इनसे सीखिए कैसे हो महिला सशक्तिकरण

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जब महिलाओं के अधिकारों को लेकर चारों तऱफ हंगामा मचा हुआ है, तो ऐसे में कुछ सवाल ख़डे होते हैं. दरअसल, महिलाओं की आज़ादी के सवाल को समग्र रूप से देखना होगा. सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैयक्तिक और आर्थिक स्वतंत्रता से जु़डे कई सवाल हैं, जो सीधे-सीधे महिला सशक्तीकरण से जु़डे हुए हैं. चौथी दुनिया ऐसी ही कुछ महिलाओं से आपको मिला रहा है, जिन्होंने परंपरा को चुनौती देते हुए लीक से हटकर ऐसे काम किए हैं, जो समाज और खासकर महिलाओं के नाम एक संदेश है: 

रीता श्रीवास्तव
पटना की महिला उद्यमी रीता श्रीवास्तव ने वर्ष 2002 में रीता कंप्यूटराइज्ड नीट वेयर प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की थी, जिसमें रेडिमेड गारमेंट्‌स का उत्पादन शुरू हुआ. कारोबार में लाभ होने के बाद उन्होंने खुद की फैक्ट्री लगाई. फैक्ट्री की ज़मीन पाने के  लिए वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलीं. उनके कार्यों से मुख्यमंत्री का़फी प्रभावित हुए और उन्हें ज़मीन मुहैया कराने को कहा. लेकिन मुख्यमंत्री के  आश्वासन कोरे साबित हुए. उन्हें ज़मीन तो नहीं मिली, लेकिन ज़मीन देने के नाम पर का़फी भ्रमित किया गया. उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत एक लाख रुपये से अपना काम शुरू किया था. उस व़क्त दो लाख रुपये मिलते थे, लेकिन उन्होंने एक लाख रुपये ही लिए. फिर मुख्यमंत्री के कहने पर फतुहा में ज़मीन मिली, लेकिन वह ज़मीन उनसे छीन ली गई. बियाडा के अधिकारी यहां तक कह रहे हैं कि वह बिहार के विकास में बाधा बन रही हैं. लेकिन उनका कहना है, मैं हार नहीं मानूंगी, न्याय के साथ विकास मुझे भी चाहिए.

कल्पना सरोज
 महाराष्ट्र के अकोला के रोपड़खेड़ा गांव के एक सिपाही की 12 साल की बेटी कल्पना की स्कूली पढ़ाई छुड़वाकर 12 साल की उम्र में उससे 10 साल बड़े लड़के से शादी कर दी गई. वह पति के  साथ मुंबई की झुग्गी बस्ती में रही, जहां असहनीय यातनाएं झेली और अंतत: त्रस्त होकर वापस गांव चली गई. पुलिस में भर्ती होने की कोशिश की, लेकिन अस़फल हुई. नर्सिंग का काम सीखने का प्रयास किया, यहां भी अस़फलता मिली. फिर सिलाई सीखी. अंतत: 16 साल की उम्र में फिर मुंबई पहुंच गई. मुंबई के  घाटकोपर में एक गुजराती परिवार का सहारा मिला. वहां 2 रुपये रोज़ाना मेहनताने पर एक हौजरी यूनिट से जुड़ीं, बस फिर उन्होंने मुड़कर पीछे नहीं देखा. 22 साल की उम्र में स्टील फर्नीचर का कारोबार करने वाले एक व्यक्ति से शादी कर ली. पति की मृत्यु के बाद कल्पना ने कारोबार आगे बढ़ाया. आज मुंबई की दो सड़कें उनकी कंपनी के नाम से जानी जाती हैं. 1995 में कल्पना ने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी शुरू की. मुंबई में ही एक बड़ा भूखंड खरीदा. 4 करोड़ रुपये की लागत से एक कॉम्पलेक्स का निर्माण किया और उसे भारी मुना़फे में बेचा. फिर स्टील और शुगर के काऱखाने शुरू किए. 2006 में उनकी कंपनी कल्पना सरोज एंड एसोसिएट्‌स ने प्रसिद्ध व्यापारी रामजी कमानी की बंद पड़ी कंपनी कमानी ट्यूब्स को पुनर्जीवित करने का ज़िम्मा लिया. कुछ ही समय में कंपनी की काया पलट गई. देश में पहली बार उनकी कंपनी ने जर्मनी से 1 अरब रुपये की दो भारी मशीनें आयात कीं. आज कंपनी की कुल संपदा 300 करोड़ से अधिक है. कल्पना को महिला उद्यमी के रूप में राजीव गांधी पुरस्कार भी मिल चुका है. वह समाजसेवा भी करती हैं. वह क़रीब 2000 बच्चों को लाइब्रेरी और होस्टल सुविधाएं मुहैया कराने के अलावा आर्थिक रूप से भी उनकी मदद करती हैं.

सरला बास्टिन
17 साल की उम्र में अधिकतर लड़कियां स्कूल, कॉलेज जाती हैं, लेकिन सरला की शादी कर दी गई. वह अपने बलबूते कुछ करना चाहती थी. वह कहती हैं, मेरे पिता ने मुझे 15 हज़ार रुपये दिए. इससे मैंने वर्ष 2004 में अपना व्यवसाय शुरू किया. मैंने अपने घर के पीछे की खाली जगह में मशरूम की फसल शुरू की. आज सरला सफलतम युवा महिला व्यवसायी के रूप में जानी जाती हैं. उन्हें 2009 में प्रेस्टिजियस यूथ बिजनेस इंटरनेशनल इंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर अवॉर्ड के  लिए भी चुना गया. सरला कहती हैं कि शादी के  बाद किसी भी तरह की आर्थिक तंगी नहीं थी. मैं अपने पति की कमाई से ़खुश थी. लेकिन मेरा सपना था कि मैं कुछ अपना करूं. मैं ज़रूरतमंद महिलाओं के  लिए रोज़गार के अवसर मुहैया करूं. मेरे  साथ काम करने  वाले लोगों में 95 प्रतिशत महिलाएं हैं.

वनिता जालिंदर पीसे
वनिता जालिंदर पीसे ऋृण के  लिए बैंकों के  चक्कर लगा रही थीं, लेकिन बैंकों की औपचारिकताओं और काग़ज़ी खानापूर्ति की वजह से ऋृण लेना मुश्किल हो रहा था. थककर वह घर बैठ गईं. तब मानदेसी महिला संगठन द्वारा उन्हें आसान शर्तों पर ऋृण मिल गया. वर्ष 2003 में उन्होंने महिला बैंक से डेढ़ लाख रुपये का ऋृण लिया. आज वनिता के काम में उनके संयुक्त परिवार के  अलावा अन्य17 लोग भी मदद कर रहे हैं. परिवार ही नहीं उन्होंने गांव की सात अन्य महिलाओं को भी रोज़गार दिया है. उनकी मेहनत और उद्यमशीलता की वजह से उन्हें वर्ष 2006-07 का सीआईआई वूमेन एक्सजैंम्पलर अवॉर्ड मिल चुका है. यह पुरस्कार शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ्य, लघु उद्योग के क्षेत्र में देश के विकास की प्रक्रिया में भागीदारी के  लिए दिया जाता है.

चेतना गाले सिन्हा
मानदेसी महिला सहकारी बैंक की संस्थापक चेतना गाले सिन्हा का कहना है कि यह महिलाओं द्वारा और महिलाओं के लिए चलाए जाने वाला बैंक है. चेतना के  अनुसार, परिवार में पैसे अगर पुरुष बचाता है, तो वह उसकी व्यक्तिगत आमदनी होती है, लेकिन यह बचत महिला करती है तो इससे पूरे परिवार को लाभ मिलता है. वह बताती हैं कि बैंक को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से लाइसेंस पाने के  लिए मानदेसी महिला सहकारी बैंक  की महिलाओं को का़फी मशक्कत करनी पड़ी. गांव की अनपढ़ महिलाओं के  दम पर बैंक को लाइसेंस मिलना का़फी मुश्किल था. चेतना के  नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के  अधिकारियों से मिला और इसके  बाद 1997 में मानदेसी को बैंक का दर्जा मिला.

किरण रंजन
जूसी लेडी के  नाम से जानी जाने वाली महिला उद्यमी किरण रंजन बिहार के  वैशाली ज़िले की रहने वाली हैं. उनकी कंपनी सुमन वाटिका लीची, आम और अनानास आदि का जूस बनाती हैं. उनकी यूनिट में लीची के मौसम में क़रीब 700 लोग काम करते हैं, जबकि आम दिनों में क़रीब 200 लोग काम करते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि उनके  99 फ़ीसदी वर्कर ग्रामीण महिलाएं हैं. जो ग्रामीण महिलाएं पहले खाली बैठी रहती थीं, उन्हें किरण ने काम दिया और ये महिलाएं आज अपने पैरों पर खड़ी हैं.

कुसुम लता
उत्तर प्रदेश के रायबरेली ऊंचाहार विकासखंड क्षेत्र के किशुनदासपुर गांव की रहने वाली कुसुम लता ने ग़रीबी में गुज़र बसर कर रहे परिवार को संभाला. पति ठेले पर समोसे बेचकर किसी तरह परिवार का भरण पोषण करते थे. शादी के बाद परिवार की खराब आर्थिक स्थिति देख उन्होंने घर से बाहर क़दम निकाले. रायबरेली में ईडीआई संस्थान के  निर्देशन में उन्होंने नमकीन निर्माण का प्रशिक्षण लिया और उद्योग लगाया. कुछ महीनों में उनके हाथ की बनी नमकीन क्षेत्रवासियों की पसंद बन गई. स्नातक उत्तीर्ण कुसुम लता ने मई 2010 में बैंक ऑफ बड़ौदा जमुनापुर से तीन लाख रुपये का ऋृण लिया और गांव में ही उद्योग लगाया. वह नमकीन बनाकर तैयार करती और उनके पति कृष्णपाल मौर्य नमकीन की क्षेत्र में सप्लाई करने लगे. दो वर्ष में किशुनदासपुर की नमकीन की मांग ऊंचाहार, जगतपुर, गौरा, गदागंज क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ी. आज वह स़िर्फ एक गृहिणी न होकर एक स़फल उद्यमी के   रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं. उनका कहना है कि महिलाओं का समाज की बेड़ियों में जकड़कर जीवन ग़ुजार देना आज के समय में सही नहीं है. समाज को नई दिशा देनी है, तो महिलाओं को आगे आना ही होगा. महिला-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर काम करें तो विकास की गति बढ़ेगी.

वंदना कलानी
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की वंदना कलानी की हर दिन को खास बनाने की प्रवृत्ति और साज सज्जा के  हुनर ने उन्हें खास बना दिया. पेटिंग, क्राफ्ट हॉबी क्लासेज के साथ उन्होंने जब काम  शुरू किया तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई महिला बालू, एसिड, मार्केटिंग कांच से जुड़े इस कारोबार में जम पाएगी. उन्होंने दस हज़ार की छोटी पूंजी से व्यापार शुरू किया. वंदना बताती हैं कि खाली समय में घर को संवारना, पेंटिंग बनाना तथा अनुपयोगी वस्तुओं से ज़रूरत की चीज़ें तैयार करने को आदत में शुमार कर लिया था. टेक्सटाइल डिजाइनिंग में डिग्री हासिल की. 2008 में बनारस में एक परिचित के  घर ग्लास डिजाइनिंग के काम को देख जानने की उत्सुकता हुई, लेकिन उनकी उपेक्षा से वंदना ने इस व्यवसाय में ही करियर की ठान ली. वंदना का मानना है कि लड़कियों के लिए क्राफ्ट, डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट खुलें तो तमाम महिलाएं स्वावलंबी बनकर औरों का सहारा बन सकेंगी.

अरुणा सिंह
अरुणा सिंह अपने परिजनों के साथ मिलकर ब्यूटी प्रोडक्ट्‌स बनाती हैं. उन्हें आयुर्वेदिक सौंदर्य प्रसाधन वस्तुओं का निर्माण करने में महारथ हासिल है. इस काम की शुरुआत उन्होंने क़रीब 18 साल पहले की थी. बाद में दिल्ली के सलीम ़खान से उन्होंने का़फी कुछ सीखा और अपने काम को का़फी आगे ब़ढाया. वह उतना ही सामान बनाती हैं, जितना उनके ग्राहक डिमांड करते हैं. यही उसकी सफलता का राज़ भी है.

किसान चाची
किसान चाची के नाम से मशहूर राजकुमारी तंगहाली में जीवन गुज़ार रही थीं. 19 साल की आयु में उनकी शादी हो गई. 25 साल की उम्र तक वह दो बच्चों की मां बन गईं. पति कुछ नहीं करते थे, फिर बच्चों की ज़िम्मेदारी भी उन पर थी. वह अनप़ढ थीं, लेकिन उनके हौसले बुलंद थे. ससुराल में बंटवारे में उन्हें एक एकड़ ज़मीन मिली, जिस पर राजकुमारी ने पपीते और अदरक की खेती शुरू की. उनकी मेहनत रंग लाने लगी और खेती से अच्छी आमदनी होने लगी. राजकुमारी की लगन और जुनून को सरैया प्रखंड में कृषि वैज्ञानिक ज्योति सिन्हा ने पहचाना और उन्हें प्रशिक्षण लेने के  लिए राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा भेजा. जब वह प्रशिक्षण लेकर वापस लौटीं तो वह अपनी कोशिशों के  बल पर पपीते, लीची, गुलाब से अलग-अलग प्रोडक्ट्स बनाने लगीं, जो कृषि-प्रदर्शनियों का हिस्सा बनने लगे. सालों की अथाह मेहनत के बाद उनके प्रोडक्ट्स की मांग प्रदेश स्तर पर होने लगी. आज वह पचपन साल की हो गई हैं, लेकिन हर रा़ेज तीस से चालीस किलोमीटर का स़फर साइकिल से तय करती हैं. साईकिल पर गांव-गांव जाकर अपने जैसे किसानों को खेती के गुर पिछले बीस साल से सखा रही हैं.

इंद्राणी
महिला उद्यमी इंद्राणी का सपना पूरी दुनिया को महकाने का है. वह खुद एक वर्कर हैं और खुद ही अपनी कंपनी की मालकिन भी. उनकी पारिवारिक कंपनी का  दायरा अब इतना ब़ढ गया है कि अब यह 25 परिवारों की आजीविका का साधन बन चुका है. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. इंद्राणी की शुरू से ही कुछ अलग करने की इच्छा थी. उन्होंने पहले बहुत छोटे स्तर से अगरबत्ती बनाना और बेचना शुरू किया. बाद में गहने और घर की रखी पूंजी लगाकर लगभग 10 लाख की लागत से एक छोटी फैक्ट्री तुलिका की स्थापना की. अब तुलिका की पहचान पूरे देश में हो गई है. विशेषकर गाय के  गोबर से बनी विशेष अगरबत्ती ने तुलिका को पूरे देश में स्थापित कर दिया है. इंद्राणी गर्व से बताती हैं कि पिछले वर्ष नई दिल्ली में आयोजित व्यापार मेले में प्रधानमंत्री की पत्नी गुरुशरण कौर ने उनके उत्पाद को सराहा था.

पेट्रीशिया नारायण
पेट्रीशिया फिक्की वूमेन इंटरप्रेन्योर अवॉर्ड से नवाज़ी गई हैं. ज़िंदगी में तमाम उतार-च़ढाव के बावजूद वह लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित रहीं. कम उम्र में उनकी शादी हो गई थी. नश़ेडी पति और बच्चों की ज़िम्मेदारी उन पर थी. उन्होंने मरीना समुद्र तट पर एक ठेला गाड़ी पर खाने की चीज़ें बेचनी शुरू कीं. उनके काम का दायरा ब़ढता गया और आज उनकी रेस्तरां की चेन है. वह कहती हैं, खाना बनाना मुझे पसंद था, लेकिन मेरा यह शौक व्यवसाय भी बन सकता है, यह मैंने कभी सोचा नहीं था. वह कहती हैं, मैंने स़िर्फ दो लोगों के साथ अपना कारोबार शुरू किया था. अब दो सौ लोग मेरे रेस्तरां में काम करते हैं. मेरी कमाई 50 पैसे प्रतिदिन से ब़ढकर आज दो लाख रुपये प्रतिदिन है.पइस तरह देखा जाए तो महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं. कारोबार में भी उनका योगदान धीरे-धीरे बढ़ रहा है. मणिपुर में कुल उद्यमियों में 82.83 फीसदी महिलाएं, वहीं कर्नाटक में 51.06, केरल में 49.95, तमिलनाडु में 44.60, पश्चिम बंगाल में 39.95, पंजाब में 33.88, राजस्थान में 26.30, उत्तर प्रदेश में 26.34 और महाराष्ट्र में 22.36 फीसद उद्योगों के संचालन की बागडोर महिलाओं के हाथों में है. आज महिला सशक्तीकरण की बात ज़ोरशोर से उठाई जा रही है. इसके लिए ज़रूरी है कि महिलाएं आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हों. इन महिलाओं ने तो अपने लिए रास्ता चुन लिया है और उस पर आगे बढ़ रही हैं. दूसरी महिलाओं को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए, ताकि महिलाओं के प्रति समाज का नज़रिया बदल सके. 

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