अभिनेता पंकज झा ने कहा : सफलता की चाबी है जुनून और इच्छाशक्ति

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प्रतिभा किसी साधन की मुहताज नहीं होती. ऐसे ही एक प्रतिभाशाली अभिनेता हैं पंकज झा. पंकज बिहार में सहरसा ज़िले के मुरादपुर गांव के रहने वाले हैं. कई हिट फिल्मों में काम कर चुके पंकज कहते हैं कि बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था. लेकिन राहें उनके लिए इतनी आसान नहीं थीं. वह कहते हैं कि मैं जिस जगह से हूं, वहां माता पिता बच्चों को लेकर सपने नहीं देखते कि मेरे बच्चे को कुछ बनना है. मेरे माता-पिता नहीं जानते थे कि अभिनय क्या होता है. मैंने अपनी राहें ख़ुद चुनी. बचपन में पंकज लोगों की नक़ल किया करते थे. कुछ बड़े हुए, तो अपने गांव में नुक्क़ड नाटक और रंगमंच से जुड़ गए. उन्होंने कई नाटकों का मंचन भी किया. पंकज प़ढाई के लिए पटना गए और वहां भी वह फाइन आर्ट्स की पढ़ाई के दौरान थिएटर से जुड़ गए. बाद में दिल्ली आ गए और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद मुंबई का रुख किया.

पिछले साल पंकज की तीन फिल्में रिलीज हुईं बी केयर फुल, मुंबई कटिंग और चलो दिल्ली. वहीं लफंगे परिंदे, तीन पत्ती, लाहौर, गुलाल, आपका सुरूर, अनवर, शिवा, मंगल सिंह, ब्लैक फ्राइडे, अनवर, चमेली, मुद्दा द इश्यू, हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वीमेन, कंपनी जैसी कई सफ़ल फिल्मों में भी वह दिखे. इन दिनों वह अपनी फिल्म भइयाजी सुपरहिट और कुसार प्रसाद का भूत की शूटिंग में व्यस्त हैं. वहीं नीतू चंद्रा की होम प्रोडक्शन फिल्म देसवा में भी वह केंद्रीय भूमिका में नज़र आएंगे. भोजपुरी में बनने वाली इस फिल्म में युवाओं को बेरोज़गारी से जुझते हुए दिखाया गया है. पंकज टेलीविजन को काफ़ी लोकप्रिय माध्यम मानते हैं. यही वजह है कि उन्होंने सामाजिक मुद्दे पर आधारित धारावाहिक काशी: अब न रहेगा तेरा काग़ज़ कोरा में केंद्रीय भूमिका में और लाइफ ओके के धारावाहिक 26/11 में भी दिखे. पंकज के दिल्ली यात्रा के दौरान चौथी दुनिया की संवाददाता प्रियंका प्रियम तिवारी  से हुई बातचीत के कुछ अंश:

सहरसा जैसी छोटी -सी जगह से आने के बाद आपको बॉलीवुड में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जबकि आपका कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है?
हां, मेरा कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है. आज मैं जो कुछ भी हूं, सिर्फ़ अपनी मेहनत की बदौलत. बॉलीवुड में शुरुआती दिनों में मेरे सामने कई तरह की मुश्किलें आईं, लेकिन जब आपकी इच्छाशक्ति मजबूत हो, और यदि आप जुनूनी हैं, तो लक्ष्य के मार्ग में आने वाली कठिनाईयां आपको बहुत ज़्यादा प्रभावित नहीं करतीं.

क्या वजह है कि आप काफ़ी कम फिल्में ही करते हैं ?
मैं वही फिल्में करता हूं, जिनकी स्क्रिप्ट मुझे पसंद आती हैं. अभिनय मेरा पैशन है.

आपकी अब -तक की फिल्मों में की गई कौन-सी भूमिका आपको ज़्यादा पसंद है?
अनुराग कश्यप की फिल्म गुलाल में मेरा रोल मुझे काफ़ी पसंद है. इस फिल्म में मेरे कैरेक्टर का नाम जधवाल था.

आप एक प्रोफेशनल पेंटर भी हैं. ऐसे में बी-टाउन में आने की प्रेरणा आपको कहा से मिली?
बचपन से ही मुझे अभिनय का शौक था. गांव में हम कुछ लोगों ने मिलकर एक छोटे से थिएटर ग्रुप की स्थापना की, जहां हम नाटकों का मंचन किया करते थे. आगे फाइन आर्ट्स की पढ़ाई के लिए मैं पटना आ गया. वहां भी मैं थिएटर से जुड़ा रहा. इसके बाइ मैं दिल्ली आ गया. यहां मैंने एनएसडी ज्वाइन किया. कोर्स ख़त्म करने के बाद मैं मुंबई चला आया. यहां मुझे मेरी पहली फिल्म मॉनसून वेडिंग मिली. यह फिल्म मीरा नायर के निर्देशन में बनी थी.

कहते हैं फिल्में समाज का आईना होती हैं. पहले शिक्षाप्रद, मनोरंजक और सामाजिक फिल्में बनती थीं. आजकल बॉलीवुड में जो फिल्में बनती हैं, उनके संदर्भ में आप क्या कहेंगे?
यह सच है कि अब पहले की तरह बॉलीवुड में फिल्में नहीं बनतीं. तब सत्यजित रे, गुरुदत्त और राजकपूर जैसे फिल्मकार थे. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बॉलीवुड में आजकल सिर्फ़ बिना सर पैर की फिल्में ही बनती हैं. समय के साथ सामाजिक परिस्थितियां तो बदलती ही रहती हैं. आज के दौर में ही प्रकाश झा, दिबाकर बनर्जी, शेखर कपूर, अनुराग कश्यप, मनीष झा जैसे लोग भी हैं, जो समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं. उनका विजन उनकी फिल्मों में साफ़ दिखाई देता है. कम बजट में वे फिल्में बनाते हैं और वे बॉक्स ऑफिस पर न केवल चलती हैं, बल्कि हिट भी होती हैं, केवल अपने दमदार स्क्रिप्ट के बल पर.

इंडस्ट्री में आपके मित्र ?
अनुराग कश्यप, पवन मेहरोत्रा, विजयराज, प्रदीप सरकार, और नीतू चंद्रा उन ख़ास दोस्तों में से हैं, जिन्होंने हर अच्छे बुरे समय में मेरा साथ दिया.

आपकी आने वाली फिल्में?
जल्द ही मेरी फिल्में भइयाजी सुपरहिट, कुसार प्रसाद का भूत और एक भोजपुरी फिल्म देसवा रिलीज होने वाली है. भोजपुरी में बनने वाली फिल्म देशवा नीतू चंद्रा और उनके भाई नीतिन चंद्रा के डायरेक्शन में बनी है. यह एक सामाजिक फिल्म है. इसमें बिहार में बेरोज़गारी की समस्या को दिखाया गया है.

फुर्सत के पलों में आप क्या करते हैं?
पेंटिंग और अभिनय दोनों मेरे शौक हैं. शूटिंग से समय मिलते ही मैं अपने दूसरे शौक को पूरा करता हूं. पेंटिंग करता हूं और एग्जीबिशन लगाता हूं. बासुरी बजाना और कविता लिखना भी मुझे बेहद पसंद हैं. मैं ख़ुद को प्रकृति के बेहद क़रीब पाता हूं. जब भी मेरे पास समय होता है, तो मैं किसी हिल स्टेशन या पहाड़ों की सैर पर निकल पड़ता हूं.

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