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औरत के सम्मान का संघर्ष -शुरुवात अपने घर से करनी होगी।

देश में पिछले दो तीन दशकों में मध्य और उच्च मध्य वर्ग का तेजी से विस्तार हुआ है।इस मध्य और उच्च मध्य वर्ग के जीवन मूल्य बदले हैं।लड़कियों के प्रति इस मध्य वर्ग परिवारों के अभिभावकों का नजरिया भी बदला है।लड़कियों की शिक्षा ,उसके रोजगार और उसके आर्थिकरूप से आत्म-निर्भर होने को लेकर मध्यमवर्गीय समाज में एक साकारात्मक नजरिया पैदा हुआ है।छोटे शहरों की लड़कियाँ भी मीलों दूर जाकर अकेले शहरों में हॉस्टल में रहती हैं।पढ़ाई करती हैं और बिना मां -बाप और भाई के सहारे नौकरी भी करती हैं।ये नए भारत की नयी पीढ़ी की लड़कियाँ हैं।ये दिल्ली,मुंबई और बंगलोर जैसे छोटे बड़े महा नगरों में लाखों की तादाद में आज अपनी जिंदगी स्वच्छंदता के साथ जी रही हैं।ये लड़कियाँ नए भारत के नया चेहरा हैं।दिल्ली में जिस लड़की के साथ गैंगरेप हुआ वह भी ऐसे ही लाखों लड़कियों में से एक थी।वह भी अपने परिवार का बोझ अपने कंधे पर उठाना चाहती थी।अपने भाई बहनों को उच्ची तालिम देने के सपने के साथ वह दिल्ली पढ़ने आई थी।
एक तरफ जहाँ प्रगतिशील नजरिये वाली लड़कियों की ऐसी बड़ी तादाद सामने आई है वहीँ भारतीय परिवार और राज सत्ता के के बुनियादी ढाँचे में कोई आमुलचुल परिवर्तन नहीं आया है।एक बड़ी सच्चाई है कि औरत ही नहीं बल्कि बच्चे भी अभी भी ईमारत,जमीन और सोना चांदी की तरह पुरुष की निजी सम्पति की तरह लिए जाते हैं, इस्तेमाल किये जाते हैं।घर के अन्दर परिवार के अभिभावक लड़कियों और महिलाओं के प्रति आज भी लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं करते .दिल्ली में जिस छात्रा के साथ गैंग रेप की दिल दहला देनेवाली बलात्कार की घटना हुई ,बलात्कार करनेवाले आकाश से नहीं टपके थे .वे भी 6 परिवारों की औरतों की गर्भ से पैदा हुए थे और उनकी भी मां बहनें थीं।मगर फिर भी वो क्यों बलात्कारी हो गए ? बलात्कार के वक्त उन्हें अपनी मां बहनों का चेहरा क्यों याद नहीं आया ?आखिर औरतों को लेकर हम पुरुषों के चरित्र में यह दोहरापन क्यों है ? क्यों पुरुष और औरतों के लिए सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक यौवन संबंधों में भी दोहरे मानदंड इस्तेमाल किये जाते हैं ? गैंगरेप की ताजा घटना को लेकर पुरे मुल्क में आक्रोश। लोग बलात्कारियों को फांसी की सजा देने की मांग कर रहे हैं।निःसंदेह रेप को लेकर कड़े कानून बनने चाहिए और सार्वजनिक स्थलों पर या दफ्तरों में ,जहाँ सबसे ज्यादा समय महिलायें रहती हैं ,उनकी सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध होने चाहिए।मगर सिर्फ कानूनी और प्रशासनिक पहल से रेप और औरत के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं रुकनेवाली नहीं .जबतक परिवार और समाज के बुनियादी ढाँचे में लोकतांत्रिक बदलाव नहीं आते,जबतक औरत की सेक्स ऑब्जेक्ट वाली छवि उसकी बाकी हर छवि पर भारी है, तबतक औरतों को पुरुषों के वहशीपन से बचाना मुश्किल है।
इस नए जमाने में भी 100 में से 80 परिवारों में औरत को दोयम दर्जा ही प्राप्त है।आज भी खाना पकाना,बच्चों को जन्म देना औरत का मुख्य काम है।अगर वह परिवार की देहरी से बाहर निकल कर थोड़ी बहुत आजीविका कमाती भी है तब भी बच्चे पैदा करनेवाली छवि ही औरत पर हावी रहती है।इस छवि को तोड़ने में वक्त लगेगा।यह बदलाव बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन की मांग करता है।रेप कुछ सिरफिरे लोगों की कारवाई नहीं होती।पति भी रेपिस्ट होते हैं।कईबार रिश्तेदार भी रेपिस्ट के रूप में सामने आते हैं।आर्थिक मजबूरी के कारण कोई औरत किसी मर्द के सामने समर्पण के लिए मजबूर हो सकती है।सच्चे प्रेम के अलावा कोई औरत किसी भी दुसरे कारणों से किसी मर्द के सामने अपना शरीर सौंपती है तो वह भी रेप ही माना जाएगा।रेप इसलिए बुरा है क्योंकि वह औरत की इच्छा के विरुद्ध है।ऐसे समाज की स्थापना करना जिसमे किसी भी औरत को हिंसा के डर से,किसी आर्थिक या सामाजिक कारणों से किसी मर्द के सामने समर्पण नहीं करना पड़े ,आसान काम नहीं है।ऐसे सुन्दर ,आदर्श समाज की बुनियाद डालने के लिए लम्बे संघर्ष की दरकार है।राजनीतिक .सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष के बिना यह संभव नहीं।अभी फिरहाल पुरे मुल्क में लोगों का गैंगरेप के विरुद्ध जो आक्रोश दिख रहा है उसे इस दिशा में एक छोटी सी शुरुवात भर ही माना जा सकता है।
आजादी के 65 सालों बाद भी ,विधायिका,न्यायपालिका ,कार्यपालिका में औरतों का प्रतिनिधित्व नगण्य है।547 सदस्यों वाली संसद में आज भी मुश्किल से 30 औरते ही बैठती हैं .जरा कल्पना करिए अगर महिलाओं को संसद में 33 फीसदी आरक्षण दे दिया जाए तो संसद के दोनों सदनों में 300 से ज्यादा महिलायें नजर आयेगीं और तब संसद में महिलायें अपनी मजबूरी पर आंसू बहाती नहीं बल्कि संघर्ष का एलान करते नजर आयेगीं .विधायिका ,कार्यपालिका और न्यायपालिका ,ये तीनों अंग ही शासन के स्वरूप और दिशा तय करते हैं .अगर सरकारी तंत्र में भी औरतों की मौजूदगी न हो तो भला औरतों के खिलाफ अपराध रुक जाने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है।औरत को जबतक घर में सम्मान नहीं मिलेगा ,घर के बाहर उसके सम्मान की रक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती।

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