एक स्‍कूल ऐसा भीः नैतिक शिक्षा के रूप में गीता की पढ़ाई

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सन्‌ 1947 में  गीता विद्यालय को उत्तर प्रदेश माध्मिक शिक्षा परिषद से मान्यता मिली. सन 1973 में यह राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के मानकों पर खरा उतरी. इसके बाद सरकार द्वारा नियुक्त कर्मचारियों ने इस स्कूल में काम करना शुरू कर दिया.
देश भर में स्कूलों के पाठ्यक्रमों में आए दिन बदलाव तो होते ही रहते हैं, और यह कोई नई बात भी नहीं है. पर लखनऊ में एक संस्था ऐसी भी है, जिसने पिछले 75 वर्षों से अपने पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया है. जी, हां लखनऊ के बाबू गंज एरिया के गीता विद्यालय में 75 सालों से नैतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के रूप में गीता प़ढाई जाती है. इसे समान रूप से हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के विद्यार्थियों को प़ढाया जाता है.
सन्‌ 1947 में  गीता विद्यालय को उत्तर प्रदेश माध्मिक शिक्षा परिषद से मान्यता मिली. सन 1973 में यह राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के मानकों पर खरा उतरी. इसके बाद सरकार द्वारा नियुक्त कर्मचारियों ने इस स्कूल में काम करना शुरू कर दिया.
और इसे दोनों धर्मों के विद्यार्थी साथ में प़ढते हैं. इस संस्था में नैतिक विज्ञान के रूप में गीता तो अनिवार्य विषय है ही साथ ही यहां अन्य पवित्र ग्रंथ भी प़ढाना अनिवार्य है. इस संस्था के प्रधानाध्यापक यूपी मिश्रा कहते हैं कि गीता मनुष्य के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों को जीने के लिए बेहतर गाइड कि तरह है. इसके माध्यम से हम छात्रों को जीवन का उद्देश्य सिखाने के साथ ही उसे अपने जीवन में उतारने को प्रेरित करते हैं. हम उन्हें समझाते हैं कि जीवन के उद्देश्य क्या है. यह संस्था 1935 में तीन दोस्तों द्वारा खोला गया था जो धर्म में आस्था रखते थे. हनुमान प्रसाद, जय प्रकाश और आरएस कोटवाल तीनों दोस्तों ने कल्पना किया कि वो एक ऐसे स्कूल की नींव रखेंगे, जहां सैद्धांतिक शिक्षा के साथ साथ बच्चों को सदाचार का पाठ भी प़ढाया जाएगा. यहां प़ढने वाले 200 छात्रों में से 30 मुस्लिम छात्र हैं. साथ ही इस संस्था के प्रधानाध्यापक यूपी मिश्रा कहते हैं किहमें गर्व है कि हमने वर्षों से चली आ रही अद्वितीय परंपरा को आज भी जीवित रखा है. अपने उच्च आदर्शो के कारण धीरे धीरे यह स्कूल लखनऊ के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक बन गया. स्कूल के स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में सरोजनी नायडू और गोविंद बल्लभ पंत जैसे राष्ट्रभक्तों ने यहां का दौरा किया. सन 1947 में गीता विद्यालय को उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद से मान्यता मिली.
सन 1973 में यह राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के मानकों पर खरा उतरा. इसके बाद सरकार द्वारा नियुक्त कर्मचारियों ने इस स्कूल में काम करना शुरू कर दिया. यहां प़ढाने वाले सभी शिक्षकों का यहीं उद्देश्य होता है कि वे छात्रों को गीता के शिक्षण के परंपरा को जारी रखे. साथ ही संस्था के प्रधानाध्यापक यूपी मिश्रा ने बताया कि बिना शिक्षकों के सहयोग के आज के परिवेश में इस परंपरा को जीवित रखना शायद ही संभव होता. इसके लिए यहां प़ढाने वाले शिक्षकों के प्रयास सराहनीय है. वर्तमान में इस विद्यालय में कक्षा 6 से 10 तक दो सौ से ज़्यादा लड़के और लड़कियां अध्ययन कर रहें है. यहां रोज छात्रों को पांच श्लोक प़ढाया जाता है और इस बात पर बल दिया जाता है कि छात्रों को श्लोक याद होने के साथ प़ढाए गए श्लोकों का मतलब भी समझ में आए और इसे वे अपने जीवन के प्रतिदिन के कार्यों में शामिल करें. यहां कि शिक्षिका सविता सक्सेना कहती हैं कि हम प्रत्येक वर्ष छात्रों की लिखित परीक्षा लेते हैं. इसमें गीता के किसी भी अध्याय से 10 प्रश्न लिए जाते हैं. जहां कक्षा 6 से 8 तक विद्यार्थियों से वस्तुनिष्ठ आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं वहीं  कक्षा 9 से 10 तक के छात्रों से उम्मीद की जाती है कि वे व्यक्तिपरक जवाब देंगे.


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