. कई गांवों के किसान, महिलाएं एकजुट होकर रेलवे ट्रैक पर पहुंच गए और दिल्ली-हावड़ा रेल मार्ग जाम कर दिया. पटरियों पर जगह-जगह अवरोध लगा दिए गए और महिलाएं पटरी पर लेट गईं. कुछ किसानों ने इलाहाबाद-मिर्जापुर हाइवे को भी जाम कर दिया. पुलिस ने किसानों को रेलवे ट्रैक से हटाने की कोशिश की तो नाराज़ किसानों ने रेलवे के पावर हाउस में आरएएफ के आधा दर्जन से ज़्यादा जवानों को बंधक बना लिया और एडीएम, एसडीएम, एएसपी और सीओ की पिटाई भी की. यही नहीं उन्होंने अधिकारियों की जीप और कार भी आग के  हवाले कर दी. प्रशासन के अधिकारियों द्वारा उनकी मांगे मानने के आश्वासन के बाद ही हंगामा शांत हुआ. करछना में प्रस्तावित मेगावाट के पावर प्लांट के लिए ज़िला प्रशासन ने आठ गांवों देवरी, कचरा, देहली भगेसर, ढोलीपुर, कचरी, मेंडरा, भिटार, गढ़वा कला के सौ किसानों की कई हेक्टेयर ज़मीन अधिग्रहीत कर जेपी गु्रप को सौंपी है, लेकिन उन्हें ज़मीन का पूरा मुआवज़ा नहीं दिया गया. जिन्हें मुआवज़ा मिल गया वे टप्पल की तर्ज़ पर अधिक मुआवज़ा देने की मांग कर रहे हैं. किसान अपनी जिद पर अड़े हैं और प्रशासन उनकी मांगे मानना नहीं चाहती. अधिक मुआवज़े को लेकर पुनर्वास किसान कल्याण सहायता समिति के बैनर तले दीनानाथ क्रांतिकारी के नेतृत्व में का़फी समय से आंदोलन चल रहा था. पुनर्वास किसान कल्याण सहायता समिति का आरोप है कि उनकी जिस ज़मीन में धान, गेंहू समेत विभिन्न फसलें होती हैं उसे प्रशासनिक अफसरों के इशारे पर बंजर और असिंचित दर्शा दिया गया. दीनानाथ क्रांतिकारी का कहना है कि इसे लेकर अफसरों, जन प्रतिनिधियों से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक से शिकायत की गई थी, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई. क्रांतिकारी के मुताबिक ज़मीन में एक दर्जन से ज़्यादा निज़ी और सरकारी नलकूप लगे हैं, जिससे सिंचाई होती है. उन्होंने बताया कि जिस समय ज़मीन के  मुआवज़े का सर्वेक्षण किया जा रहा था, उसी समय कंपनी के लोगों तथा अधिकारियों की मिलीभगत सामने आ गई थी. क्रांतिकारी का कहना है कि सौ से ज़्यादा ऐसे किसान हैं, जिनके पास ज़मीन देने के बाद कुछ भी नहीं बचेगा, यही नहीं बहुत से किसान तो बेघर भी हो जाएंगे. बेली अस्पताल में बेड पर पड़े किसान नेता दीनानाथ कहते हैं कि लंबे अनशन के बाद ज़िला प्रशासन ने दो मांगों को छोड़कर सभी मांगे मान ली थीं, लेकिन उसके बाद नियत बदल गई. उन्होंने कहा कि किसानों की लाखों की ज़मीन को तीन लाख रुपए प्रति बीघे की दर से एक फार्म भरवाकर प्रशासन ने क़ब्ज़ा कर लिया, जबकि इनका बाज़ार भाव तेरह लाख रुपए है. सरकार जब तक रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़ा और पुनर्वास नीति लागू नहीं करती तब तक किसान अपना आंदोलन वापस नहीं लेंगे. पर यहां अपने हक़ की ल़डाई ल़डते किसानों पर भी राजनेता राजनीतिक रोटी सेंकने से बाज़ नही आए. पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज के दौरान गुलाब विश्वकर्मा नाम के किसान की मौत हो गई. जहां तमाम नेता सहानुभूति जताते नज़र आए. अमर सिंह ने उनकी पत्नी सोना देवी को एक लाख रुपए दिए और पुनर्वास किसान सहायता कल्याण समिति की सभा में उन्होंने कहा कि टप्पल के किसानों को लाख मिल सकते हैं तो करछना के किसानों को क्यों नहीं. उन्होंने कहा कि मायावती, मुलायम सिंह और रेवती रमण सिंह ने मिलकर किसानों की सोना उगलने वाली ज़मीन जेपी ग्रुप को कौड़ियों के भाव दे दी. रीता जोशी भी वहां पहुंची और कहा कि दृढ़ता और साहस के बल पर किसानों ने लड़ाई जीती है, साथ ही उन्होंने पूरे मामले की जांच की बात कही. उन्होंने भी गुलाब की पत्नी को एक लाख रुपए का चेक दिया. इन सबके साथ ही अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. पीएल पुनिया ने करछना के मसले को और हवा दे दी. उन्होंने संकेत किया कि इस मुद्दे पर संघर्ष होगा. पुनिया ने कहा कि सामान की क़ीमत हमेशा बनाने वाला तय करता है, न कि ग्राहक. उसी तरह ज़मीन की क़ीमत तय करने का हक़ किसान का है, लेकिन बसपा सरकार लगातार इसके खिला़फ चल रही है. उन्होंने मांग की कि करछना के किसानों को हरियाणा की तर्ज़ पर मुआवज़ा दिया जाए या फिर दरों को लेकर किसानों से सहमति ली जाए. अधिग्रहीत की गई ज़मीन के मुआवज़े को लेकर किसानों के संघर्ष का यह कोई पहला मामला नहीं है, जैसा करछना में हो रहा है. गंगा एक्सप्रेस के  तहत जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज़मीनों का अधिग्रहण किया गया था तो यह क्षेत्र किसानों और प्रशासनिक संघर्षों का पर्याय बन गया. इसी तरह वर्ष 2004 में रिलायंस के दादरी प्रोजेक्ट के लिए जब किसानों को 2500 एकड़ ज़मीन पर कम मुआवज़ा दिया गया तो उन्होने पूर्व प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व में आंदोलन किया. जिसमें उन्हे इलाहाबाद हाईकोर्ट से जीत मिली. ममता बनर्जी ने भी कोलकाता के सिंगुर में टाटा के  नैनो प्रोजेक्ट के खिला़फ स़फल आंदोलन चलाया. अभी हाल में ही बुंदेलखंड के बांदा जनपद में ग्राम पल्हरी व गुरेह के किसानों ने भी लगातार एक माह तक क्रमिक अनशन और अन्य अहिंसात्मक कार्यवाई करके प्रदेश सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण को लेकर जान देंगे पर ज़मीनें नहीं देंगे के बैनर द्वारा आंदोलन किया. बहरहाल वित्तमंत्री, प्रणव मुखर्जी ने अब घोषणा की है कि ज़मीन अधिग्रहण पर मंत्रियों का एक समूह विचार कर रहा है और इस बारे में शीघ्र ही एक विधेयक लाया जाएगा. असल में आज भी जिस भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 के तहत ज़मीनों का अधिग्रहण हो रहा है, दरअसल वह अंग्रेजी हुकूमत की देन है. इस क़ानून की नींव फोर्ट विलियम हंटर ने 1824 में बंगाल प्रांत में डाली, जिसकी सहायता से अचल संपत्तियों का अधिग्रहण, सड़क, नहर और अन्य जन्य सुविधाओं के लिए किया गया. पर जब रेल लाइनों के  बिछाने की बात आई तो 1894 में सरकार को और मजबूत करने के लिए इसमें व्यापक परिवर्तन किए गए. यह विडंबना है कि आज भी इसी क़ानून के मुताबिक केंद्र सरकार या केंद्रीय एजेंसियां अथवा राज्य सरकारों द्वारा अधिगृहित कंपनियां किसान आंदोलनों को कुचलते हुए उनकी ज़मीनों पर अतिक्रमण कर महज़ मुआवज़ा देकर खाना पूर्ति करते हैं. अमूमन यह अधिग्रहण अस्पताल, सड़क, फैक्ट्री, सेज जैसे व्यापारिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भी इस क़ानून की बैशाखी थाम ली जाती है. 1978 में इसे तब और मजबूती मिली जबकि 44वें संविधान संशोधन के ज़रिए संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार की श्रेणी से निकाल दिया गया. इस तरह सरकार कभी भी, कहीं भी किसी की भी ज़मीन, भवन का अधिग्रहण की हक़दार हो गई. 

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