अपराध की दुनिया में फंसता बचपन : मासूम या मुजरिम

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बदलते परिवेश में बच्चे वक्त से पहले ही ब़डे हो रहे हैं. एक तऱफ वे कम उम्र में तमाम तरह की उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तऱफ वे आपराधिक गतिविधियों को अंजाम भी दे रहे हैं. चोरी, अपहरण, फिरौती, किडनैपिंग, ब्लैकमेलिंग और रेप से लेकर हत्या करने से भी उन्हें कोई परहेज़ नहीं है. ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं, जब किशोरों ने अपनी यौन इच्छाओं की तृप्ति के लिए छोटी बच्चियों तक को शिकार बनाया है. हालांकि इसके लिए हमारी सामाजिक परिस्थितियां भी का़फी हद तक ज़िम्मेदार हैं. हमारी सामाजिक व्यवस्था में कई तरह की विसंगतियां हैं, जिनमें किशोर जाने-अनजाने अपराध की दुनिया में क़दम रख रहे हैं. पिछले दिनों दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म कांड के आरोपियों में एक नाबालिग के बारे में बलात्कार की शिकार ल़डकी के पिता का कहना था कि उक्त नाबालिग ने उसकी बेटी के साथ सबसे ज़्यादा क्रूरता दिखाई. नाबालिग ने उनकी बेटी के अंदरूनी अंगों को चोट न पहुंचाई होती तो वह बच सकती थी. यह घटना बताती है कि किशोरों में आपराधिक मनोवृति किस हद तक ब़ढी है. एक दूसरे मामले में बिहार के रहने वाले इंजीनियरिंग के छात्र वरुण राज (17) ने अपने पिता धीरेंद्र कुमार को फोन करके कहा कि उसे अगवा कर लिया गया है. इस बाबत धीरेंद्र कुमार ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने जब तहक़ीक़ात शुरू की तो पता चला कि अगवा और अपहरणकर्ता वरुण ही था. वरुण के मोबाइल के लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उसे और उसके दोस्त को एक होटल के कमरे से गिरफ्तार किया. पूछताछ में वरुण ने बताया कि पैसे के लिए उसने यह नाटक रचा. यह अकेला मामला नहीं है, जब किसी किशोर ने अपने शौक पूरे करने के लिए अपराध का रास्ता अपनाया हो. एक अन्य मामले में कुछ स्कूली छात्रों ने अपने साथी छात्र को क्लास से बाहर खींचकर चाकुओं से घायल कर दिया. उसका कसूर केवल इतना था कि उसने कुछ दिन पहले अपने साथ पढ़ने वाली लड़की को उन मनचलों की छेड़छाड़ से बचाया था. वहीं चेन्नई में 15 वर्षीय एक स्कूली छात्र ने शिक्षिका द्वारा छात्र की कॉपी में लिखी टिप्पणी पसंद न आने पर शिक्षिका की हत्या कर दी. राजधानी दिल्ली के  एक नामी स्कूल में पढ़ने वाले 14 वर्षीय किशोर की उसके  दोस्तों से बहस हो गई और दोस्तों ने ही उसकी हत्या कर दी. उड़ीसा की एक 16 वर्षीय लड़की के साथ उसके साथ पढ़ने वाले लड़कों ने बलात्कार किया. यह तो मात्र कुछ घटनाएं हैं, दरअसल ये घटनाएं आज के युवाओं में बढ़ती आपराधिक प्रवृति की ओर इशारा कर रही हैं. मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि मनुष्य में आपराधिक प्रवृतियों का जन्म बचपन में ही हो जाता है. स्टैटिस्टिक्स से यह तथ्य सामने आया है कि सबसे अधिक और गंभीर अपराध करने वाले किशोर ही होते हैं. अब किशोर अपराध को एक महत्वपूर्ण क़ानूनी, सामाजिक, नैतिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्या के  रूप में देखा जाने लगा है. किशोर अपराधों का स्वरूप सामान्य अपराधों से भिन्न माना गया है. सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के किशोर कई तरह की आपराधिक गतिविधियों में फंसते जा रहे हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार, कई बार किशोर अपराध ग़ुस्से या बदला लेने के  लिए करते हैं और कई बार तो फिल्मों में देखे गए दृश्यों की नक़ल करने के  लिए भी. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में होने वाले अपराध में क़रीब 2 फीसदी अपराध नाबालिग करते हैं. हालांकि सरकारी आंकड़े समस्या के  बेहद छोटे हिस्से के  बारे में ही बात करते हैं. उनमें भी जिनके  पास पैसा है, वो अपराध करके भी बच जाते हैं. जबकि नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक़, नाबालिगों के 40 फीसदी अपराध आर्थिक कारणों से जुड़े होते हैं. आर्थिक अपराध के  बाद 3 फीसदी मामले हत्या और 1.8 फीसदी मामले बलात्कार के होते हैं. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में कुल 33,387 किशोरों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें से 16 से 18 वर्ष के 21,657, 12 से 16 वर्ष के 11,019 और 7 से 12 वर्ष के 1,211 नाबालिग शामिल हैं. किशोरों की विभिन्न अपराधों में लिप्तता के तहत वर्ष 2001 में कुल 33,628, 2002 में 35,779, 2003 में 33,320, 2004 में 30,943, 2005 में 32,681 किशोरों को गिरफ्तार किया गया. वहीं वर्ष 2006, 2007, 2008, 2009 और 2010 में यह आंकड़ा क्रमश: 32,145, 34,527, 34,507, 33,642, 30,303 रहा. इन आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि किशोरों द्वारा बलात्कार के  मामलों में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है. वर्ष 2011 में इस तरह के 1,419 मामले दर्ज हुए, जबकि 2001 में यह आंकड़ा 399 था. कौन होते हैं बाल अपराधी भारतीय क़ानून के  तहत सोलह वर्ष की आयु तक के  बच्चे अगर कोई ऐसा कृत्य करें, जो समाज या क़ानून की नज़र में अपराध है तो ऐसे अपराधियों को किशोर या बाल अपराधी की श्रेणी में रखा जाता है. क़ानून यह स्वीकार करता है कि किशोरों द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार के  लिए सामाजिक परिस्थितियां भी उत्तरदायी हैं. यही वजह है कि भारत समेत अनेक देशों में किशोर अपराधों के लिए अलग क़ानून और न्यायालय और न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई है. किशोर अपराधियों को दंड नहीं, बल्कि उनकी केस हिस्ट्री को जानने और उनके  वातावरण का अध्ययन करने के  बाद उन्हें सुधार गृह में रखा जाता है, जहां उनकी मानसिकता समझकर उनके भीतर उपज रही नकारात्मक भावनाओं को भी समाप्त करने की कोशिश की जाती है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चों में इस प्रवृत्ति के  पनपने का कारण यह है कि उनकी इच्छाएं तेज़ी से बढ़ती जा रही हैं, लेकिन उनकी पूर्ति के  स्त्रोत इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रहे हैं, जिसके चलते भटकाव आ जाता है. वह कहते हैं कि यह मनोविकृति वंशानुगत, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवेश से पनपती है. इसमें वे सही ग़लत में फर्क़ नहीं कर पाते. हर बच्चे की कुछ इच्छाएं, आकांक्षाएं और आवश्यकताएं होती हैं. उन्हें पूरा करने का वह प्रयत्न करता है. उसके प्रयास में अनेक बाधाएं आती हैं, जिन्हें वह जीतने का प्रयत्न करता है. बदलती सामाजिक व्यवस्था भी इसके लिए का़फी ज़िम्मेदार है. परिवार का ताना-बाना बदलकर एकल होता जा रहा है. पहले संयुक्त परिवार में दादी-दादा, चाचा-बुआ सभी होते थे जो बच्चों पर नज़र रखते थे. मां- बाप भी आजकल कामकाजी होते हैं. ऐसे में बच्चे अकेलेपन के शिकार होते हैं. अकेलेपन से उबरने के लिए वे कई तरह के प्रयास करते हैं और देर-सबेर अपराध की दुनिया में पहुंच जाते हैं. यौन अपराध युवाओं में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण सामान्य सी बात है. समाज में आए खुलापन ने उनकी भावनाओं को और प्रभावित किया है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हार्मोनल बदलाव के कारण भी अधीर और आक्रामक बने किशोर अपराध की तऱफ आकर्षित होते हैं. वहीं कम उम्र में उनमें ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड बनाने का चलन भी जोरों पर है. उनके लिए यह फैशन बन गया है. उनकी सोसाइटी में जिनकी गर्लफ्रेंड या ब्वायफेंड नहीं है, उन्हें आउटडेटेड कहा जाता है. वो प्यार, अटेंशन और केयर चाहते हैं, लेकिन जानकारी का अभाव होने के कारण वे समझ नहीं पाते कि उन्हें क्या व्यवहार करना है. ऐसे में रिश्तों में छोटी-मोटी बातें हो जाने या पर वे बदला लेने पर उतारु हो जाते हैं और कई बार बड़े अपराधों को भी अंजाम दे जाते हैं. शौक, दोस्तों का दबाव और इकोनॉमी गैप  तकनीक ने जहां एक तऱफ हमें कई तरह की सुविधाएं दी है, वहीं कई तरह से हमारे जीवन को भी प्रभावित किया है. किशोर भी इससे अछूते नहीं हैं. गैजेट्‌स, सेलफोन, बाइक, लैपटॉप लेटेस्ट ब्रांड की कड़ी प्रतिस्पर्धा किशोरों के बीच है. एक स्कूल में या साथ उठने बैठने वाले बच्चे अलग-अलग माली हालत वाले होते हैं. कई बच्चे प्रतिस्पर्धा करते हैं कि मेरे दोस्त के पास यह चीज़ है तो मेरे पास भी हो. इसलिए वे चोरी और लूटपाट जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं. वहीं इस मामले में नोएडा सेक्टर 22 में पदस्थापित पुलिस ऑफिसर ऋषिराज शर्मा ने चौथी दुनिया को बताया कि उनके पास आने वाले मामले में यही बातें सर्वाधिक होती हैं. साल 2011 में पुलिस फाइल के अनुसार, 15 वर्षीय लड़के ने दोस्तों को पार्टी देने के लिए घर से पैसा चुराया, जबकि 17 साल के एक किशोर ने रेसिंग बाइक के  पैसे पाने के लिए अपनी दादी को मार डाला.  फिल्म और टेलीविजन का प्रभाव किशोरों की भावनाओं से खेलने में फिल्म और मीडिया की भी का़फी महत्वपूर्ण भूमिका है. बहुत सारे आपराधिक थ्रिलर फिल्मों में गैंगस्टर और बड़े मा़फिया डॉन को का़फी प्रभावी अंदाज़ में पेश किया जाता है. इसका किशोरों पर का़फी इसका प्रभाव पड़ता है. वे भी दोस्तों और अपने आस-पास के लोगों पर अपना प्रभाव रखना चाहते हैं. अंतत: उन्हें ताक़त और पैसा पाने का सपना पूरा करने के  लिए जुर्म की दुनिया का रास्ता सबसे बेहतर लगने लगता है. पैसे के लिए अपराध ग़रीब और भूख से बेहाल किशोरों का अपराध की दुनिया में आना तो फिर भी समझ में आता है, लेकिन अच्छे परिवारों के बच्चे भी इस तरह के वारदातों में शामिल होते हैं. मुंबई में 20 अगस्त, 2007 में लोखंडवाला के एक व्यापारी के 16 वर्षीय बेटे अदनान पटरावाला की हत्या तीन किशोरों ने कर डाली. तीनों ने मिलकर उसका अपहरण किया और उसके पिता से फिरौती की मांग की. तीन दिन बाद उसका शव मिला. जांच में पुलिस ने पाया कि यह वारदात अदनान के जानने वालों ने हीं अंजाम दिया था, जिनमें 19 वर्षीय आयूष भट्ट और 18 वर्षीय खिमेश अंबावत के परिवारों की आर्थिक स्थिति का़फी अच्छी थी. अदनान का अपहरण 2 करोड़ रुपये के लिए किया गया था. पैसा और पावर का नशा जहां मां-बाप दोनों कामकाजी हैं, उनके पास अपने बच्चों के लिए समय का अभाव है. ऐसे में वे अपने बच्चों को खुली छूट दे देते हैं. बड़े घरों में मां बाप को पावर का ऐसा नशा होता है कि वे सोचते हैं कि उनके बच्चे का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. ऐसे में छोटे-मोटे अपराधों में जब घर वाले उन्हें बचा लेते हैं तो वे सोचते हैं, उनका कोई कुछ नहीं कर सकता. नशाखोरी आजकल किशोरों में नशे का चलन भी बढ़ रहा है. एक बार आदत लग जाने पर वे इसके आदी हो जाते हैं और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. नशे की लत और पैसे ना मिलने के कारण वे लूटपाट, चोरी जैसे के वारदातों को अंजाम देते हैं. आर्थिक तंगी हालांकि बहुत से मामलों में बच्चे आर्थिक तंगी के कारण भी आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाए गए. भूख, निराशा, बेरोज़गारी और अन्य सामाजिक कारणों से वे जानबूझकर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं. पिछले एक दशक में तथाकथित विकास और बाल एवं किशोर अपराध में बढ़ोत्तरी साथ-साथ हुई है. सज़ा का प्रावधान सुप्रीम कोर्ट का मानता है कि किशोर उम्र के  बच्चे अगर जल्दी बिगड़ते हैं और उन्हें अगर सुधारने का प्रयत्न किया जाए तो वह सुधर भी जल्दी जाते हैं. इसीलिए उन्हें किशोर न्याय-सुरक्षा और देखभाल अधिनियम 2000 के तहत सज़ा दी जाती है. इस अधिनियम के अंतर्गत बाल अपराधियों को कोई भी सख्त या कठोर सज़ा ना देकर उनके  मस्तिष्क को स्वच्छ करने का प्रयत्न किया जाता है. उन्हें व्यवसायिक प्रशिक्षण देकर आत्म-निर्भर बनाने की भी कोशिश की जाती है. इस अधिनियम के तहत उनकी गिरफ्तारी से लेकर सज़ा देने तक विशेष सुरक्षात्मक उपाय किए गए. उनके  लिए सामान्य और गंभीर अपराधों में कोई अंतर नहीं रखा गया. लगभग सभी तरह के मामले में उन्हें ज़मानत देने की व्यवस्था की गई. अपराध साबित होने पर भी उन्हें आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सज़ा नहीं दी जा सकती. हालांकि सन 2000 में किशोर न्याय अधिनियम बनाए जाने के बाद भी किशोर अपराध के आंक़डे कम होने के बजाए बढ़ते ही गए. आंकड़े के मुताबिक़ वर्ष 2000 में 1000 किशोर जनसंख्या पर 9 अपराधी थे, जबकि यह संख्या सन 2010 आते-आते 21 तक पहुंच गया. किशोर एवं बाल विशेषज्ञ कहते हैं कि किशोरों के लिए बनी न्यायिक व्यवस्था में बहुत सारे सुधारों की ज़रूरत है. पकड़े गए बच्चों के लिए कोई योजना न होने के कारण जब वे बाहर आते हैं तो दुनिया से निपटने में खुद को अक्षम पाते हैं. ऐसे में क़ानून में भी कई तरह के बदलाव की ज़रूरत है. भारत में बाल अपराध को रोकने के लिए कई क़ानूनी उपाय किए गए हैं, जिनमें बाल न्यायालय, सुधारालय, प्रमाणित विद्यालय, सहायक गृह, पालक गृह, छात्रावास, स्वस्थ बालकों के लिए संस्थाएं, उत्तर-संरक्षण संस्थाएं और बाल सुधार गृह प्रमुख हैं. हाल ही में बाल सुधार गृह की खामियां किशोरों के  फरार होने का कारण बनी हैं. इनमें बच्चों के भूखे रहने और मूलभूत सुविधाओं में खामियों की शिकायतें आई हैं. इससे बाल अपराधियों के आहत मन और खीज जाते हैं और वे यहां से जैसे-तैसे भागने का जतन करते हैं. किशोर गृहों में बाल सुधार के अच्छे परिणाम नहीं रहे हैं, जिसके  चलते वहां के बालक फिर से अपराध कर रहे हैं.

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